भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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˙१५८˙ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कृष्णगढ़ (किशनगढ़) और रूपनगर के राजा मानसिंह की बहिन चारुमती अत्यंत सुंदरी थी, जिससे बादशाह औरंगज़ेब स्वयं विवाह करना चाहता था; परंतु वल्लभ-सम्प्रदाय की कट्टर अनु- [हाशिया: महारावत को पुनः गयासपुर और वसाड़ आदि परगने मिलना] यायी होने के कारण उसने मुसलमान बादशाह से विवाह करने की अपेक्षा मर जाना अच्छा समझ महाराणा राजसिंह के पास पत्र भेज अपनी रक्षा की प्रार्थना की। इसपर वि० सं० १७१७ (ई० स० १६६०) में महाराणा ने वहां जाकर उक्त राज- कुमारी से विवाह कर लिया। बसावर (बसाड़) और गयासपुर के परगने मेवाड़ में मिल जाने से महारावत हरिसिंह महाराणा से असंतुष्ट था। अब शाही कृपा प्राप्त करने का यह अच्छा अवसर जान उसने बादशाह के पास जाकर महाराणा के रूपनगर पहुंच विवाह करने तथा उसके देवलिया पर जुल्म करने की शिकायत की, जिसपर बादशाह ने महाराणा पर बिना आज्ञा रूपनगर में विवाह करने आदि का अपराध लगाकर गयासपुर तथा वसाड़ के परगने मेवाड़ से पृथक् कर पुनः महारावत हरिसिंह को प्रदान कर दिये१। इसपर महाराणा ने महारावत पर सेना भेजनी चाही, परंतु मुसाहबों की सलाह से उसने यह विचार स्थगित रख कोठारिया के चोंडावतं हकूम्सिंहं शक्तावत्तोत्तमं तथा ॥ एतान्पुरोगमान् कृत्वा एतेषां बाहुमाश्रयन् ॥ १३ ॥ स रावतो हरीसिंहो ययौ देवलियापुरात् ॥ आगत्य राजसिंहस्य राजेंद्रस्य पदे पतत् ॥ १४ ॥ रूप्यमुद्रा सुपंचाशत्सहस्राणि न्यवेदयत् ॥ मनरावत नामानं करिणं करिणीमपि ॥ १५ ॥ राजप्रशस्ति महाकाव्य; सर्ग आठवां। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ४३६। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ५४२।