राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत हरिसिंह˙ १६३ जिसमें वह है; अच्छी सेवां करनी चाहिये' ।" महारावत हरिसिंह की कर्तव्यनिष्ठा और राजभक्ति की शाही कर्म- चारियों ने समय-समय पर प्रशंसा की थी। ता० २५ रमज़ान सन् जुलूस १५ हि० स० १०८२ (वि० सं० १७२८ माघ वदि १२ = ई० स० १६७२ ता० १६ जनवरी) को शाहज़ादे मुहम्मद मुअज़्ज़म ने महारावत के नाम निशान भेज लिखा— "तुम्हारी उच्च स्वामिभक्ति का परिचय बादशाही कृपापात्र मोहब्बतखां-द्वारा मिल गया है। तुमको चाहिये कि सदा ऐसे ही बने रहो और समय-समय पर अपनी कुशलता का समाचार भेजते रहो२।"" महारावत हरिसिंह का पिछला इतिहास अप्राप्य है। उसका वि० सं० १७३० (ई० स० १६७३) के लगभग परलोकवास हुआ³। उसके महारावत का परलोकवास साथ उसकी दो राणियां राठोड़ आनंदकुंवरी और गौड़ मानकुंवरी (अजबकुंवरी) सती हुईं⁴। कुछ स्थल पर उसका परलोकवास वि० सं० १७३२ (ई० स० १६७५) में होना लिखा है; एवं वि० सं० १७३२ वैशाख सुदि १५ (ई० स० १६७५ ता० २६ अप्रेल) की डोराणा गांव की सनद भी उसके समय की ही बतलाई जाती है; परन्तु इसके विपरीत देवलिया की भोगीदास की बावड़ी की वि० सं० १७३१ फाल्गुन सुदि ७ (ई० स० १६७५ ता० २१ फ़रवरी) रविवार की प्रशस्ति५ (१) वज़ीर...खां के महारावत हरिसिंह के नाम के फ़ारसी पत्र के अंग्रेज़ी अनुवाद से। (२) शाहज़ादे मुअज़्ज़म के फ़ारसी निशान के अंग्रेज़ी अनुवाद से। (३) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ५। प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ८। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६२। (४) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ८। (५) संवत् १७३१ फागुण सुद ७ रविवासरे............