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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 534 में से

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महारावत गोपालसिंह २२५ भी मित्रता कर ली', क्योंकि देवलिया राज्य मालवे से मिला हुआ होने से उसको मरहटों से भी अच्छा सम्बन्ध रखने की आवश्यकता थी। वि० सं० १७८७ (ई० स० १७३०) में डूंगरपुर के महारावल रामसिंह का देहांत होने पर उसका कुंवर शिवसिंह वहां की गद्दी पर बैठा। उस समय उदयपुर राज्य की सेना ने डूंगरपुर पहुंच वहां घेरा डाल दिया और चार लाख रुपयों आदि का रुक्का लिखवाकर वहां से लौटी²। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि महाराणा की सेना के डूंगरपुर को घेर लेने पर महारावत गोपालसिंह ने महाराणा की सेना के आदमियों से बात-चीत कर वहां का घेरा उठवाया³। इस कथन का समर्थन उदयपुर और डूंगरपुर राज्य की ख्यातों से नहीं होता, परन्तु यह संभव है कि महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) और उक्त महारावत का अच्छा संबंध होने से उसने डूंगरपुर के स्वामी शिवसिंह तथा महा- राणा के बीच संधि करवाकर वहां का घेरा उठवा दिया हो। महाराणा अरिसिंह (वि० सं० १८१७ से १८२६ = ई० स० १७६१ से १७७३) के राज्य- काल में महारावत सालिमसिंह को मेवाड़ के गृह-युद्ध के समय की गई सेवा के उपलक्ष्य में मिलने का उल्लेख है, परंतु यह बात ठीक नहीं है; क्योंकि वहां महारावत पृथ्वीसिंह को मिली हुई 'रावत-राव' की उपाधि प्रयोग में लाने की महाराणा अरिसिंह की सनद् तो दी गई, किंतु धरियावद परगने की कोई सनद नहीं दी और न धरियावद परगना मिलने का संवत् और मास दिया है। यदि वस्तुतः धरियावद का परगना सालिमसिंह को मिला होता तो उसकी सनद् अवश्य उद्धृत की जाती एवं वर्ष तथा मास भी दिया जाता। हमारा अनुमान है कि मेवाड़ में महाराणा अरिसिंह के समय होनेवाले गृह- युद्ध के कई वर्ष पूर्व धरियावद का परगना महारावत गोपालसिंह को मिल चुका था, जिसके कारण ही गोपालसिंह ने उदयपुर में विशेष रूप से आना-जाना जारी किया। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६५ । (२) वही; द्वितीय भाग, पृ० १०११ । (३) वही; द्वितीय भाग, पृ० १०६३ । २६