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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

महारावत हरिसिंह १७१ (ई० स० १६६५) में रचना की थी¹। उसके साहित्यानुराग से प्रेरित होकर उसके समय में उसके आश्रित विद्वानों-द्वारा कई ग्रंथों की रचना हुई; जिनमें से कुछ का पता लगा है, जिनका उल्लेख नीचे किया जाता है— हरिभूषण महाकाव्य—इसका रचयिता माधव भट्ट का पुत्र गंगाराम अपने को मेदपाटीय भट्ट (भटमेवाड़ा ब्राह्मण) लिखता है¹। यह काव्य अपूर्ण है और इसके नौ सर्ग हैं। प्रत्येक सर्ग के अंत में 'इति श्री' देकर उसने अपना परिचय दिया है, किन्तु नवें सर्ग में 'इति श्री' नहीं है और महारावत हरिसिंह के राजकुमार प्रतापसिंह का अधूरा वर्णन है। यह काव्य देवलिया के महारावत हरिसिंह तक के राजाओं के इतिहास पर कुछ-कुछ प्रकाश डालता है, जिसका यथा-प्रसङ्ग ऊपर उल्लेख किया गया है। महारावत हरिसिंह के वर्णन में इसमें राजकुमार प्रतापसिंह, पुरोहित कल्याणदास, कथान्यास गोदाभट्ट, सभापंडित विश्वनाथ, मंत्री शाह वर्णा, कोषाध्यक्ष केशव एवं महारावत के दो सेवकों कल्लू और योध का भी उल्लेख है। ग्रंथ के अपूर्ण होने से इसके रचना-काल का पता नहीं चलता। इसमें उसने राजकुमार प्रतापसिंह को बालक बतलाया है इति श्रीमत्सांधिविग्रहिक-शिरोरत्नमुख्यविद्वद्वन्दारकपुरन्दरश्रीमहा- राजाधिराजश्रीहरिसिंहविरचितायां सुबोधिन्यां सप्तमोऽङ्कः। (१) श्रीमच्छ्रीयशवन्तभूपतिलकश्चाम्पल्लदेवी च यं प्रासूतामलविग्रहं ग्रहगणाधीशप्रभं भासुरम् । तेन श्रीजयदेवभूसुरसखेनोधद्गुणेनोद्धते श्रीमच्छ्रीहरिभूभुजेति रचिते सारस्वते तद्धिताः। द्वि-द्वि-सप्तेन्दु-संख्येऽब्दे(१७२२) मासे दामोदरे वरे । सारस्वतमदोऽकारि हरिणा हरितुष्टये ॥ इति श्रीमहाराजाधिराजमहाराजदेवदुर्गाधीशसांधिविग्रहिक-रावतश्री- हरिसिंहदेवविरचितं सारस्वतम् ॥

१७२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास और उसकी बाण-विद्या की प्रशंसा की है, अतएव इस काव्य की रचना के समय प्रतापसिंह के १०-१२ वर्ष का होने का अनुमान होता है । राजकुमार प्रतापसिंह के वि० सं० १७१६ ( ई० स० १६६२) में शाही दरबार में जाने के संबंध के एक पत्र का ऊपर उल्लेख किया गया है । उस समय उसकी आयु कम से कम २० वर्ष होनी चाहिये, इस अनुमान से 'हरिभूषण महाकाव्य' का रचना-काल वि० सं० १७१०-१७१२ ( ई० स० १६५३-१६५५ ) के बीच हो सकता है¹ । हरिविजय नाटक- यह नाटक पंडित जयदेव ने महारावत हरिसिंह के नाम पर देवलिया में रचा था और महारावत के सभासदों के अवलोकनार्थ वहां इसका अभिनय भी हुआ था। इसमें कृष्ण-द्वारा रुक्मिणीहरण का प्रसङ्ग है। इसका रचना-काल शक संवत् १५७६ (वि० सं० १७१४ = ई० स० १६५७) का कार्तिक मास दिया है²। जयदेव तरवाड़ी-मेवाड़ा ब्राह्मण था और मेहता उसकी उपाधि थी । उक्त महारावत ने उसको अपनी रचना में 'भूसुरसखा' शब्द से संबोधन किया है । उसका उल्लेख पाटरया गांव के महारावत ( १ ) उद्यन्निर्मलमेदपाटविलसद्धंशैकचूडामणि श्रीमन्माधवभट्टसूरितनयो दिक्कक्रविख्यातधीः । गङ्गाराममहाकविर्व्यवरचयत् काव्यं सुधासोदरं तस्मिञ्छ्रीहरिभूषणे सुचरिते सर्गोह्यगादष्टमः ॥ ४३ ॥ सर्ग आठवां । ( २ ) कविवरजयदेवदिव्यगुम्फे नृपहरिसिंहसमाजदर्शनीये । इति हरिविजयेऽस्तुसप्तमाङ्कोवितमहो हरिविश्वनाथतुष्टयै ॥ संसाराभयलिप्सुना गुणगृहं श्रीमन्महानाटकं विद्वच्छ्रीजयदेवकेन नगरे श्रीदेवदुर्गे कृतम् । शाके नंदहयेषुचंद्रक्रमिते (१५७६) पक्षे सिते कार्तिके संपूर्णा खलु रूपकं हरिगुणं भूयाद्धरीप्रीतये !

