राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 212, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमोहकमसिंह१, माधवसिंह२ तथा आनन्दसिंह—एवं तीन कुंवरियां— महारावत की संतति कल्याणकुंवरी, कुशलकुंवरी और सौभाग्यकुंवरी— हुईं३। उनमें से कुशलकुंवरी का विवाह बीकानेर के स्वामी महाराजा अनूपसिंह (राठोड़) से हुआ था, जिसके उदर से कुंवर स्वरूपसिंह का जन्म हुआ, जो वि० सं० १७५५ (ई० स० १६६८) में उक्त महाराजा का परलोकवास होने पर बीकानेर राज्य का स्वामी हुआ४। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात (पृ० ४-५) में कुंवर प्रतापसिंह का महारावत हरिसिंह की राणी हाड़ी मनभावनदे के उदर से, अमरसिंह का झाली जसकुंवरी के उदर से, मोहकमसिंह का राठोड़ मेड़तणी अनोपकुंवरी से और माधवसिंह का गौड़ अजबकुंवरी से जन्म होना बतलाया है; परंतु प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात (पृ० ८) में महारावत हरिसिंह की केवल नौ राणियों के ही नाम दिये हैं एवं उसमें कुंवर प्रतापसिंह, अमरसिंह, मोहकमसिंह और माधवसिंह के ही नाम होकर आनन्दसिंह का नाम नहीं है तथा उसकी कुंवरियों के नामों में कुशलकुंवरी और सौभाग्यकुंवरी के नाम न होकर अनोपकुंवरी और (१) मोहकमसिंह बड़ा वीर राजपूत था। कृष्णगढ़ के स्वामी महाराजा बहादुरसिंह रचित 'रावत प्रतापसिंह ने मोहोकमसिंह हरिसिंघोत देवगढ़ रा धणीरी वार्ता' नामक पुस्तक में उस (मोहकमसिंह) की वीरता की बड़ी प्रशंसा की है, जिसका आगे उल्लेख किया जायगा। उसके वंशधरों का ठिकाना सालिमगढ़ है। उसका मूल वंश उसके प्रपौत्र हिम्मतसिंह से नष्ट हो गया। तब उस (मोहकमसिंह) के भाई अमरसिंह के वंशधर दलसिंह का पुत्र मोहब्बतसिंह साखथली से आकर सालिमगढ़ का स्वामी हुआ। तब से अब तक उसके वंशधरों का वहां अधिकार है, जो प्रतापगढ़ राज्य के प्रथम वर्ग के सरदारों में हैं। (२) माधवसिंह के वंशधर अचलावदा के ठाकुर और प्रतापगढ़ राज्य के प्रथम वर्ग के सरदारों में है। (३) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ४-५ । (४) दयालदास की ख्यात; जि० २, पत्र ५८ । मेरा राजपूताने का इतिहास; जिल्द ५, प्रथम खण्ड, पृ० २७३ ।