भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 220

महारावत हरिसिंह १७३ प्रतापसिंह के समय के वि० सं० १७३३ (ई० स० १६७७) के संस्कृत दानपत्र में भी है। वह संस्कृत का अच्छा विद्वान् था। 'हरिविजय नाटक' में उसने प्रसिद्ध बापारावल (कालभोज) और उसके पुत्र खुम्माण का उल्लेख करते हुए महाराणा मोकल के पुत्र क्षेमकर्ण से लगाकर सूरजमल, बाघसिंह, रामसिंह, विक्रमसिंह, तेजसिंह, सिंहा, जसवंतसिंह, हरिसिंह, तथा उसके कुंवर प्रतापसिंह का संक्षेप से उल्लेख किया है । इससे पाया जाता है कि उसको इतिहास का भी ज्ञान था । : विष्णु सहस्रनाम की टीका-महाभारत के भीष्मपर्व में भगवान् विष्णु के सहस्र नामों का वर्णन है, जिनका प्रत्येक व्यक्ति बड़ी श्रद्धा से पाठ करता है । इसकी टीका उपर्युक्त कवि जयदेव ने वि० सं० १७२४ आश्विन कृष्ण ६ (ई० स० १६६७ ता० २६ अगस्त) को की थी'। ( १ ) गुणगृहं जयदेवमहीसुरः स कृतवान् मननव्यपदेशतः । हरिमहीपतितुष्टिकरामिमां सुविवृतिं हरिनामहस्रगाम् ॥ आसीत्सिंहनृपो नृपालविलसद्भालावलीभूषण- स्तज्जः श्रीयशवन्त रावत इति ख्यातः प्रभुर्भूभुजाम् ॥ तज्जः श्रीहरिसिंहरावत इति प्राप्तः प्रथां भूतले तेनेयं विवृतिः कृता द्विजवचः प्रत्यारवाडम्बरैः ॥ वेदद्वयद्रिकुहायने(१७२४)ऽश्वयुजि मासंगे तिथौ कृष्णागे पूर्णेयं विवृतिर्हरेर्गुणलसन्नाम्नां जगद्धानिधेः । यस्यान्तःसरसीरुहे विलसति प्रोद्बोधहंसोऽनिशं चन्द्रार्कानलदीप्तरश्मिविततिप्रध्वस्तभावान्धकृत् ॥ इति श्रीमद्गौतमेश्वरपालितललितदुर्गमदुर्गविभूषणश्रीदेवगढेश्वर- महाराजाधिराजरावतश्रीहरिसिंहदेवकारिता श्रीजगदीश्वरसहस्रनामसुविवृतिः संपूर्णा ।