राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास में उस समय महारावत प्रतापसिंह के राजा होने का उल्लेख है। श्रावणादि वि० सं० १७३१ (चैत्रादि १७३२) ज्येष्ठ सुदि १० (ई० स० १६७५ ता० २४ मई) सोमवार की लिखी हुई 'कुंडप्रदीप' और श्रावणादि वि० सं० १७३१ (चैत्रादि १७३२) आषाढ वदि ७ (ई० स० १६७५ ता० ४ जून) शुक्रवार की लिखी हुई 'शास्त्र-दीपिका' नामक पुस्तकों में उस समय महारावत प्रतापसिंह को वहां का स्वामी बतलाया है। ऐसी स्थिति में महारावत हरिसिंह का देहांत वि० सं० १७३० (ई० स० १६७३) के आस-पास होना मानना पड़ेगा। डोराणा गांव की मूल सनद हमारे देखने में नहीं आई है अतएव उसकी सत्यता के विषय में सन्देह ही है। उसके दस राणियां थीं, जिनसे पांच कुंवर-प्रतापसिंह, अमरसिंह³, ॰॰॰रावतश्रीप्रतापसिंहजीविजयराज्ये शीशोद्यावंशे राजश्रीगोपालजीतत्सुत जोधाजी तस्यात्मजराजश्रीभोगीदासजी.........। मूल प्रशस्ति की छाप से। (१) संवत् १७३१ वर्षे ज्येष्ठमासे शुक्लपक्षे दशम्यां तिथौ सोमवासरे देवदुर्गे रावतश्रीप्रतापसिंहविजयराज्ये आमेदांज्ञातीयभट्टविद्या- धरतत्सुतभट्टमनोहरतत्सुतेन शोमजीभट्टेन लिखितं पुस्तकमिदम्॥ मूल पुस्तक का अंतिम भाग। (,२) संवत् १७३१ वर्षे आषाढमासे कृष्णपक्षे सप्तम्यां तिथौ शुक्रवासरे देवदुर्गे रावतश्रीप्रतापसिंहविजयराज्ये......। मूल पुस्तक का अंतिम भाग। (३) अमरसिंह के वंशधरों के ठिकाने साखथली और बगदावद रहे। फिर साखथली के ठाकुर दलपतसिंह का पुत्र मोहब्बतसिंह उपर्युक्त अमरसिंह के भाई मोहकमसिंह के प्रपौत्र हिम्मतसिंह का उत्तराधिकारी होकर सालिमगढ़ का स्वामी बना, इसलिए कुछ स्थलों पर सालिमगढ़वालों को अमरसिंह का वंशधर भी लिखा है।