महारावत हरिसिंह १७३ प्रतापसिंह के समय के वि० सं० १७३३ (ई० स० १६७७) के संस्कृत दानपत्र में भी है। वह संस्कृत का अच्छा विद्वान् था। 'हरिविजय नाटक' में उसने प्रसिद्ध बापारावल (कालभोज) और उसके पुत्र खुम्माण का उल्लेख करते हुए महाराणा मोकल के पुत्र क्षेमकर्ण से लगाकर सूरजमल, बाघसिंह, रामसिंह, विक्रमसिंह, तेजसिंह, सिंहा, जसवंतसिंह, हरिसिंह, तथा उसके कुंवर प्रतापसिंह का संक्षेप से उल्लेख किया है । इससे पाया जाता है कि उसको इतिहास का भी ज्ञान था । : विष्णु सहस्रनाम की टीका-महाभारत के भीष्मपर्व में भगवान् विष्णु के सहस्र नामों का वर्णन है, जिनका प्रत्येक व्यक्ति बड़ी श्रद्धा से पाठ करता है । इसकी टीका उपर्युक्त कवि जयदेव ने वि० सं० १७२४ आश्विन कृष्ण ६ (ई० स० १६६७ ता० २६ अगस्त) को की थी'। ( १ ) गुणगृहं जयदेवमहीसुरः स कृतवान् मननव्यपदेशतः । हरिमहीपतितुष्टिकरामिमां सुविवृतिं हरिनामहस्रगाम् ॥ आसीत्सिंहनृपो नृपालविलसद्भालावलीभूषण- स्तज्जः श्रीयशवन्त रावत इति ख्यातः प्रभुर्भूभुजाम् ॥ तज्जः श्रीहरिसिंहरावत इति प्राप्तः प्रथां भूतले तेनेयं विवृतिः कृता द्विजवचः प्रत्यारवाडम्बरैः ॥ वेदद्वयद्रिकुहायने(१७२४)ऽश्वयुजि मासंगे तिथौ कृष्णागे पूर्णेयं विवृतिर्हरेर्गुणलसन्नाम्नां जगद्धानिधेः । यस्यान्तःसरसीरुहे विलसति प्रोद्बोधहंसोऽनिशं चन्द्रार्कानलदीप्तरश्मिविततिप्रध्वस्तभावान्धकृत् ॥ इति श्रीमद्गौतमेश्वरपालितललितदुर्गमदुर्गविभूषणश्रीदेवगढेश्वर- महाराजाधिराजरावतश्रीहरिसिंहदेवकारिता श्रीजगदीश्वरसहस्रनामसुविवृतिः संपूर्णा ।

१७४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

हेमाद्रिप्रयोग-मूल-ग्रंथ प्रसिद्ध विद्वान् हेमाद्रि ने बनाया था। प्रतापगढ़ के पंडित जगन्नाथ शास्त्री की भेजी हुई महारावत हरिसिंह के समय की निर्मित पुस्तकों की सूची में 'हेमाद्रिप्रयोग' का नाम होकर उसके आरंभ का श्लोक दिया है, जिससे ज्ञात होता है कि उपर्युक्त पंडित जयदेव ने महारावत हरिसिंह के समय हेमाद्रि के मूल ग्रंथ के आधार पर उसे परिवर्तित कर संक्षिप्त रूप में बनाया हो¹। हृदयप्रकाश-हृदयेश-रचित यह संगीत का ग्रंथ अधिकतर नष्ट हो गया है, जिससे इसका रचना-काल और ग्रंथकर्त्ता का विशेष परिचय ज्ञात नहीं हो सका, परंतु इसके कुछ पन्ने मिल गये हैं, जिनसे इसका महारावत हरिसिंह के समय बनना पाया जाता है²। गोपालार्चनचंद्रिका-संभवतः यह विष्णुपूजा संबंधी ग्रंथ हो। इसके रचयिता ने अपना नाम न देकर अपने को कृष्ण मिश्र का पुत्र बत- लाया है। इसकी रचना का समय शक संवत् १५८३ (विक्रम संवत् १७१८) श्रावण वदि ४ (ई० स० १६६१ ता० ५ जुलाई) दिया है और महारावत हरिसिंह की आज्ञा से इसकी रचना होने का उल्लेख किया है³।

(१) जयदेवेन रचितः प्रयोगः पापनाशनः । भूभुजा हरिसिंहेन कृतः श्रीकृष्णवासरे । (२) संगीतशास्त्रसर्वस्वमसाधारणगोचरः । वीणादौ रागमेलादिर्हृदयेशेन कथ्यते ॥ इति श्रीममहाराजाधिराज-महाराजश्रीदेवदुर्गाधीशश्रीहरिसिंहविजयराज्ये श्रीहृदयनारायणदेवविरचितो हृदयप्रकाशः । (३) शाकेवह्निगजार्चि( र्थि )भूमिसहिते पक्षे च शुक्लेतरे मासेश्रावणसंज्ञिके शशि( ? )दिने श्रीमच्चतुर्थ्यातिथौ । आदेशान्नृहरेर्नृपस्य कृतिनामानन्दसंदायिनीं गोपालार्चनचन्द्रिकां रचितवान् कंसारिमिश्रात्मजः ॥

महारावत हरिसिंहः १७५

हरिंपिंगल—यह ग्रंथ काव्यरचना के लक्षणों पर कवि जोग ने वि० सं० १७२० (चैत्रादि १७२१) ज्येष्ठ सुदि ५ (ई० स० १६६४ ता० १६ मई) गुरुवार को बनाया था। कवि जोग का इस ग्रंथ में परिचय नहीं है; परंतु रचना से वह भाषा साहित्य का प्रौढ़ विद्वान् ज्ञात होता है। उसने भाषा साहित्य के प्रायः अनेक ग्रंथों का मज्जन कर उक्त ग्रंथ की रचना की थी। महारावत हरिसिंह विद्वान् और गुणग्राहक नरेश था। प्रतापगढ़ के नरेशों में सर्वप्रथम उसने ही शाही दरबार से अपना संबंध बढ़ाकर महारावत का व्यक्तित्व मेवाड़ राज्य के अधिकार में गये हुए अपने राज्य को मुक्त किया। वह बादशाह शाहजहां और उसके शाहज़ादों का पूर्ण विश्वासपात्र था। नीतिकुशल होने के कारण उसने शाहज़ादों के किसी युद्ध में भाग न लिया। वह ईश्वरभक्त, मेधावी और योग्य शासक था। अपने राज्य को संपन्न करने के लिए उसने अन्य राज्यों से व्यापारियों को बुलाकर अपने यहां बसाया, जिससे देश की आर्थिक स्थिति सुधरी। वह दानशील और उदार राजा था। गोवर्द्धननाथ के मंदिर की प्रतिष्ठा के अवसर पर उसने अपनी माता से स्वर्ण की तुला करवाई थी। उसका आस-पास के अन्य राजाओं से मित्रता का व्यवहार था। अपनी रचना में उसने 'सांधिविग्रहिक' उपाधि से अपने को अलंकृत किया है, जिससे पाया जाता है कि उसको ऐसी कोई उपाधि प्राप्त हुई हो। वह विद्वानों का सम्मान कर उनको अपने यहां रखता था, जिससे उसके समय

