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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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१७० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत हरिसिंह के दानपत्रों आदि की जो तालिका प्रतापगढ़ से पंडित जगन्नाथ शास्त्री-द्वारा प्राप्त हुई, उसमें उसके वि० सं० १६६७ माघ सुदि १० ( ई० स० १६४१ ता० ११ जनवरी ) के एक दानपत्र का उल्लेख है । इसी प्रकार वि० सं० १७०५ वैशाख सुदि १५ ( ई० स० १६४८ ता० २७ अप्रेल ) गुरुवार के दानपत्र में उसका माधव भट्ट को हरिद्वार में भूमि दान करने का उल्लेख है तथा वि० सं० १७२० वैशाख सुदि ११ ( ई० स० १६६३ ता० ७ मई ) के दानपत्र में भी उस ( माधव भट्ट ) को परतावखेड़ा और वसाड़ दान करना लिखा है । इन दानपत्रों की छापें अथवा प्रतिलिपियां हमारे पास नहीं आई हैं, तो भी यह कहा जा सकता है कि महारावत हरिसिंह को बसाड़ का परगना वि० सं० १७२० ( ई० स० १६६३ ) के पूर्व मिल गया था । उक्त महारावत के इसके पीछे के भी दानपत्र मिले हैं । उनमें से एक में छन्याखेड़ी गांव में देराश्री पमाद को दस बीघा भूमि दान करने का उल्लेख है । उसकी छाप हमारे पास आई है, किन्तु उसमें खुदा हुआ सम्वत् अस्पष्ट है । महारावत हरिसिंह विद्वान् राजा था । उसकी सभा में अच्छे-अच्छे विद्वान् रहा करते थे, जिनका वह पूर्ण सम्मान करता था । उसने स्वयं महारावत का साहित्या- अपने दरबारी कवि पंडित जयदेव-रचित 'हरिविजय नुराग नाटक' पर 'सुबोधिनी' टीका बनाई थी तथा व्याकरण पर 'हरिसारस्वत' की वि० सं० १७२२ कीटखेड़ी गांव कई वर्ष पूर्व राज्याधिकार में आ गया था । उसे परलोकवासी महारावत रघुनाथसिंह ने अजमेर के सुप्रसिद्ध राजवैद्य पंडित रामदयालु शर्मा और उसके सुयोग्य पुत्र डॉक्टर अंबालाल शर्मा आयुर्वेद-शास्त्री को अपनी अस्वस्थता के अवसर पर सुचारु रूप से चिकित्सा करने के पुरस्कार में संवत् १६८३ ( ई० स० १६२६ ) में प्रदान किया । ( १ ) हरिममलमुपास्य दिव्यरूपं जलधिसुताच्छवपुःसमाश्रिताङ्गम् । वरहरिविजये विरच्यतेऽस्मिन् स्तुत हरिणा हरिणा सुबोधिनीयम् ॥