राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत गोपालसिंह २२३ और अजीतसिंह को गुजरात¹ का भार सौंपा गया । अजीतसिंह तथा बादशाहों के बीच मन-मुटाव बना ही रहता था । अंत में वह इसी कारण से अपने छोटे कुंवर वख्तसिंह-द्वारा वि० सं० १७८१ (ई० स० १७२४) में मारा गया² । फिर उसका ज्येष्ठ कुंवर अभयसिंह जोधपुर राज्य का स्वामी हुआ, जो साम्राज्य-भक्त बना रहा। मुहम्मदशाह के समय वह गुजरात का सूबेदार भी बनाया गया³, परंतु अपने कर्मचारियों की लूट-खसोट के कारण वहां सुव्यवस्था स्थापित न कर सका । फिर भी गुजरात की तरफ़ से मरहटों को उसने आगे नहीं बढ़ने दिया । वि० सं० १७६५ (.ई० स० १७०८) में उदयपुर, जयपुर और जोधपुर के नरेशों ने एकता के सूत्र में बंधे रहने के लिए संधि भी की⁴; किन्तु जयसिंह की राजनैतिक ई० स० १७१३ फ़रवरी से ई० स० १७१७ नवंबर (वि० सं० १७६६-१७७४) तक रही थी (डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा इन् ट्रान्ज़िशन; पृ० ६६-१०१) । (१) गुजरात की सूबेदारी महाराजा अजीतसिंह को वि० सं० १७७१ (ई० स० १७१५) में मिली थी, और वह लगभग दो वर्ष अर्थात् वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) तक वहां का सूबेदार रहा था (बंबई गैज़ेटियर; भा० १, खं० १, पृ० २६६) । (२) टॉड; राजस्थान, जि० २, पृ० ८४६-६७, १०२८-२६ । जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० २, पृ० ११५ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ८४२ । (३) महाराजा अभयसिंह वि० सं० १७८७ (ई० स० १७३०) में गुजरात का सूबेदार हुआ और वि० सं० १७६४ (ई० स० १७३७) तक वह सूबा उसके नाम पर रहा । वि० सं० १७६० (ई० स० १७३३) के पीछे उक्त महाराजा गुजरात में नहीं गया और उसके कर्मचारी भंडारी रत्नसी आदि ही वहां का प्रबन्ध करते रहे (वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ८४४-७) । (४) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास, जि० २, पृ० ६०४-५ । इस सन्धि का आशय मुख्यतः उदयपुर की राजकुमारी का महत्व प्रमाणित करना था । मुग़ल बाद- शाहों के साथ कुछ राजपूताने के राज्यों ने वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर लिया था, जिस- पर महाराणा प्रतापसिंह ने जयपुर आदि राज्यों से विवाह-सम्बन्ध बन्द कर दिया । उसको पुनः जारी करने के लिए यह इक़रारनामा जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह से लिखवाया गया था । वस्तुतः इस संधिपत्र से कोई राजनैतिक महत्व सिद्ध नहीं हुआ और उदयपुर तथा जयपुर राज्य को इस इक़रार के कारण जयसिंह की मृत्यु के बाद