(१) जे जे कवियण जिंहमें तिण तिण करे प्रणाम । जोगे पिंगल बांधिओ दे हरिपिंगल नाम ॥ पुष गुर पंचम जेठ सुद अमरत योग विचार । सतरहशे विशे समत हरिपिंगल विशतार ॥ रावत हरे रचाविओ हरिपिंगल सानन्द । छन्द जवाहर पाराविण चुण चुण ल्यो कवि-अंद ॥

१७६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास में कई ग्रंथों की रचना हुई। राज्य अधिक बड़ा न होने पर भी उसने अपने समय में कितने ही गांव ब्राह्मणों आदि को दान में दिये थे। उसका शरीर सुगठित और बलिष्ठ था। कवि गंगाराम ने 'हरिभूषण-महा- काव्य' की उसके नाम पर रचनाकर उसमें उसकी बहुत कुछ प्रशंसा की है, जो अत्युक्तिपूर्ण होने पर भी उसके गुणों पर अच्छा प्रकाश डालती है¹।

( १ ) नोष्णीशं शिरसि स्थितं दशशतच्छिद्रोऽपि नो कञ्चुको मालिन्यं न मुखे न चास्य सहगो दारिद्र्यनामा सखा। नो जानन्त्यवलोकितानपि पतींश्चित्रं कवीनां स्त्रियः शक्रादप्यधिकान्मनोंभवतनूंस्त्वद्दानलीलायितात् ॥ १७ ॥

येषां वेश्मनि जीर्णकोद्रवकरणैः क्षुद्रोदरं पूर्यते क्षुन्निद्रां हरते विमोचयति सा तन्द्रापराधीनता। वीर श्रीहरिसिंह तेऽपि कवयस्त्वद्दानलीलायिता- न्मातङ्गाधिपमारुहन्ति तुरगान्कृत्वा पुरः सज्जितान् ॥१८॥...

को वा तिष्ठति भूपतिः प्रथमतः श्रीदेवलेन्द्रप्रभोः साम्यं किञ्चिदुपेति वीर भवतो भूमण्डलाखण्डल । युद्धक्रुद्धपिनद्धवर्मसुभटे यत्खङ्गसंघट्टनाद् भ्रश्यद्वह्निकणैकदेशवडवावहिर्दहत्यम्बुधिम् ॥ २१ ॥...

युद्धे कर्मणि हस्तचर्मणि दृढं देहोल्लसद्धर्मणि प्रारूढे त्वयि वाहिनीबलिकोरेऽत्युच्चैस्तुरुष्कार्वणि। दृष्ट्वानेकमहीशसुन्दरवरान्नयन्ति देवाङ्गना धूलीदुर्गमुपेत्य भानुरवति स्वीयं वपुः प्रायशः ॥ २५ ॥

सर्ग आठवां ।

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महारावत प्रतापसिंह

महारावत प्रतापसिंह १७७

प्रतापसिंह वि० सं० १७३० (ई० स० १६७३) के लगभग महारावत हरिसिंह [राज्य-प्राप्ति] का परलोकवास हो जाने पर उसका ज्येष्ठ कुंवर प्रतापसिंह देवलिया का स्वामी हुआ। उसकी गद्दीनशीनी के थोड़े ही दिनों बाद बादशाह औरंगज़ेब ने सन् जुलूस १७ (हि० सन् १०८५ = वि० सं० १७३१ = ई० स० १६७४) में [महारावत को खिलअत तथा मंसब मिलना] उसको चार सौ ज़ात और तीन सौ सवारों का मंसब देकर तनख्वाह के एवज़ में जागीर तथा ख़िल- अत प्रदानकर ता० ८ रबीउस्सानी (आषाढ सुदि १० = ता० ३ जुलाई) को उसके पास इस आशय का फ़रमान भेजा—"तुमने अपनी अर्ज़ी में जागीर सौंपी जाने के संबंध में प्रार्थना कर चार वर्ष के भीतर ७०००० रुपये सूबे मालवे के शाही ख़ज़ाने में दाख़िल करना स्वीकार किया है। अपनी तरफ़ से कृपा दिखलाने के लिए हमने तुमको ४०० ज़ात और ३०० सवारों का मंसब देने के साथ ही जागीर और खिलअत बख़्शी है। इसकी पहुंच से सूचित करो। मालवे के सूबे के नाज़िम को प्रसन्न करने का तुमको पूरा उद्योग करना चाहिये¹।" महारावत प्रतापसिंह की गद्दीनशीनी के पीछे सात वर्ष तक मेवाड़ में महाराणा राजसिंह राज्य करता रहा। उक्त महाराणा और महारावत [शाही दरबार से महाराणा राजसिंह और महारावत की तक़रार की जांच के लिए शेख़ इनायतुल्ला का भेजा जाना] प्रतापसिंह के बीच झगड़ा बना ही रहा। महा- रावत ने इस सम्बन्ध में शाही दरबार में अपनी फ़रियाद पहुंचाई। इसपर बादशाह औरंगज़ेब ने तहक़ीक़ात के लिए शेख़ इनायतुल्ला को नियत किया और महारावत के नाम नीचे लिखा आज्ञापत्र भेजा— "इन दिनों तुम्हारी भेजी हुई अर्ज़ी से तुम्हारी और राणा राजसिंह की लड़ाई का हाल ज्ञात हुआ। हमारे हुज़ूर से यह हुक्म दिया जाता है कि (१) बादशाह औरंगज़ेब के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद। २३

