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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 534 में से

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पृष्ठ 282

महारावत गोपालसिंह २२६ मांडू पर अधिकार करने के थोड़े ही दिनों पीछे जयसिंह मालवे का कार्य अपूर्ण छोड़कर अपनी राजधानी को लौट गया और साम्राज्य एवं अन्य कार्यों में व्यस्त हो गया, किन्तु मरहटों के साथ उसकी बात-चीत चलती रही । उसका कुछ परिणाम निकलनेवाला ही था कि इसी बीच उसके स्थान पर मुहम्मद बंगश वहां का सूबेदार बना दिया गया । उधर मरहटों ने जब जयसिंह के साथ जारी की हुई बात-चीत का परिणाम न निकलता देखा और मुहम्मद बंगश की कार्रवाइयां अपने विपरीत समझीं तो पुनः मालवे पर आक्रमण जारी कर दिये, जिससे वहां की स्थिति गंभीर हो गई और उसे मुहम्मद बंगश सम्हाल नहीं सका; क्योंकि शाही दरबार से उसको यथेष्ट सहायता नहीं मिली तथा निज़ाम आदि अन्य शाही अमीरों ने भी ( जिन्होंने उसको सहायता देने का क़रार किया था ) अवसर आने पर मौन साध लिया । अंत में वि० सं० १७८६ ( ई० स० १७३२ ) में तीसरी बार पुनः जयसिंह मालवे का सूबेदार बनाया गया । फ़रवरी मास में, जब जयसिंह मंदसोर के पास ठहरा हुआ था, होल्कर और सिंधिया ने उस ( जयसिंह ) को घेर लिया । यह समाचार सुनकर बादशाह ने स्वयं सेना के साथ मालवे की तरफ़ प्रस्थान कर दिया, जिसका संवाद पाने पर जयसिंह के साथी राजपूतों का भी उत्साह बढ़ गया और वे मरहटों के मुक़ाबले को आगे बढ़े । फिर मल्हारराव होल्कर और जयसिंह के बीच छोटा सा युद्ध भी हो गया, जिसमें मल्हारराव होल्कर को वहां से हट जाना पड़ा । जयसिंह ने होल्कर का पीछा किया, परंतु उसकी कुशलता से वह- ( जयसिंह ) स्वयं घिर गया¹ । बादशाह तब तक राजधानी से थोड़ी दूर ही आगे बढ़ा था और सहायक सेना भी उस समय तक न पहुंची थी । अत- एव विवश होकर उस ( जयसिंह ) को मरहटे सेनापतियों से संधि का प्रस्ताव चलाना पड़ा । निदान दो किश्तों में पांच लाख रुपये लेकर मालवा ( १ ) डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २२४। मालवा में युगान्तर; पृ० २५५ ।