भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत हरिसिंह १६६ और उसमें अक्षर खोदनेवाले सुनार का नाम केशव खुदा हुआ है एवं अंत में दो संस्कृत श्लोक हैं, जिनमें से दूसरे में विश्वनाथ को 'दीक्षागुरु' की उपाधि देने का उल्लेख है' । वह महारावत हरिसिंह का मंत्री था। प्रसिद्ध है कि उसने महारावत हरिसिंह की आज्ञानुसार सागवाड़ा (डूंगरपुर राज्य) से एक सहस्र हूंबड़ों को बुलाकर कांठल में आबाद किया था। वर्षा के वंशज वर्पावत कहलाते हैं। ( १ ) महाराज रावत श्रीहरिसिंहजी बचनात् भट विश्वनाथ जोग्य मोटो प्रसाद कीधो । मया कोरने गाम १ मोजे कीटखेड़ी दीधो उदक आघाट तांवापत्र करे दीधो देवल प्रतिष्ठा हुई जदी माताजी चहुआन रे देहरे दीधो आप दत्तेषु परदत्तेषु ये लुम्वन्ति वसुन्धराम ते नरा नरकं यान्ति यावच्चन्द्र दिवाकरौ । अणी गाम री कदी कपीत कर लागत व- राड कोई करवा न पावे। संवत १७०७(१) बरषे मास वैसाख सुदि १५ पुनम दिने गुरू लखतं स्वहस्ते दुवे साह वर्षा । आचंद्राकं यावत् श्री गोविन्द रे पट्टे पीढ़ी री पीढ़ी दीधौ खोदद्यो सोनी केशव । श्रीसिंहरावतसुतो यशवन्तसिंह- स्तत्संभवो विजयते हरिसिंहदेवः । तेन व्यधायि सुरसद्ममहाप्रतिष्ठा श्रीदेवदुर्गपुरिमालवराजधान्याम् ॥ १ ॥ तदा सोऽदात् कीटखेडी ग्रामं ब्रह्मास्पदं च यद् । विश्वनाथाय विदुषे दत्वा दीक्षागुरोः पदम् ॥ २ ॥ मूल ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से । विश्वनाथ जाति का तरवाड़ी मेवाड़ा ब्राह्मण था। उपर्युक्त ताम्रपत्र में उसको भट्ट लिखा है, जो उसकी उपाधि हो। 'हरिभूषण महाकाव्य' में कवि गंगाराम ने उसको व्याकरण, न्याय, मीमांसा दर्शन आदि शास्त्रों का ज्ञाता बतलाया है। इसी प्रकार महारावत प्रतापसिंह की प्रशंसा में पंडित कल्याण ने उक्त महारावत के समय प्रशस्ति की रचना की, उसमें भी उसका प्रशंसात्मक उल्लेख किया है। २२