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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 534 में से

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पृष्ठ 207

१६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास जो राजभक्ति में तत्पर रहा हो, उसे ऐसी आज्ञा हो। इस स्थिति में कुछ इलाज नहीं। न्याय आपके हाथ है । बाक़ी वृत्तांत हरिसिंह को परगनों के प्रदान करने का उदयकर्ण चौहान को रवाना करने के पीछे प्रकट हुआ, इसलिए उस संबंध में वह जो निवेदन करे उसे स्वीकार किया जावे'।” महाराणा की इस प्रार्थना से प्रकट है कि वसावर और गयासपुर के परगनों पर महाराणा को अधिकार करने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था और महारावत हरिसिंह की तरफ़ से बाधाएं उपस्थित की गईं, जिससे महाराणा को हानि उठानी पड़ी। महारावत का वसावर और गयासपुर पर कब अधिकार हुआ यह स्पष्ट नहीं है; किंतु महाराणा के कृष्णगढ़ विवाह करने जाने का समय राजप्रशस्ति में वि० सं० १७१७ ( ई० स० १६६० ) दिया है और चौहान उदयकर्ण वि० सं० १७१८ ( ई० स० १६६१ ) में महाराणा का प्रार्थनापत्र लेकर पहुंचा था, अतएव वि० सं० १७१८ ( ई० स० १६६१ ) के लगभग उसका वसावर और गयासपुर पर अधिकार हो जाना संभव है । शाही दरबार में महाराणा की तरफ़ से यह प्रार्थनापत्र उदयकर्ण ने पेश किया, परंतु वादशाह पर इसका कुछ भी प्रभाव न पड़ा और वसावर तथा गयासपुर पर महारावत का अधिकार स्थिर रहा । वादशाह ने महाराणा की तसल्ली के लिए फ़रमान और ख़ासा खिलअत देकर उदयकर्ण को रुख़सत दी और उसके साथ एक शाही अफ़सर भी भेजा, जिसने महाराणा को इस विषय में बहुत कुछ समझाया², तो भी महाराणा ने सेमलिया गांव से अपना थाना नहीं हटाया । इसपर महारावत ने अपने कुंवर प्रतापसिंह तथा अमरसिंह को बादशाही सेवा में भेजने की इच्छा प्रकट कर वहां से महाराणा का थाना हटा लेने की दरख्वास्त की। ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ४४०-२ । ( २ ) वही; द्वितीय भाग, पृ० ४४२-३ ।