१७८. प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हमारा आदमी जाकर इस बात की तहक़ीकात करे। इसलिए शेख इनायतुल्ला नियत किया जाता है कि वह पूरा हाल मालूम कर जो वास्त- विकता हो वह हमारे सामने निवेदन करे। यदि अभी तक युद्ध हो रहा हो तो शेख उसे रोक देगा। उम्मेद है कि हमारी आज्ञा के अनुसार कार्य किया जायगा'।” मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने बादशाह की इच्छा के विरुद्ध श्रीनाथजी आदि की मूर्तियों को मेवाड़ में रखा; जज़िया के संबंध में [मेवाड़ पर बादशाह] बादशाह को बड़ा कठोर पत्र लिखा और जोधपुर [औरंगज़ेब की चढ़ाई और] के महाराजा जसवंतसिंह के बालक पुत्र अजीतसिंह [महारावत के नाम फ़रमान] को अपने यहां आश्रय दिया। इन सब कारणों से [पहुंचना] बादशाह महाराणा से अप्रसन्न हो गया और उसने उसको सज़ा देने का विचार कर अपने शाहज़ादों को, जो बाहिर सूबों पर नियत थे, मेवाड़ में सेना-सहित जाने की आज्ञा भेजी। फिर वि० सं० १७३६ (ई० स० १६७६) में बादशाह ने स्वयं अजमेर जाकर मेवाड़ पर चढ़ाई की। इस अवसर पर सन् जुलूस २३ (हि० सन् १०६० = वि० सं० १७३६ = ई० स० १६७६) में बादशाह ने महारावत के नाम नीचे लिखा फ़रमान भेजा- “ता० ७ ज़िल्काद (मार्गशीर्ष सुदि ६ = ता० १ दिसंबर) को हमारी बहा- दुर सेना राणा राजसिंह को सज़ा देने के लिए अजमेर से प्रस्थान करेगी। इसलिए यह फ़रमान भेजा जाता है कि राणा के इलाक़े को लूटने के लिए अपने आदमी नियत कर दो और स्वयं मंदसोर में रहकर हमारी सेना के लिए रसद का प्रबंध करो, क्योंकि हम ता० २१ ज़िल्काद (पौष वदि ८ = ता० १५ दिसंबर) को रवाना होकर मंदसोर पहुंचेंगे। राणा से बदला लेने की तुम्हारी सदैव इच्छा रही है, अतएव यह अवसर तुम्हें सौभाग्य से मिल गया है। तुम्हें चाहिये कि राणा के इलाक़े में, जो तुम्हारी ज़मींदारी से मिला हुआ है, लूट से वरी न समझो और जिस क़द्र लूट-खसोट तुमसे उसके इलाक़े में हो सके उसमें कमी न करो। इस काम को बादशाही आज्ञा के अनुसार अपनी ( १ ) बादशाह औरंगज़ेब के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद।

प्रतिष्ठा-वृद्धि का कारण समझो, तथा स्वामीभक्ति-पूर्ण सेवा-भावना से शाही कृपा और पुरस्कारों के उम्मीदवार रहो । जिस मार्ग से हम मंदसोर जाते हैं, देवलिया वहां से छः-सात कोस रहता है । तुम हमारे मंदसोर पहुंचने पर अच्छे आदमियों के साथ उपस्थित होकर हमारे दर्शनों का लाभ प्राप्त करो और नियत की हुई सेवा को अपनी उन्नति का उत्तम साधन समझो' ।" इसपर महारावत प्रतापसिंह भी अपनी सेना-सहित मंदसोर में बादशाह के पहुंचने पर शाही सेना के शामिल हो गया । फिर वहां से बाद- शाह ने अपनी विशाल सेना के साथ मेवाड़ में प्रवेश किया और उदयसागर तक जा पहुंचा । शाहज़ादे मुअज्जम, आज़म और अकबर भी मेवाड़ में पहुंच गये और बादशाह की आज्ञानुसार भिन्न-भिन्न मार्गों से उन्होंने महाराणा राजसिंह पर आक्रमण किया । कई महीनों तक शाही फ़ौज और महाराणा की सेना के बीच युद्ध होता रहा । जब बादशाह को शीघ्र मेवाड़ के युद्ध में विजय-प्राप्ति की आशा न दीख पड़ी तो वह वहां से पीछा चित्तौड़ होता हुआ अजमेर लौट गया । उसने मेवाड़ को विजय करने का भार शाहज़ादे मुअज्जम, आज़म और अकबर पर छोड़ा, जो महाराणा के हमलों को रोकने एवं उसपर आक्रमण कर उसका बल तोड़ देने के लिए नियत थे । इस अवसर पर मारवाड़ के राठोड़ सरदार वीर दुर्गादास आदि भी मेवाड़ में रहने के कारण महाराणा के साथ थे। राठोड़ों और सीसोदियों की सम्मिलित सेना ने शाही फ़ौज का वीरतापूर्वक मुक़ाबला किया । महाराणा के कुंवर जयसिंह ने चित्तौड़ के पास शाही सेना पर आक्रमण कर उसको छिन्न-भिन्न किया । कुंवर भीमसिंह ने गुजरात में जाकर शाही इलाक़े को खूब लूटा और कई मसजिदों को गिरवा दिया। महाराणा के मन्त्री दयालदास ने भी मालवे में जाकर लूट-मार मचाई, जिससे अधिक दिनों तक शाही सेना के पैर मेवाड़ में न टिक सके और शाहज़ादे भी हिम्मत हार गये । (१) बादशाह औरंगज़ेब के फ़ारसी फ़रमान का अनुवाद ।

