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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत गोपालसिंह २२७

और साम्राज्य-भक्त था । उसने मालवा में मरहटों का प्रभाव न बढ़ने देने के लिए स्तुत्य प्रयत्न किया और अंत में वह आमझरा में मरहटों से युद्ध करता हुआ ई० स० १७२८ ता० २६ नवंबर ( वि० सं० १७८५ मार्गशीर्ष शुदि ६) को मारा गया । उसके बाद उसका पुत्र भवानीराम मालवे का सूबेदार बनाया गया । उसने भी मरहटों को मालवा में न बढ़ने देने का उद्योग किया, किन्तु आवश्यक सहायता न मिलने से वह असफल रहा । मालवा ही नहीं अपितु गुजरात में भी मरहटों के आक्रमण होते देख वादशाह मुहम्मदशाह को बड़ी चिंता हुई । वि० सं० १७८६ ( ई० स० १७२६ ) में उसने सवाई जयसिंह को दूसरी बार मालवे का सूवेदार बनाया और सैन्य-संगठन के लिए तेरह लाख रुपयें भी दिये, परन्तु वह अपनी मेल-मिलाप की नीति से कुछ दे-दिलाकर मरहटों का वहां से कब्ज़ा उठाना चाहता था । उस समय मालवा में मरहटे मुकासा नामक कर उगाह्ते थे, इसलिए वहां से उनका यह अधिकार उठाने एवं उनके आक्रमणों को रोकने के लिए जब वह (जयसिंह) मालवे की तरफ़ आगे बढ़ा तो उसके साथ वहां के प्रायः सब राजा उपस्थित हो गये¹। फिर वह उज्जैन से मांडू की तरफ़ बढ़ा और ई० स० १७३० के जनवरी ( वि० सं० १७८६ माघ ) मास में उसने वह क़िला मरहटों से खाली करवा लिया² । महाराजा जयसिंह का विचार मरहटों से मालवा खाली करवाकर उसे अपने राज्य में मिलाने का था। इस बात को ताड़कर राजपूताना के नरेश । उस- से शंकित रहते थे, क्योंकि उन्हीं दिनों उसने बूंदी से राव बुधसिंह को हटाकर दलेलसिंह को वहां का स्वामी बना दिया था³ और रामपूरे का परगना भी चंद्रावतों ( सीसोदियों की एक शाखा ) से ज़ब्त करवाकर

( १ ) डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० १७८। मालवा में युगान्तर; पृ० २०० । सूर्यमल; वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३१३७-३८ । ( २ ) सूर्यमल; वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३१३८ । डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा में युगान्तर; पृ० २०१ । मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० १७८ । ( ३ ) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३१३२-३६ ।