राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
DevanagariHindipublished534 पृष्ठ
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महारावत हरिसिंहः १७५
हरिंपिंगल—यह ग्रंथ काव्यरचना के लक्षणों पर कवि जोग ने वि० सं० १७२० (चैत्रादि १७२१) ज्येष्ठ सुदि ५ (ई० स० १६६४ ता० १६ मई) गुरुवार को बनाया था। कवि जोग का इस ग्रंथ में परिचय नहीं है; परंतु रचना से वह भाषा साहित्य का प्रौढ़ विद्वान् ज्ञात होता है। उसने भाषा साहित्य के प्रायः अनेक ग्रंथों का मज्जन कर उक्त ग्रंथ की रचना की थी। महारावत हरिसिंह विद्वान् और गुणग्राहक नरेश था। प्रतापगढ़ के नरेशों में सर्वप्रथम उसने ही शाही दरबार से अपना संबंध बढ़ाकर महारावत का व्यक्तित्व मेवाड़ राज्य के अधिकार में गये हुए अपने राज्य को मुक्त किया। वह बादशाह शाहजहां और उसके शाहज़ादों का पूर्ण विश्वासपात्र था। नीतिकुशल होने के कारण उसने शाहज़ादों के किसी युद्ध में भाग न लिया। वह ईश्वरभक्त, मेधावी और योग्य शासक था। अपने राज्य को संपन्न करने के लिए उसने अन्य राज्यों से व्यापारियों को बुलाकर अपने यहां बसाया, जिससे देश की आर्थिक स्थिति सुधरी। वह दानशील और उदार राजा था। गोवर्द्धननाथ के मंदिर की प्रतिष्ठा के अवसर पर उसने अपनी माता से स्वर्ण की तुला करवाई थी। उसका आस-पास के अन्य राजाओं से मित्रता का व्यवहार था। अपनी रचना में उसने 'सांधिविग्रहिक' उपाधि से अपने को अलंकृत किया है, जिससे पाया जाता है कि उसको ऐसी कोई उपाधि प्राप्त हुई हो। वह विद्वानों का सम्मान कर उनको अपने यहां रखता था, जिससे उसके समय
(१) जे जे कवियण जिंहमें तिण तिण करे प्रणाम । जोगे पिंगल बांधिओ दे हरिपिंगल नाम ॥ पुष गुर पंचम जेठ सुद अमरत योग विचार । सतरहशे विशे समत हरिपिंगल विशतार ॥ रावत हरे रचाविओ हरिपिंगल सानन्द । छन्द जवाहर पाराविण चुण चुण ल्यो कवि-अंद ॥