१८० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत प्रतापसिंह, इस युद्ध के समय बादशाह के पक्ष में था और संभवतः मालवे की तरफ़ नियत था। उसने अपनी कारगुज़ारी की दर्खास्त शाहज़ादे मुअज्जम के पास, जो देबारी (उदयसागर के निकट) में नियत था, भेजी। उसके उत्तर में सन् जुलूस २३ ता० २ शाबान (हि० सन् १०९१ = वि० सं० १७३७ भाद्रपद सुदि ३ = ई० स० १६८० ता० १७ अगस्त) को उक्त शाहज़ादे ने महारावत के नाम इस आशय का निशान भेजा— "तुमने अपनी सेवाओं की पुख्तगी के लिए हमारे मुसाहबों के द्वारा अर्ज़ी भेज हमारे पास उपस्थित होने की इच्छा प्रकट की है, इसलिए हमने अपने विश्वासपात्र और प्रतिष्ठित कर्मचारी वृंदावन के द्वारा तुमको हाज़िर होने की इजाज़त दी है। उम्मीद है कि तुम रवाना हो गये होगे। अगर रवाना न हुए हो तो अब फ़ौरन हाज़िर हो¹।" शाहज़ादों ने महाराणा पर विजय पाने के लिए यथासाध्य उद्योग किया, परंतु उसमें उनको सफलता न मिली। इसी बीच महाराणा राजसिंह वि० सं० १७३७ (ई० स० १६८०) में परलोक सिधारा और उसका कुंवर जयसिंह मेवाड़ का महाराणा हुआ। उसने भी अपने पिता की भांति शाही सेना से युद्ध जारी रखा और बादशाह के घर में झगड़ा मचाने के लिए दुर्गादास आदि राजपूतों ने शाहज़ादे अकबर को बादशाह बनाने का लालच देकर अपनी तरफ़ मिला लिया, परन्तु इस प्रयत्न में उन्हें सफलता न मिली। उन दिनों दक्षिण में मरहटों का उपद्रव बढ़ रहा था, इसलिए राजपूताने के उपद्रव को मिटाकर बादशाह शीघ्रतापूर्वक उधर जाने को उत्सुक था। निदान महाराणा के कुटुंबी श्यामसिंह (गरीबदास का पुत्र, जो शाही सेवा में रहता था) के द्वारा संधि कर लेने का सन्देश पहुंचने पर वि० सं० १७३८ (ई० स० १६८१) में बादशाह और महाराणा जयसिंह के बीच संधि हो गई। तब शाही सेना मेवाड़ से लौट गई। बादशाह और महाराणा के बीच की लड़ाई के समय महारावत प्रतापसिंह, शाही सेना में किस स्थान पर नियत था और उसने युद्ध में (१) शाहज़ादे मुअज्जम के फ़ारसी निशान का अनुवाद।

महारावत प्रतापसिंह १८४ कैसी वीरता दिखलाई, इसका पता नहीं चलता। बादशाह के उपर्युक्त फ़रमान से तो यही जान पड़ता है कि देवलिया से मिले हुए महाराणा के इलाक़े को लूटने आदि के लिए ही उसकी नियुक्ति की गई हो। प्रतापगढ़ राज्य के कुशलपुरा गांव में, जो झांतला ठिकाने का गांव है, एक स्मारक चबूतरा बना हुआ है, जिसपर वि० सं० १७६८ (ई० स० १७११) का लेख खुदा है। उसका सारांश यह है कि वि० सं० १७३७ (ई० स० १६८०) में रावत महासिंह मृत्यु को प्राप्त हुआ, जिसका स्मारक वि० सं० १७६८ (ई० स० १७११) में राव (त) देवीसिंह ने बनवाया १ । रावत महासिंह और देवीसिंह कहां के सरदार थे, प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त ऐतिहासिक साधनों से इसका पता नहीं चलता; परंतु उदयपुर राज्य के संबंध की प्राप्त ऐतिहासिक सामग्री से पाया जाता है कि उदयपुर पर बादशाह औरंगज़ेब की चढ़ाई हुई, उस समय महाराणा की सेना में बेगूं का सरदार रावत महासिंह चूंडावत भी विद्यमान था एवं जब महाराणा की सेना का शाहज़ादे अक़बर की फ़ौज से मुक़ाबला हुआ, उस समय उसने बड़ी वीरता दिखलाई थी। शाहज़ादा अकबर इस युद्ध के समय चित्तौड़ से लगाकर नीमच, मंदसोर और उदयपुर तक महाराणा की सेना से लड़ने, रसद लूटने, रिआया को पकड़कर क़ैद करने आदि के लिए नियत था। कुशलपुरा गांव नीमच से मिला हुआ है। संभव है रावत महासिंह के उधर से बढ़कर शाही सेना पर आक्रमण करने पर वह शाही फ़ौज और प्रतापगढ़ राज्य की सेना से, जो विशेषतः मालवे की ओर नियुक्त थी, लड़कर काम आया हो तथा उसका स्मारक उसके वंशज देवीसिंह ने, जो वि० सं० १७६८ (ई० स० १७११) में विद्यमान था, कुशलपुरा में बनवाया हो। (१) संवत १७३७ रावत श्री माहासींघजी राम कयो बायां च्यार काठा चढ्या संवत १७६८ चौतरो बणयो राव्त(वत) श्री देवीसींघजी .................. । मूल शिलालेख की छाप से।

