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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत गोपालसिंह २२१

केवल नाममात्र का शासक रह गया और पेशवा का प्रताप इतना बढ़ा कि दिल्ली के मुग़ल बादशाह भी उसको हर प्रकार से प्रसन्न रखने की चेष्टा करते थे। पेशवा के सेनापति मल्हारराव होल्कर¹, राणोजी सिंधिया² और पर शिवाजी का अधिकार रहा, परंतु वह सतारा के राजा को ही अपना मालिक मानता रहा। (१) होल्कर राज-वंश के लिए इतिहासकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं। इस वंश में मल्हारराव होल्कर अठारहवीं शताब्दि में एक प्रसिद्ध व्यक्ति हुआ। मल्हारराव होल्कर का जन्म वि० सं० १७५० (ई० स० १६६३) के लगभग हुआ। उसका बाल्यकाल बड़ी विपत्ति में गुज़रा। उसका पिता उसको छोटी अवस्था में छोड़कर मर गया था, इसलिए उसका पालन-पोषण उसके मामा नारायणराव के यहां हुआ, जिसको उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) की तरफ़ से बूढ़ा की जागीर मिली थी। फिर वह अपने मामा के पास २५ सवारों की टोली का अफ़सर बना और बढ़ते-बढ़ते पेशवा के मुख्य सेनापतियों में हो गया। उसने केवल दक्षिण भारत के युद्धों में ही नहीं बल्कि उत्तर भारत की अनेक लड़ाइयों में समय-समय पर बड़ी वीरता दिखलाई थी। मालवा में पेशवा का अधिकार होने पर उसको वहां एक बड़ी आय की जागीर मिली। अनन्तर उसने अपने वंशजों के लिए इंदौर राज्य की स्थापना की। वि० सं० १८२३ (ई० स० १७६६) में उसका देहांत हुआ। होल गांव में रहने से यह राजवंश होल्कर कहलाता है। (२) सिंधिया वंश के राजा नागवंशी क्षत्रिय हैं। महाराष्ट्र में सिंदे गांव में निवास होने से वे सिंदे (सिंधिया) कहलाने लगे। इस वंश की एक कन्या का विवाह प्रसिद्ध राजा शिवाजी के पौत्र राजा शाहू से हुआ था। मध्यभारत में ग्वालियर का विशाल राज्य सिंधिया के अधिकार में है, जिसका संस्थापक राणोजी सिंधिया था। प्रारंभ में वह पेशवा के छोटे नौकरों में था, परंतु धीरे-धीरे उच्च पद पर पहुंचा और पेशवा के प्रधान सेनापतियों में हो गया। उसने मालवा में मरहटा राज्य स्थापित करने में पूर्ण वीरता दिखलाई थी। वह पेशवा की तरफ़ से संपूर्ण अधिकारों के साथ दिल्ली के बादशाह के पास भेजा गया था, जहां उसने पेशवा और मुग़ल साम्राज्य के साथ होनेवाले संधिपत्र पर पेशवा के प्रतिनिधि की हैसियत से हस्ताक्षर किये थे। वि० सं० १८०२ श्रावण सुदि २ (ई० स० १७४५ ता० १६ जुलाई) को शुजालपुर में राणोजी की मृत्यु हुई। फिर उसका पुत्र जयआपा अपने पिता की संपत्ति का अधि- कारी हुआ, जिसको जोधपुर के महाराजा विजयसिंह ने वि० सं० १८१२ (ई० स० १७५५) में छल से मरवाया।