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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

छोड़ने की शर्त पर उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह के धायभाई राव नग- राज' की मध्यस्थता में संधि हो गई। जयसिंह का मरहटों को विश्वास न था, इसलिए दो लाख रुपये तो एक महीने बाद और तीन लाख रुपये मालवा छोड़कर मरहटी सेना के गुजरात की सीमा पर पहुंच जाने पर मरहटों को देने का इक़रारनामा वि० सं० १७८६ चैत्र वदि ६ (ई० स० १७३३ ता० २७ फ़रवरी) को धायभाई नगराज ने मरहटा सेनापति मल्हारराव होल्कर, राणोजी सिंधिया और आनंदराव पंवार के नाम लिख दिया। ऐसी तहरीर उन तीनों सेनापतियों की तरफ़ से भी नगराज के नाम लिखी गई। फिर मरहटे सेनापतियों ने उस समय इक़रार का पालनकर मालवा से अपनी सेना हटा ली और नगराज ने भी इक़रार के अनुसार उन्हें रुपये देकर रसीदें ले लीं²। इसके बाद महाराजा जयसिंह की मालवा की तरफ़ से चिंता मिट गई और वह वहां से लौट गया। उसके वहां से लौटने के छः महीने बाद ही मरहटों ने पुनः मालवे पर धावा किया और वि० सं० १७६१ वैशाख वदि ३० (ई० स० १७३४ ता० २२ अप्रेल) को बुधसिंह की सहायतार्थ मरहटे सेनापति रामचंद्र, मल्हारराव होल्कर, राणोजी सिंधिया और आनंदराव पंवार ने दलेलसिंह को वहां से निकालने के लिए उस(दलेलसिंह) के भाई प्रतापसिंह के छः लाख रुपये देने का इक़- रार करने पर बूंदी पर चढ़ाई की और वहां से दलेलसिंह का अधिकार उठा दिया; परन्तु थोड़े दिनों बाद ही जयसिंह ने वहां पुनः दलेलसिंह का


(१) नगराज गूजर जाति का था और महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) का धायभाई था। वह महाराणा का पूर्ण विश्वासपात्र होने से मुसाहब के पद तक पहुंच गया था। युद्ध के अवसरों पर महाराणा की सेना का सेनापतित्व भी बहुधा वही किया करता था। धीर और नीतिकुशल व्यक्ति होने से महाराणा ने उसका सम्मान बढ़ाने के लिए उसे 'राव' की उपाधि प्रदान की थी। इस समय महाराणा ने सवाई जयसिंह के लिखने पर अपनी सेना के साथ उसको मरहटों की गति रोकने के लिए भेजा था। फलतः उसने मध्यस्थ बनकर उपर्युक्त समझौता करवा दिया। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १२१६ ।