१८४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शाहज़ादे आज़म के द्वारा महाराणा जयसिंह और बादशाह औरंग- ज़ेब के बीच संधि हो जाने पर बादशाह को उधर का खटका न रहा। फिर शाहज़ादे मुअज्जम का उसने दक्षिण की तरफ़ कूच किया। इस अवसर महारावत के नाम निशान पर महारावत प्रतापसिंह ने अपना वकील भेज भेजना शाही दरबार में कई बातें निवेदन करवाईं। इस- पर शाहज़ादे मुअज्जम ने सन् जुलूस २५ ता० १७ रमज़ान (हि० स० १०६२ = वि० सं० १७३८ द्वितीय आश्विन वदि ३ = ई० स० १६८१ ता० २० सितम्बर) को निशान भेज लिखा—"तुम्हारा जैसा भरोसा है, उसी प्रकार सेवाओं का वृत्तांत तुम्हारे वकील के द्वारा हमको हमारे मुसाहबों से मालूम हुआ। इसलिए तुम्हारी प्रतिष्ठा-वृद्धि के लिए यह आज्ञापत्र भेजा जाता है। उचित है कि हृदय में विश्वास रख अपने आदमियों को एकत्र कर हमारे उधर आने के समय हाज़िर हो और अच्छी सेवा का सौभाग्य प्राप्त करो। कुछ समय तक हमारी सेवा में रहने के बाद तुम्हारी इच्छा के अनुसार मंसब और जागीर प्रदान की जायगी¹।" इस निशान के ऊपरी भाग में शाहज़ादे ने अपने हाथ से यह भी लिखा कि हमारी आज्ञा के अनुसार उस प्रदेश में हमारे पहुंचने तक जहां तक तुमसे बन सके झगड़े और लड़ाई को मिटाओ, जो तुम्हारे लिए लाभदायक हो। इससे पाया जाता है कि उधर कोई लड़ाई-झगड़े चल रहे हों, जिनको मिटाने के लिए महारावत को शाहज़ादे ने ताकीद की हो; पर यह झगड़े और फ़साद किनके साथ चल रहे थे इसका कुछ पता नहीं चलता। महारावत प्रतापसिंह का इसके पीछे शाही दरबार से कैसा सम्बन्ध रहा और उसके मंसब, जागीर आदि में कितनी वृद्धि हुई, इस विषय का फ़ारसी तवारीख़ों, ख्यातों और तत्समयक पत्रों आदि से कुछ भी हाल ज्ञात नहीं हो सका। संभव तो यही जान पड़ता है कि महारावत विशेषकर मालवे की तरफ़ रहा हो और उस प्रान्त की रक्षा तथा वहां के (१) शाहज़ादे मुअज्जम के फ़ारसी निशान का अनुवाद।

महारावत प्रतापसिंह १८३ पारस्परिक झगड़े मिटाने का भार उसके ऊपर रहा हो, जैसा कि सन् जुलूस ३२ ता० ६ शव्वाल ( हि० १०६६=वि० सं० १७४५ श्रावण सुदि ७ = ई० स० १६८८ ता० २४ जुलाई ) के निम्नलिखित पत्र से, जो उसके नाम शाही दरबार से पहुंचा था, पाया जाता है— “तुम्हारी अर्ज़ी अवलोकन हुई। तुम्हारे लेखानुसार शाही कृपा के साथ मीर जैनुल्याबदीन के नाम आज्ञापत्र जारी किया जाता है । तुमको चाहिये कि जो काम पेश आवे उसमें पूरी सहायता करो और उस सेवा को शाही कृपा का साधन समझो¹ ।” राजधानी देवलिया के चारों ओर पहाड़ियाँ होने से वह स्थान अधिक आबादी बढ़ने के उपयुक्त न था एवं वहां का जलवायु भी आरो- ग्यप्रद न था² । अतएव महारावत प्रतापसिंह ने [हाशिया: ‘महारावत का प्रतापगढ़ का क़स्वा आबाद करना’] वि० सं० १७५५ ( ई० स० १६६६ ) के आस-पास अपने नाम पर समान भूमि पर, जहां पहले डोडे- रिया खेड़ा था, प्रतापगढ़ क़स्बा बसाकर वहां रहना अख्तियार किया³, जो इस समय राज्य की राजधानी है । मेवाड़ के स्वामी महाराणा जयसिंह ने अपने राज्य-काल में देवलिया- राज्य से किसी प्रकार की छेड़-छाड़ न की, जिससे देवलिया-राज्य में [हाशिया: महाराणा अमरसिंह (दूसरा) का महारावत से छेड़-छाड़ करना] सुख-शांति रही और महारावत को अपना देश आबाद करने का अवसर मिला । वि० सं० १७५५ ( ई० स० १६६८ ) में उक्त महाराणा का देहांत ( १ ) मूल फ़ारसी पत्र का अनुवाद । ( २ ) नैणसी का कथन है कि जाजली और जाखम नदियां देवलिया के पहाड़ों से निकलती और देवलिया से पांच कोस ( १० मील ) दूर उदयपुर के मार्ग में पड़ती हैं। उनका जल यहां तक ख़राब है कि पीनेवाला तो रोगग्रस्त होता ही है, परन्तु जो उस नाले के जल में होकर जाता है वह भी कष्ट पाता है ( मुंहणोत नैणसी की ख्यात; भाग १, पृ० ६३ ) । ( ३ ) मेजर के० डी० अर्स्किन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० २२२ ( राज- पूताना गैज़ेटियर; जि० २ ए के अन्तर्गत ) ।

१८४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हो गया और उसका कुंवर अमरसिंह (दूसरा) वहां का महाराणा हुआ । अपनी गद्दीनशीनी के अवसर पर डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के अधीशों के स्वयं टीका लेकर न पहुंचने के कारण अमरसिंह ने अप्रसन्न होकर तीनों जगह सेनाएं भेजने की आज्ञा दी । डूंगरपुर में सेना पहुंचने पर महारावल खुमाणसिंह ने महाराणा की सेना से मुक़ाबला किया और शाही दरबार में महाराणा की शिकायत की। इसी प्रकार बांसवाड़ा के स्वामी अजबसिंह ने भी वहां सेना पहुंचने पर महाराणा की शिकायत की, जिससे महाराणा ने फिर अपनी जंगी कार्रवाई रोक दी । महाराणा की सेना के उस समय प्रतापगढ़ राज्य में जाने पर उसने वहां क्या-क्या बिगाड़ किया और उस सेना का सेनापति कौन था, इसका वृत्तांत कहीं नहीं मिलता, परंतु शाही सेवक केशवदास के हि० स० ११११ (वि० सं० १७५६ = ई० स० १६६६) के महाराणा अमरसिंह के नाम के पत्र से प्रकट है कि महाराणा की सेना ने देवलिया के इलाक़े में भी जाकर नुक़सान किया था, जिसकी शिकायत महारावत प्रतापसिंह की तरफ़ से बादशाह के पास होने पर, उस(केशवदास) ने महाराणा को शुरू गद्दी- नशीनी के समय ऐसी कार्रवाई करने से मना किया था¹ । इसपर महाराणा ने फिर देवलिया के स्वामी से छेड़-छाड़ न की, परंतु महाराणा और महारावत के बीच वैमनस्य बना ही रहा । प्रतापगढ़ राज्य से पिपलोदा ठिकाने (मालवे) की सीमा मिली हुई है। उन्हीं दिनों वहां के डोडिये राजपूतों ने उद्दंडता कर लूट-मार आरंभ महारावत की पिपलोदे पर चढ़ाई की और एक ब्राह्मण को मार डाला एवं उसकी संपत्ति लूट ली। महारावत ने डोडियों को कहलाया कि ब्राह्मण को मारकर तुमने बड़ा भारी पाप किया है, इसलिए भविष्य में ऐसा काम करना छोड़ दो और लूटा हुआ माल लौटा दो। इस बात को डोडियों ने स्वीकार न किया और सामना करने को उद्यत हो गये। इसपर महारावत ने अपने राजपूतों को लेकर (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ७३५-३६ ।

