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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 534 में से

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पृष्ठ 218

महारावत हरिसिंह १७१ (ई० स० १६६५) में रचना की थी¹। उसके साहित्यानुराग से प्रेरित होकर उसके समय में उसके आश्रित विद्वानों-द्वारा कई ग्रंथों की रचना हुई; जिनमें से कुछ का पता लगा है, जिनका उल्लेख नीचे किया जाता है— हरिभूषण महाकाव्य—इसका रचयिता माधव भट्ट का पुत्र गंगाराम अपने को मेदपाटीय भट्ट (भटमेवाड़ा ब्राह्मण) लिखता है¹। यह काव्य अपूर्ण है और इसके नौ सर्ग हैं। प्रत्येक सर्ग के अंत में 'इति श्री' देकर उसने अपना परिचय दिया है, किन्तु नवें सर्ग में 'इति श्री' नहीं है और महारावत हरिसिंह के राजकुमार प्रतापसिंह का अधूरा वर्णन है। यह काव्य देवलिया के महारावत हरिसिंह तक के राजाओं के इतिहास पर कुछ-कुछ प्रकाश डालता है, जिसका यथा-प्रसङ्ग ऊपर उल्लेख किया गया है। महारावत हरिसिंह के वर्णन में इसमें राजकुमार प्रतापसिंह, पुरोहित कल्याणदास, कथान्यास गोदाभट्ट, सभापंडित विश्वनाथ, मंत्री शाह वर्णा, कोषाध्यक्ष केशव एवं महारावत के दो सेवकों कल्लू और योध का भी उल्लेख है। ग्रंथ के अपूर्ण होने से इसके रचना-काल का पता नहीं चलता। इसमें उसने राजकुमार प्रतापसिंह को बालक बतलाया है इति श्रीमत्सांधिविग्रहिक-शिरोरत्नमुख्यविद्वद्वन्दारकपुरन्दरश्रीमहा- राजाधिराजश्रीहरिसिंहविरचितायां सुबोधिन्यां सप्तमोऽङ्कः। (१) श्रीमच्छ्रीयशवन्तभूपतिलकश्चाम्पल्लदेवी च यं प्रासूतामलविग्रहं ग्रहगणाधीशप्रभं भासुरम् । तेन श्रीजयदेवभूसुरसखेनोधद्गुणेनोद्धते श्रीमच्छ्रीहरिभूभुजेति रचिते सारस्वते तद्धिताः। द्वि-द्वि-सप्तेन्दु-संख्येऽब्दे(१७२२) मासे दामोदरे वरे । सारस्वतमदोऽकारि हरिणा हरितुष्टये ॥ इति श्रीमहाराजाधिराजमहाराजदेवदुर्गाधीशसांधिविग्रहिक-रावतश्री- हरिसिंहदेवविरचितं सारस्वतम् ॥