राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत हरिसिंह १५७ रुष्ट कर लेता तो संभव था कि महाराणा उसके विरुद्ध हो जाता और इस तरह उसके विरोधियों का बल बढ़ जाता। महारावत असफल होकर अपनी राजधानी को लौट गया। उसको अपने देश में आये थोड़ा ही समय हुआ था कि वि० सं० १७१६ के श्रावण (ई० स० १६५६ जुलाई) मास में महाराणा का बसाड़ की तरफ़ दौरा हुआ। महाराणा जगतसिंह- द्वारा उदयपुर में महारावत जसवंतसिंह पर सेना भेज घेरा डाल देने से उस- (हरिसिंह) को महाराणा पर विश्वास न रहा था, इसलिए वह महाराणा के पास उपस्थित होने में संकोच करने लगा। फिर महाराणा के प्रतिष्ठित चार बड़े सरदारों-झाला राज सुलतानसिंह (सादड़ीवालों का पूर्वज), चौहान राव सबलसिंह (बेदलावालों का पूर्वज), चूंड़ावत रावत रघुनाथ- सिंह (सलूंबरवालों का पूर्वज) और शक्तावत महाराज मुहकमसिंह (भींडरवालों का पूर्वज) -के विश्वास दिलाने पर वह महाराणा की सेवा में उपस्थित हो गया और उसने गयासपुर एवं बसावर (बसाड़) के परगनों का दावा छोड़कर¹ महाराणा से मेल कर लिया। इस घटना का राजप्रश- स्ति महाकाव्य में भी वर्णन मिलता है और उसमें महारावत का महाराणा के पास उपस्थित होकर पचास हज़ार रुपये नज़र करने का भी उल्लेख है²। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ४३५-३६ । (२) शते सप्तदशे पूर्णे वर्षे षोडशनामके ॥ श्रावणे तु बसाडाख्यदेशं दृष्टुं नृपो ययौ ॥ ९ ॥ भटैरुद्भटै रावलाद्यैर्बलाढ्यैः प्रचंडश्च वेतंडवर्यैरुपैता ॥ गृहीत्वा महावाहिनी राजसिंहः प्रतस्थे बसाडप्रदेशद्दणाय ॥ १० ॥ ततो दुंदुभिः प्रोच्चशब्दैर्जिताब्दारवैः पार्श्वदेशस्थितानां जनानां ॥ विदीर्णानि वक्षांसि वक्षो विभिन्नं महारावतस्यापि नश्यद्वलस्य ॥११॥ झालोद्यत्सुलतानाख्यं चौहाणं तं महाबलं ॥ रावं सबलसिंहाख्यं रघुनाथाख्यरावतं ॥ १२ ॥