महारावत प्रतापसिंह १८५ पिपलोदे पर चढ़ाई की और वहां के दुर्ग को घेर लिया। डोडियों ने भी वीरतापूर्वक महारावत की सेना का मुक़ाबला किया। अन्त में महारावत के भाई मोहकमसिंह ने क़िले में प्रवेश कर वहां अधिकार कर लिया। फिर डोडियों ने अपने अपराध के लिए क्षमा याचना कर लूट-मार न करने की प्रतिज्ञा की। तब महारावत ने उनको माफ़कर पीछा उनका इलाक़ा उन्हें सौंप दिया¹। बादशाह औरंगज़ेब के समय शाहज़ादे मुअज्ज़म का दूसरा पुत्र अज़ीमुश्शान बंगाल की तरफ़ नियत था। उसने बादशाह की तरफ़ से अपने पास रहनेवाले एक नाज़िर को, जो महारावत का शेरबुलंदखां को अपने यहां आश्रय देना बादशाह का कृपापात्र और ख़बरनवीसी का कार्य करता था, अपने सेवक शेरबुलंदखां-द्वारा मरवा डाला। इसपर बादशाह ने शेरबुलंदखां को बंदी करने का हुक्म भेजा, जिससे अज़ीमुश्शान को बड़ी चिंता हुई। फिर उसने महारावत प्रतापसिंह के नाम पत्र भेजा कि शेरबुलंदखां को वहां आश्रय दिया जावे। अज़ीमुश्शान के इस पत्र के पहुंचने पर महारावत के सरदारों में दो दल हो गये। एक शेरबुलंदखां को आश्रय देने के पक्ष में और दूसरा इसके विपक्ष में था। अंत में महारावत के भाई मोहकमसिंह-द्वारा दृढ़ सम्मति मिलने पर महारावत ने मोहकमसिंह को ही शेरबुलंदखां के स्वागत को भेजकर उसे अपने यहां बुला लिया²। वि० सं० १७६२ (ई० स० १७०६) में बांसवाड़ा के स्वामी महा- रावल अजवसिंह का देहांत हो गया और उसका पुत्र भीमसिंह वहां का बादशाह का महारावत को शाही दरबार में बुलाना स्वामी हुआ, परंतु उन दिनों बादशाह औरंगज़ेब के दक्षिण में होने और फिर उसकी वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०७) में मृत्यु हो जाने तथा शाह- (१) महाराज बहादुरसिंह; रावत प्रतापसिंह ने मोहकमसिंह हरिसिंघोत, देवगढ़ रा धणी री वार्ता; पृ० २६-६६ । (२) वही; पृ० १६-२४ । २४

१८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ज़ादे मुअज्जम (शाह आलम बहादुरशाह) और आज़म के बीच तख़्त के लिए झगड़ा होने आदि कारणों से बांसवाड़ा और देवलिया के स्वामी शाही दरबार में नहीं जा सके थे। बहादुरशाह ने बादशाह बनने पर ई० स० १७०८ के जनवरी (वि० सं० १७६४ माघ) मास में इन दोनों राज्यों के नरेशों को शाही दरबार में लाने के लिए दो शाही सेवकों को भेजा¹। इससे अनुमान होता है कि महारावत शाही दरबार में गया हो, पर इससे आगे का वृत्तांत अप्राप्य है। ऊपर बतलाया गया है कि वि० सं० १७६३ (ई० स० १७०७) में दक्षिण में बादशाह औरंगज़ेब का देहांत हो गया। उस समय उसके दोनों शाह- महाराजा अजीतसिंह और ज़ादे मुअज्जम और आज़म के बीच बादशाह बनने सवाई जयसिंह का देवलिया के लिए वि० सं० १७६४ (ई० स० १७०७) में जजाओ में जाना के मैदान में बड़ा भारी युद्ध हुआ, जिसमें शाहज़ादे मुअज्जम की विजय हुई और आज़म मारा गया। फिर मुअज्जम अपना नाम शाहआलम बहादुरशाह रखकर मुग़ल साम्राज्य का स्वामी हुआ। जजाओ के युद्ध में आंबेर का स्वामी महाराजा सवाई जयसिंह आज़म के पक्ष में और उसका भाई विजयसिंह मुअज्जम के पक्ष में रहकर लड़ा था। इस कारण बहादुरशाह ने बादशाह बनने पर जयसिंह के स्थान में विजयसिंह को आंबेर का स्वामी बनाना चाहा। उन्हीं दिनों जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह ने औरंगज़ेब की मृत्यु से उत्पन्न अव्यवस्था से लाभ उठाकर अपने राज्य से शाही खालसा उठा दिया। इससे बहादुरशाह ने अजीतसिंह को दंड देकर जोधपुर पर पुनः अधिकार करने एवं आंबेर विजयसिंह को दिलाने के लिए अपने शाहज़ादे अज़ीमुश्शान और ख़ानखाना मुनइमखां आदि को ससैन्य रवाना किया और आप भी अजमेर होता हुआ जोधपुर के समीप जा पहुंचा। उस समय अजीतसिंह ने शाही सेना से मुक़ाबला करने में हानि समझ बादशाह के पास उपस्थित होना ही ठीक (१) बहादुरशाह के राज्य समय के अख़बारात-इ-दरवार-इ-मुअल्ला से। ये अख़बारात जयपुर राज्य के संग्रह में सुरक्षित हैं।

