राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास चालों से वह कागज़ का रही टुकड़ा ही रही। स्वार्थपरता और पारस्परिक वैमनस्य से जयपुर और जोधपुर के नरेश शीघ्र ही उपर्युक्त संधि से पराङ्- मुख हो गये एवं एक दूसरे का विनाश चाहने लगे। उदयपुर का महाराणा उनके पारस्परिक वैमनस्य को मिटाने का प्रयत्न करता था, पर वह बढ़ता ही गया। इससे कहा जा सकता है कि राजपूताना के राज्यों में उस समय कोई राजा नेतृत्व के योग्य नहीं था। इसका परिणाम यह हुआ कि आपसी द्वेष से राजपूताना के राज्यों की दशा हीन हो गई। इस अशांतिमय वातावरण में छोटे-छोटे राज्यों का अस्तित्व लुप्त होने की पूरी संभावना थी। अस्तु, संगठन-शक्ति की भावना छोटे-छोटे महारावत को धरियावद राज्यों में भी जागृत होकर वे बड़े राज्यों का सहारा का परगना मिलना ढूंढने लगे। उदयपुर राज्य, प्रतापगढ़ राज्य के समीप होने एवं वहां के राजाओं के एक ही वंश के होने के कारण उनमें कभी मेल और कभी-कभी वैमनस्य भी हो जाता था; किंतु आपत्तिकाल के समय देवलिया राज्य, उदयपुर राज्य को सहायता देकर अपने कर्त्तव्य का पालन करता था। इसके एवज़ में वहां के रावत को धरियावद की जागीर मिली थी, जो महारावत हरिसिंह के समय जाती रही। ऊपर बतलाया जा चुका है कि महारावत पृथ्वीसिंह ने उदयपुर राज्य से पुनः अपना राजनैतिक संबंध जोड़ा था और धरियावद का परगना पीछा मिलने की बात स्थिर हो गई थी, परंतु उक्त महारावत और उसके कुंवर का देहांत हो जाने एवं वहां उसके दो उत्तराधिकारियों के थोड़े समय तक ही राज्य करने से धरियावद का परगना नहीं मिल सका था। महारावत गोपालसिंह ने राज्यासन पर बैठते ही पुनः धरियावद का परगना प्राप्त करने के लिए प्रयत्न आरंभ किया और अपने कुंवर सालिमसिंह को उदयपुर भेजा¹। इसी प्रकार उसने पेशवा बाजीराव का अभ्युदय देख उससे दुःखदायी परिणाम भोगना पड़ा, जिसका हम उदयपुर राज्य के इतिहास में विस्तृत रूप से उल्लेख कर चुके हैं। (१) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में उपर्युक्त धरियावद का परगना