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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 534 में से

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महारावत गोपालसिंह २३१ अधिकार करा दिया' । राजपूताने में मरहटों के हस्तछेप करने का यह पहला अवसर था। उन्हीं दिनों उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) का देहांत होकेर उसका कुंवर जगतसिंह (दूसरा) राजगद्दी पर बैठा । मेवाड़ राज्य की सीमा मालवे से मिली हुई होने के कारण वहां के महाराणाओं को मरहटों के बढ़ते हुए प्रभाव से पूरा भय था, इसलिए संग्रामसिंह और जगतसिंह मरहटों से मेल रखते थे एवं उन्होंने मल्हारराव होल्कर के साले नारायणराव को बूढ़ा की जागीर भी दी थी और उस (नारायणराव) के दक्षिण में चले जाने पर उक्त परगने की आय भी उसके पास पहुंचा दी जाती थी । पूर्वी राजपूताना के इस आक्रमण से वहां के नरेशों की भी आंखें खुलीं। अतएव वि० सं० १७६१ श्रावण वदि १३ (ई० स० १७३४ ता० १७ जुलाई) को मेवाड़ के हुरडा गांव में उदयपुर, जयपुर, जोधपुर, कोटा, बूंदी, करौली आदि के राजा एकत्रित हुए और उन्होंने सलाहकर पर- स्पर एकता रखने, एक के शत्रु को सबका शत्रु समझने एवं बरसात के बाद रामपुरा में अपनी-अपनी सेना के साथ एकत्र होने का इक़रार- नामा लिखा; किंतु पारस्परिक फूट और स्वार्थ-परता की भावनाओं के कारण इस इक़रारनामे का कुछ भी परिणाम नहीं निकला ४ । (१) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२१६-२०। (२) महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) वि० सं० १७६० माघ वदि ३ (ई० स० १७३४ ता० ११ जनवरी) को परलोक सिधारा और उसी दिन उसके कुंवर जग- तसिंह (द्वितीय) ने राज्यासीन होकर वि० सं० १७६१ ज्येष्ठ सुदि १३ (ई० स० १७३४ ता० ३ जून) को अपना राज्याभिषेकोत्सव किया। (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १२१८ । (४) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६२८-६। "वंशभा- स्कर" (चतुर्थ भाग, पृ० ३२२७) में हुरडा के मुकाम पर वि० सं० १७६१ के कार्तिक (ई० स० १७३४ आक्टोबर) मास में और "जोधपुर राज्य की ख्यात" (जि० २, पृ० ..१४२) में वि० सं० १७६२ (ई० स० १७२५) में राजपूताने के सब राजाओं का एकत्र होना लिखा है, जो ठीक नहीं है । उदयपुर में असली इक़रारनामा मौजूद है,

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