[Header] महारावत प्रतापसिंह १८७

समझा। वादशाह ने उसका पहले का अपराध क्षमाकर उसको साढ़े तीन हज़ारी मंसब देकर जागीर में सोजत, सिवाणा और फलोधी के पर- गनों का फ़रमान कर दिया एवं जोधपुर तथा मेड़ता आदि पर शाही- ख़ालसा भेज दिया। वहीं आंबेर से सवाई जयसिंह भी जाकर वादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। वादशाह ने उस (जयसिंह) की सेवा स्वीकार कर उसको अपने सरदारों में शुमार किया और आंबेर पर हुसेनअलीखां को बंदोबस्त के लिए भेज दिया। फिर बहादुरशाह वहां से दोनों राजाओं को साथ लेकर अपनी राजधानी पहुंचा। उन्हीं दिनों बहादुरशाह के पास उसके भाई कामबख़्श के दक्षिण में अपने को वादशाह घोषित कर फ़साद उठाने की ख़बर पहुंची। निदान वह कामबख़्श को सज़ा देने के लिए दक्षिण की ओर रवाना हुआ। उस समय राठोड़ दुर्गादास-सहित महाराजा अजीतसिंह और सवाई जयसिंह अपने-अपने राज्य मिलने की आशा से मंडेश्वर (मंडलेश्वर, नर्मदा के तट पर) तक वादशाह के साथ रहे, परंतु जब देखा कि राज्य मिलने की कोई आशा नहीं है और उनपर वादशाह की तरफ़ से निगरानी की जाती है, तब उसे बिना सूचना दिये ही वे अपने डेरे-डंडे वहीं छोड़कर उदयपुर की ओर चले गये। मार्ग में देवलिया में पहुंचने पर महारावत प्रतापसिंह ने उनका उचित आतिथ्य कर उन्हें उदयपुर को रवाना किया, जहां महाराणा अमरसिंह (दूसरा) ने उन्हें अपने यहां सम्मानपूर्वक रक्खा¹। उदयपुर में उनके पहुंचने की ख़बर पाकर शाहज़ादे मुईज़ुद्दीन जहां- दारशाह ने महाराणा को लिखा कि उन्हें अपने पास नौकर न रक्खे और [हाशिया: किशनगढ़ के राजा राजसिंह का देवलिया जाकर रहना] उन्हें समझा दे कि वे वादशाह के पास अर्जियां भेजें; मैं उनके अपराध क्षमा करा दूंगा और जागीरें दिलवा दूंगा। वहां से महाराणा अमरसिंह की सहा- यता पाकर महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर आदि पर और सवाई जयसिंह ने आंबेर आदि पर अपना अधिकार कर लिया। उन दिनों बादशाह, काम-

[Footnote] (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ७६८-७८। जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० २, पृ० ८३-४।

१८८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास बख़्श को पराजित करने में व्यस्त था, इसलिए उन्होंने यह अवसर उपयुक्त देख शाही इलाक़े में भी उपद्रव करना चाहा। तब रूपनगढ़ (किशनगढ़) का स्वामी राजा राजसिंह (जो बादशाह का आज्ञाकारी सेवक था) उक्त दोनों राजाओं का साथ न देने से अपने इलाक़े की भी बरबादी समझ देवलिया में चला गया और जब तक उनका उपद्रव शांत नहीं हुआ, वह वहां के महारावत का मेहमान रहा। इस बीच उसने उपर्युक्त दोनों राजाओं के उपद्रवों को मिटाने के लिए उनके इलाक़े के फ़रमान उनके नाम हो जाने की बादशाह के पास शाहज़ादे अज़ीमुश्शान-द्वारा अर्जी भेजी, जो स्वीकृत होकर दोनों राजाओं के नाम के शाही फ़रमान उसके पास बादशाह की ओर से पहुंच गये। उनको लेकर वह देवलिया से विदा हुआ और उसने उक्त दोनों राजाओं को शाही फ़रमान देकर बढ़ता हुआ उपद्रव रोक दिया¹। लगभग ३५ वर्ष राज्य करने के पश्चात् अनुमान ७५ वर्ष की आयु में महारावत प्रतापसिंह का देहांत हुआ। एक जगह उसके देहांत का समय महारावत का परलोकवास वि० सं० १७६४ पौष वदि ३ (ई० स० १७०७ ता० ३० नवंबर) दिया है², जो ठीक नहीं है, क्योंकि "जोधपुर राज्य की ख्यात" एवं "वीरविनोद" के अनुसार, जैसा कि ऊपर बतलाया गया है, वि० सं० १७६५ के ज्येष्ठ मास (ई० स० १७०८ मई) के प्रारंभ में महाराजा अजीतसिंह तथा महाराजा सवाई जयसिंह के देवलिया में जाने पर महारावत प्रतापसिंह का उनका आतिथ्य करना स्पष्ट है³। ऐसी अवस्था में वि० सं० १७६४ (ई० स० १७०८) में उसका परलोकवास होना माना नहीं जा सकता। संभव है कि महारावत प्रतापसिंह का देहांत वि० सं० १७६५ के ज्येष्ठ (ई० स० १७०८ मई) मास के पीछे किसी समय हुआ हो और ख्यात-लेखकों ने वि० सं० १७६५ (१) जोधपुर राज्य की ख्यात; द्वितीय भाग, पृ० ६०। "वीरविनोद" से पाया जाता है कि महाराणा अमरसिंह (दूसरा) ने भी इस सम्बन्ध में यथेष्ट प्रयत्न किया था (द्वि० भा०, पृ० ७७३-८)। (२) पंडित जगन्नाथ शास्त्री; काव्यकुसुम (प्रस्तावना); पृ० २२। (३) देखो ऊपर पृ० १८७, टिप्पण १।