भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 208

महारावत हरिसिंह १६१ शाही सरदार राजा रघुनाथ ने ता० २ रमज़ान सन् जुलूस ५ हि० स० १०७२ (वि० सं० १७१६ वैशाख सुदि ३ = ई० स० १६६२ ता० १० अप्रेल) को महारावत के नाम निम्नलिखित आशय का उत्तर भेजा- "इन दिनों जो पत्र तुमने अपने बेटे प्रतापसिंह तथा अमरसिंह को रवाना करने और उनको बादशाही सेवकों की सूची में शुमार किये जाने के संबंध में भेजा है, उसमें यह भी प्रकट किया है कि पहले राणा राजसिंह ने अपने मनुष्यों को धसाड़ परगने के गांव सेमलिया में, जो मेरे मुतल्लिक़ है, मुक़र्रर किया था। उन आदमियों ने जुल्म कर रक्खा है और बांसवाड़ा के ज़मींदार समरसी के बेटे' ने भी राणा राजसिंह के इशारे से थाना क़ायम किया था। बादशाह की सेवा में उपस्थित करने पर यह हुक्म सादिर हुआ है कि हमारा फ़रमान पहुंचने पर अपने बेटे प्रतापसिंह तथा अमर- सिंह को बादशाह की सेवा में भेज दो, जिनसे हालात दर्याफ्त करने के बाद बादशाही कृपा हो सकेगी। तुम्हारी इच्छा के मुताबिक हमने राणा (१) महाराणा राजसिंह (प्रथम) ने वि० सं० १७१६ (ई० स० १६५६) में बांसवाड़ा के स्वामी महारावल समरसिंह को अपने अधीन बनाया था, जिसका उसके मंत्री फ़तहचंद की बनवाई हुई बेड़वास की बावड़ी की वि० सं० १७२५ (ई० स० १६६८) की प्रशस्ति और राजप्रशस्ति महाकाव्य में उल्लेख है। संभव है महारावल की तरफ़ से उसका कुंवर कुशलसिंह, जो समरसिंह के पीछे वहां का स्वामी हुआ, कुंवरपदे में महाराणा की सेवा में रहता हो और उसको महाराणा ने उधर नियत किया हो। वि० सं० १७१७ (अमांत) भाद्रपद (पूर्णिमांत आश्विन) वदि १४ (ई० स० १६६० ता० २३ सितंबर) को महारावल समरसिंह का देहांत होने पर कुशलसिंह बांसवाड़े का स्वामी बना। इसके पीछे भी उसने कुछ समय तक महाराणा से संबंध बनाये रखकर वि० सं० १७१८ (ई० स० १६६१) में सेमलिया में महाराणा के संकेत से अपना थाना क़ायम रखा होगा। अनुमान होता है कि जब तक महाराणा राजसिंह पर बादशाह औरंगज़ेब की नाराज़गी नहीं हुई, तब तक महारावल कुशलसिंह महाराणा के प्रतिकूल नहीं हुआ। वि० सं० १७१७ (ई० स० १६६०) में चारुमती से कृष्णगढ़ में महाराणा का विवाह होने के बाद बादशाह उससे अप्रसन्न हो गया और उसकी अप्रसन्नता बढ़ती ही रही। इस अवसर पर महारावल कुशलसिंह भी महाराणा से प्रतिकूल हो गया होगा। २१