भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 281

महाराणा संग्रामसिंह से अपने छोटे कुंवर माधवसिंह को दिलवा दिया था १। ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६७४-५ । मालवा में रामपुरा चंद्रावत सीसोदियों का प्राचीन स्थान है । मालवे के सुलतान होशंग के समय इस ठिकाने की स्थापना हुई और बहुत समय तक इसका वहां के सुलतानों से संबंध रहा । फिर मेवाड़ के उत्कर्ष के पिछले समय में यहां के स्वामी मेवाड़ राज्य के अधीन हो गये और राव दुर्ग- भान ने कई युद्धों में महाराणा उदयसिंह का साथ दिया । जब वि० सं० १६२४ ( ई० स० १५६७ ) में बादशाह अकबर की चित्तौड़ पर चढ़ाई हुई उस समय वह रामपुरा पर भी शाही आक्रमण होने के भय से चित्तौड़ में चला गया था । तदनंतर उक्त दुर्ग पर अकबर का अधिकार हो जाने पर दुर्गभान ने भी शाही अधीनता स्वीकार की और बादशाह अकबर से लगाकर मुहम्मदशाह तक दुर्गभान एवं उसके वंशधर साम्राज्य के भक्त रहे तथा युद्ध के अवसरों पर उन्होंने मुसलमान बादशाहों को पूरी सहायता पहुं- चाई । बादशाह औरंगज़ेब के समय दुर्गभान के वंशज गोपालसिंह ने, जब वह( वाद- शाह ) दक्षिण में मरहटों की सेना से लड़ने में व्यस्त था, अच्छा पराक्रम दिखलाया था । शाही नौकरों के बहकाने से उस ( गोपालसिंह ) के पुत्र रत्नसिंह ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया । इसपर वादशाह ने उसका नाम इस्लामखां रखकर रामपुरा का नाम इस्लामपुरा कर दिया । इस गड़बड़ी में रत्नसिंह को रामपुरा से निकालने के लिए गोपालसिंह ने बहुत झगड़ा किया और उदयपुर के महाराणा अमरसिंह (दूसरा ) को भी अपना सहायक बनाया । जहांदारशाह के समय रत्नसिंह शाही सेना से लड़कर मारा गया । तब गोपालसिंह ने वहां पर पुनः अपना अधिकार जमाने की चेष्टा की । इसी बीच महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा ) ने वह इलाक़ा वादशाह फ़र्रुख़- सियर के समय अपने अधिकार में लेने का प्रयत्न कर उक्त बादशाह से रामपुरा का फ़रमान अपने नाम करा लिया । फिर उसने सेना भेजकर अपनी अधीनता में रहने के इक़रार पर आधा इलाक़ा चंद्रावतों के पास रहने दिया और आधा अपने ख़ालसे में मिलाकर वहां के प्रबंध के लिए राठोड़ दुर्गादास को नियत किया । फिर जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने वह इलाक़ा महाराणा से वि० सं० १७८६ ( ई० स० १७२६ ) में अपने छोटे पुत्र माधवसिंह (जो महाराजा का भानजा था) के नाम लिखवा लिया । जयसिंह की मृत्यु पर जयपुर के राज्य की प्राप्ति के लिए मेवाड़ राज्य ने कई बार माधवसिंह की सहायतार्थ सेना रवाना की, जिसमें मल्हारराव होल्कर आदि भी थे । अंत में ईश्वरीसिंह की मृत्यु पर माधवसिंह जयपुर का स्वामी हुआ । फिर भी उसने रामपुरा पर अपना अधिकार कुछ दिनों तक और बनाये रखा और वि० सं० १८१७ (ई० स० १७६० ) के आस-पास वह ठिकाना मल्हारराव होल्कर को जयपुर पर अधि- कार कराने के एवज़ में दे दिया ।