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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२१८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास गोपालसिंह वि० सं० १७७८ ( ई० स० १७२१ ) में अपने ज्येष्ठ भ्राता उम्मेदसिंह का परलोकवास होने पर महारावत गोपालसिंह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी राज्य-प्राप्ति हुआ और उसी वर्ष उसने उदयपुर जाकर¹ वहां के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) से मुलाक़ात कर अपनी गद्दीनशीनी की रसम को सुदृढ़ कर लिया, क्योंकि कुछ कारणों से उसको झगड़ा होने की आशंका थी। है कि उम्मेदसिंह का पुत्र सालिमसिंह बाल्यावस्था के कारण राज्याधिकार से वंचित रहा और उसका चाचा गोपालसिंह ( उम्मेदसिंह का भाई ) कुछ सरदारों को मिलाकर राज्य का स्वामी बन बैठा। मुंशी देवीप्रसाद-द्वारा संगृहीत जोधपुर के राजाओं, रानियों, कुंवरों, कुंवरियों आदि की नामावली की पुस्तक से पाया जाता है कि वि० सं० १७८१ आषाढ सुदि ६ ( ई० स० १७२४ ता० १६ जून ) को देवलिया की एक राजकुमारी से जोधपुर में ही महाराजा अजीतसिंह का विवाह हुआ था एवं इसके कुछ ( चार ) दिन बाद ही उक्त महाराजा अपने पुत्र बखतसिंह के हाथ से मारा गया। अनुमान होता है कि वह उम्मेद- सिंह की ही कोई पुत्री हो, जिसका नाम बड़वे की ख्यात में अमृतकुंवरी दिया है। ( १ ) श्रीममहाराजाधिराज महारावतजी श्रीगोपालसींघजी वचनातु गुसाई श्रीगंगागिरजी जोग्य यत् मोजे गाम १ सेखड़ी गांव भूमिहरा तथा टकरावद तीरेरी गाम नाथूखेड़ी पहेली रावत श्रीप्रथीसिंघजी संवत् १७७३ रा जेठ सुदि १५ रे दिन चढावी जींरे बदले रावत श्रीगोपालसिंघजी उदेपुर पधारया मेठे ज़दी गाम सेखड़ी कथकावल रहित लागत विलगट रहित उदक आघाट करे दीधी। मारा वंश रो कोई चोलण करसी नहीं। स्वदत्तं परदत्तं वा ये हरन्ति वसुंधरा षष्टि वर्ष सहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः । दुए शाह चंद्रभाणजी प्रेरक ठाकर फतेसिंघजी, लिखावत राव रिणछोड़दासजी मामा रामचंद्रजी उदेपुर मांहे हुकम थी लिखायो। संवत् १७७८ सावण सुदि १३ बुधे मूल ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से ।