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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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१७२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास और उसकी बाण-विद्या की प्रशंसा की है, अतएव इस काव्य की रचना के समय प्रतापसिंह के १०-१२ वर्ष का होने का अनुमान होता है । राजकुमार प्रतापसिंह के वि० सं० १७१६ ( ई० स० १६६२) में शाही दरबार में जाने के संबंध के एक पत्र का ऊपर उल्लेख किया गया है । उस समय उसकी आयु कम से कम २० वर्ष होनी चाहिये, इस अनुमान से 'हरिभूषण महाकाव्य' का रचना-काल वि० सं० १७१०-१७१२ ( ई० स० १६५३-१६५५ ) के बीच हो सकता है¹ । हरिविजय नाटक- यह नाटक पंडित जयदेव ने महारावत हरिसिंह के नाम पर देवलिया में रचा था और महारावत के सभासदों के अवलोकनार्थ वहां इसका अभिनय भी हुआ था। इसमें कृष्ण-द्वारा रुक्मिणीहरण का प्रसङ्ग है। इसका रचना-काल शक संवत् १५७६ (वि० सं० १७१४ = ई० स० १६५७) का कार्तिक मास दिया है²। जयदेव तरवाड़ी-मेवाड़ा ब्राह्मण था और मेहता उसकी उपाधि थी । उक्त महारावत ने उसको अपनी रचना में 'भूसुरसखा' शब्द से संबोधन किया है । उसका उल्लेख पाटरया गांव के महारावत ( १ ) उद्यन्निर्मलमेदपाटविलसद्धंशैकचूडामणि श्रीमन्माधवभट्टसूरितनयो दिक्कक्रविख्यातधीः । गङ्गाराममहाकविर्व्यवरचयत् काव्यं सुधासोदरं तस्मिञ्छ्रीहरिभूषणे सुचरिते सर्गोह्यगादष्टमः ॥ ४३ ॥ सर्ग आठवां । ( २ ) कविवरजयदेवदिव्यगुम्फे नृपहरिसिंहसमाजदर्शनीये । इति हरिविजयेऽस्तुसप्तमाङ्कोवितमहो हरिविश्वनाथतुष्टयै ॥ संसाराभयलिप्सुना गुणगृहं श्रीमन्महानाटकं विद्वच्छ्रीजयदेवकेन नगरे श्रीदेवदुर्गे कृतम् । शाके नंदहयेषुचंद्रक्रमिते (१५७६) पक्षे सिते कार्तिके संपूर्णा खलु रूपकं हरिगुणं भूयाद्धरीप्रीतये !