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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत हरिसिंह १६७ नहीं है ! महारावत हरिसिंह ने देवलिया में महल और उसकी माता चंपाकुंवरी ने देवलिया में गोवर्द्धननाथ का मन्दिर, बावड़ी और वाटिका महारावत के बनवाये हुए बनवाई थी। उपर्युक्त मंदिर की वि० सं० १७०५ महल और उसके समय के वैशाख सुदि १५ (ई० स० १६४८ ता० २७ अप्रेल) लोकोपयोगी कार्य गुरुवार को प्रतिष्ठा होकर वहां प्रशस्ति लगवाई गई, जिससे पाया जाता है कि उस अवसर पर राजमाता ने स्वर्ण का तुलादान किया एवं एक गांव, एक हज़ार गायें, दस महादान और एक सहस्र ब्राह्मण दम्पतियों को वस्त्रदान दिया और एक लाख व्यक्तियों को भोजन करवाया था¹ । महारावत ने लगभग ४५ वर्ष तक राज्य किया। उसके समय के (१) संमत १७०५ वर्षे शाके १५७० प्रवर्तमाने उत्तरायणगते श्रीसूर्ये वैशाखमासे शुक्लपक्षे पूर्णमास्यां तिथौ गुरुवासरे मालवखण्डे- श्वरमहाराजाधिराजरावतश्रीहरिसिंहजीविजयराज्ये देवदुर्गराजधान्यां रावत- श्रीजसवन्तजीभार्या चहुआण चांपाजी देवल बावड़ी वांग करी ने प्रतिष्ठा कीधी । तत्समये दान दीधा तुलादान गाम एक । गौ सहस्र । दश महादान । लक्ष भोजन.........ब्राह्मण सहस्र एक दम्पति वस्त्र दीधा... । आरामवापीत्रिदशप्रतिष्ठाम् हेम्नां तुलां षोडशदानयुक्ताम् । हरिर्नृपः सर्वमिदं जनन्या सहस्रगौदानमकारयच्च ॥ २ ॥ श्रीचित्रकूटेश्वरराणखेमासुतोऽभवद्रावतसूर्य्यमल्लः । तस्याष्टमः श्रीहरिसिंहदेवो राजेश्वरो राजति देवदुर्गे ॥ ३ ॥ मूल प्रशस्ति की प्रतिलिपि से ।