भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 275

२२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास आनंदराव¹ पंवार युद्ध-निपुण थे, जिन्होंने थोड़े समय में ही भारत में मरहटों का आतंक जमा दिया। शाही सेना के साथ दक्षिण में निरन्तर पच्चीस वर्ष तक युद्ध में संलग्न रहने के कारण मरहटों की आर्थिक स्थिति संतोषप्रद नहीं रही थी एवं वे ऋणग्रस्त भी थे, इसलिए प्रारंभ में उन्होंने उत्तर भारत के आक्रमणों में धन बटोरने की ही नीति रखी और फिर उन्होंने मालवे में चढ़कर वहां पर अधिकार किया, जैसा आगे बतलाया जायगा। मुग़ल साम्राज्य की निर्बलता के समय राजपूताना के राजाओं की भी अपने-अपने राज्य बढ़ाने की लालसा जाग उठी। उनमें उदयपुर, जयपुर और जोधपुर के नरेशों के नाम उल्लेखनीय हैं, [आंवेर और जोधपुर] पर उदयपुर के महाराणा तो स्वयं शाही दरबार में [के राजाओं की शक्ति बढ़ना] कभी न गये, जिससे मुग़ल साम्राज्य की राजनीति में उनका कुछ हाथ न रहा। आंवेर (जयपुर) के महाराजा सवाई जयसिंह तथा जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह का वि० सं० १७६५ (ई० स० १७०८) के पीछे मुग़ल साम्राज्य के उलट-फेर में बड़ा हाथ रहा, जिससे उनकी शक्ति बढ़ गई। उस समय के मुग़लों के इतिहास में आंवेर और जोधपुर के नरेशों का महत्वपूर्ण स्थान है। बादशाह की तरफ़ से मरहटों के आक्रमणों को रोकने के लिए जयसिंह को मालवे² (१) धार के परमार राजा मालवे के प्रसिद्ध परमारों के वंशधर हैं। महाराष्ट्र में उनका निवास होने से वे मरहटा कहलाये। इस राज्य का संस्थापक उदाजी पंवार हुआ, जो सतारा के राजा शाहू का बड़ा विश्वासपात्र सेवक था। पेशवा बाजीराव के उन्नतिकाल में उसका उक्त पेशवा से मतभेद रहता था, इसलिए मरहटा-राज्य के विस्तार में पूर्ण रूप से भाग लेने पर भी उसको कोई बड़ी जागीर नहीं मिली और अपनी जागीर से भी उसे संबंध त्यागना पड़ा। फिर पेशवा ने वि० सं० १७८६ (ई० स० १७३२) के लगभग उसका सब अधिकार उसके छोटे भाई आनंदराव को दिया, जो अपने भाई के समान वीर था। वि० सं० १८०६ (ई० स० १७४६) में उसकी मृत्यु होना पाया जाता है। (२) सवाई जयसिंह की मालवे की प्रथम सूबेदारी लगभग पांच वर्ष तक

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ) · पृष्ठ 275, कुल 534 में से · BharatKosha