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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास मालवे में होनेवाले मरहटों के आक्रमणों को शाही सेना ने रोकने का यथासाध्य प्रयत्न किया और आंबेर का स्वामी सवाई जयसिंह भी मालवे के लिए मरहटों की इस कार्य के लिए नियत किया गया, परंतु इसमें लड़ाइयां सफलता नहीं हुई और मरहटों की शक्ति बढ़ती गई। इस असफलता का मुख्य कारण शाही अफ़- सरों का पारस्परिक मनोमालिन्य, ईर्ष्या और स्वार्थ-परायणता ही थी। उस समय स्वामी-सेवक के भाव नष्ट होने लगे थे और शाही अफ़सरों में से अधिकांश विद्रोही होकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की चेष्टा में थे। ऐसी स्थिति में असफलता होना स्वाभाविक था। मालवे की भांति उन दिनों मरहटों के गुजरात में भी आक्रमण होने लगे, जिससे स्थायी शांति का होना कठिन हो गया। प्रतापगढ़ राज्य मालवा के अंतर्गत था और उसके चारों तरफ़ संघर्ष मच रहा था, तथापि वह महारावत गोपालसिंह के कुशल- शासन से अक्षुण्ण रहा। इतिहास के प्रसङ्ग को मिलाने के लिए संक्षेप में हम यहां मालवे में बादशाह मुहम्मदशाह के समय जो उलट-फेर हुए, उनका वर्णन करते हैं- फ़र्रुख़सियर की मृत्यु के पीछे सैयदों ने निज़ामुल्मुल्क को वि० सं० १७७५ फाल्गुन सुदि १२ (ई० स० १७१६ ता० २० फ़रवरी) को मालवे का सूबेदार बनाया। ई० स० १७२२ ता० ३० अगस्त (वि० सं० १७७६ भाद्रपद वदि ३०) तक वह वहां का सूबेदार रहा। फिर बादशाह मुहम्मद- शाह के समय सैयदों का दमन होने के पीछे निज़ामुल्मुल्क तो वज़ीर बनाया गया और राजा गिरधर बहादुर मालवे का सूबेदार नियत हुआ, परंतु वह पूरा एक वर्ष भी वहां न रहने पाया था कि बादशाह ने निज़ामुल्मुल्क पर ही मालवे का भार डाल दिया। निज़ामुल्मुल्क की शक्ति उस समय बहुत बढ़ गई थी, जिसको बादशाह ने भयावह जान पुनः राजा गिरधर बहादुर की वि० सं० १७८२ प्रथम आषाढ सुदि ३ (ई० स० १७२५ ता० २ जून) को मालवे के सूबे पर नियुक्ति की। राजा गिरधर बहादुर इलाहाबाद के सूबेदार छबीलेराम नागर (ब्राह्मण) का भतीजा था