राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास राजसिंह को मौज़े सेमलिया से अपने आदमियों को हटा लेने के लिए हुक्म जारी करा दिया है और इस विषय में सैयद नवाज़िशखां ने भी निवेदन किया है कि फ़रमान के मुताबिक़ राणा राजसिंह को लिख दिया गया था कि अपनी जमीयत और समरसी के बेटे को सेमलिया से हटा ले, जिसकी तामील में उसने अपनी जमीयत और समरसी के बेटे को वहां से हटा दिया है। अब उक्त मौज़े में कोई नहीं है, इसलिए तुम उसको अपने अधिकार में कर लो और उचित प्रबंध कर वहां के निवासियों की तसल्ली का प्रयत्न करो१।” इसके थोड़े ही समय पीछे महारावत के पास बादशाह का इस आशय का फ़रमान पहुंचा—“तुम्हारी भेजी हुई अर्ज़ी क़ुतुबुद्दीनखां की मारफ़त हमारे मुलाहज़े से गुज़री। तुमने जो अपने बेटे को हमारी सेवा में भेजने को लिखा है, उसकी मंजूरी दी जाती है। तुम्हें चाहिये कि अपने बेटे को हमारी सेवा में भेज दो। बाद दर्याफ़्त हाल उसकी तसल्ली की जायगी और शाही कृपा से इज्ज़त दी जाकर खिलअत बख़्शी जायगी२।” इसपर महारावत ने अपने कुंवरों को शाही सेवा में रवाना किया, जिसका परिणाम लाभदायक हुआ और महाराणा की ओर से गयासपुर और वसावर के परगने मिलने के संबंध में बहुत कुछ प्रयत्न होने पर भी बादशाह ने उस ओर ध्यान न दिया। फिर महारावत ने अहमदाबाद के सूबे में अपनी नियुक्ति होने की बादशाही दरबार में प्रार्थना की। इसपर ता० २६ शव्वाल सन् जुलूस ७ हि० स० १०७४ (वि० सं० १७२१ ज्येष्ठ सुदि १ = ई० स० १६६४ ता० १६ मई) को वज़ीर ने महारावत को लिखा—“बसाड़ परगने के बहाल रहने और उसके अहमदाबाद में नियुक्त किये जाने के संबंध में परवाना भेजने के लिए उसने जो अर्ज़ी भेजी, वह मिल गई है। परगना बहाल रक्खा जाता है, पर अहमदाबाद में उसकी नियुक्ति नहीं की जा सकती, क्योंकि वह मालवा सूबे के अन्तर्गत है। उसे उसी सूबे में, (१) बादशाह औरंगज़ेब के फ़ारसी फ़रमान के हिन्दी अनुवाद से। २) बादशाह औरंगज़ेब के फ़ारसी फ़रमान के हिन्दी अनुवाद से।