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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 534 में से

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पृष्ठ 206

महारावत हरिसिंह १५६ रावत रुक्मांगद के पुत्र उदयकर्ण चौहान के साथ बादशाह के पास निम्न- लिखित आशय की अर्ज़ी भेजी— “मैंने आपकी शाहज़ादगी के शुभ समय से ही विशुद्ध भावनाओं के साथ विशेष कृपाओं के प्राप्त करने की आशाएं रखी हैं। अब यह आदेश प्राप्त होने पर कि हरिसिंह निरपराध था, हमने उसको बसावर और गयासपुर के परगने प्रदान किये हैं। अकबर और जहांगीर के समय से ही देवलिया मेरे पूर्वजों की हुकूमत में था। शाहजहां के समय दूसरी तरह हुआ, वह भी निवेदन हुआ होगा और इन परगनों को प्रदान करने के समय भी भाई अरसी (अरिसिंह महाराणा जगतसिंह प्रथम का दूसरा पुत्र) ने तीन-चार बार निवेदन किया। इसपर आज्ञा हुई कि बादशाहों का हुक्म सिकंदर की दीवार के समान मज़बूत है, वह कदापि नहीं बदलेगा, हृदय में विश्वास रख अधिकार करें। इस संबंध में इसी अभिप्राय की दो- तीन बार प्रार्थनाएं भेजकर निवेदन किया गया उसपर फ़रमान प्राप्त हुआ कि जिस तरह जानो अधिकार करो और काका जयसिंह के साथ भी यही संदेश प्राप्त हुआ। “तदनुसार मैंने अपने कर्मचारियों को कतिपय राजपूतों-सहित उन परगनों में भेजा। उसपर हरिसिंह ने आज्ञा के विरुद्ध बिना सोच-विचार किये बुरे अभिप्राय से परगनों की प्रजा को उभाड़कर शोर मचाया। वह थोड़े दिनों बाद उन परगनों को बिल्कुल उजाड़कर आप भी चला गया और अपने मनुष्यों को वहां छोड़ गया कि उस जगह को कभी आबाद न होने दें। आवश्यकता समझ शाही आज्ञानुसार एक जमीयत भी उस जगह भेजी। हरिसिंह प्रजा को उजाड़कर पहाड़ों में फिरता था। उसने खरीफ़ की फ़सल को तो इस तरह खोया और रबी की फ़सल को भी ख़राब कर प्रजा को दुःखित किया। उसने दोनों साखों को ऐसा खोया कि एक दाम भी उन परगनों का मेरे हाथ नहीं आया। जमीयत के खर्च और झंझट से मुझको बहुत हानि हुई और अब ऐसी आज्ञा हुई है। उस व्यक्ति को जो आज्ञा के विरुद्ध करे ऐसा हुक्म हो और वह व्यक्ति