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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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१६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उपर्युक्त कार्यों को देखते हुए अनुमान होता है कि देवलिया राज्य उस समय महारावत के समय के समृद्धिपूर्ण था। उसके समय के वि० सं० १६६६ से ताम्रपत्र और शिलालेख १७०५ (ई० स० १६४२-१६४८) तक के पांच लेखों की छापें तथा प्रतिलिपियां हमारे पास आई हैं, जिनका सारांश नीचे लिखे अनुसार है - (१) वि० सं० १६६६ पौष सुदि ११ (ई० स० १६४२ ता० २१ दिसंबर) का मचलाना गांव का दानपत्र, जिसमें उपर्युक्त गांव महंत हंसपुरी गोसाईं को पुण्य करने का उल्लेख है। (२) वि० सं० १७०१ चैत्र सुदि ५ (ई० स० १६४४ ता० ३ मार्च) का ठीकरा गांव का दानपत्र, जिसमें आगरे में रहते समय उपर्युक्त गांव दुबे जगन्नाथ और इंद्र को देने का उल्लेख है¹। (३) वि० सं० १७०५ वैशाख सुदि १५ (ई० स० १६४८ ता० २७ अप्रेल) गुरुवार की देवलिया के गोवर्द्धननाथ के मंदिर की प्रशस्ति, जिसका उल्लेख ऊपर हो चुका है²। (४) वि० सं० १७०७ (?) वैशाख सुदि १५ (ई० स० १६५० ता० ५ मई)³ का भट्ट विश्वनाथ के नाम का कीटखेड़ी गांव का दानपत्र, जिसमें राजमाता चौहान के बनवाये हुए गोवर्द्धननाथ के मंदिर की प्रतिष्ठा पर उपर्युक्त गांव दान देने का उल्लेख है। यह ताम्रपत्र शाह वर्षा⁴ के कहने से लिखा गया था (१) देखो, ऊपर पृ० १४६ टिप्पण १। (२) मूल प्रशस्ति के लिए देखो ऊपर पृ० १६७ टिप्पण १। (३) इस ताम्रपत्र में गुरुवार दिया है, पर वि० सं० १७०७ वैशाख सुदि १५ को गुरुवार नहीं आता । वि० सं० १७०५ वैशाख सुदि १२ (ई० स० १६४८ ता० २७ अप्रेल) को गुरुवार था और घटनाक्रम पर विचार करने से भी यही ठीक जान पड़ता है । संभव है ताम्रपत्र की नक़ल करने में १७०५ के स्थान में १७०७ हो गया हो । (४) शाह वर्षा हूंबड़ जाति का वैश्य था और जैनों की दिगंबर शाखा का अनुयायी था। 'हरिभूषण महाकाव्य' में कवि गंगाराम ने उसकी अच्छी प्रशंसा की है।