राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
उसी वर्ष के नवंबर मास में वज़ीर कमरुद्दीन$^१$ ने मरहटों को दबाने के लिए मालवे की ओर प्रस्थान किया और दूसरी तरफ़ से खानदौराँ$^२$ भी जिसमें श्रावण मास में सब राजाओं का एकत्र होना लिखा है और "वीरविनोद" तथा कर्नल टॉड ने भी वि० सं० १७६१ का श्रावण मास ही दिया है। (१) यह एतमादुद्दौला मुहम्मद अमीनख़ां का पुत्र और निज़ामुल्मुल्क आसफ़- जाह का भतीजा था। इसका असली नाम मीर मुहम्मद फ़ाज़िल लिखा मिलता है। वाद- शाह मुहम्मदशाह ने निज़ामुल्मुल्क चिनक़लीचख़ां आसफ़जाह के वज़ीर का पद परित्याग करने पर वि० सं० १७६१ (ई० स० १७३४) में इसको अपना वज़ीर बनाया और एतमा- दुद्दौला नवाब कमरुद्दीनख़ां बहादुर नसरतजंग की उपाधि से विभूषित किया। वि० सं० १८०४ चैत्र वदि ८ (ई० स० १७४८ ता० ११ मार्च) को मुहम्मदशाह के राज्य-काल में अहमदशाह अब्दाली (दुर्रानी) के आक्रमण के समय सरहिंद के युद्ध में इसकी मृत्यु हुई। "मेमोरंडम ऑन इंडियन स्टेट्स' तथा ए० वेदी वेलू-कृत "रूलिंग चीफ्स, नोबल्स एंड ज़मींदार्स ऑव् इंडिया" आदि पुस्तकों में हैदराबाद के निज़ाम को उपर्युक्त वज़ीर कमरुद्दीन का वंशधर लिखकर उसका उपनाम चिनक़लीचख़ां लिखा है, जो ठीक नहीं है; क्योंकि अधिकांश स्थलों पर उसे चिनक़लीचख़ां का ही वंशज बतलाया है, जिसका उपनाम निज़ामुल्मुल्क था। (२) ख़ानदौराँ का पूरा नाम अब्दुत्समंदख़ां था और इसकी पूरी उपाधि "नवाब शम्सुद्दौला बहादुरजंग" थी। यह ख़्वाजा अब्दुलकरीम का पुत्र था। वादशाह औरंगज़ेब के समय इसने प्रारंभ में छः सौ सवारों का मंसब पाया, जो बढ़ते-बढ़ते पंद्रह सौ सवारों तक पहुंच गया। जहांदारशाह ने इसको सात हज़ारी मंसबदार बनाकर "अली जंग" का ख़िताब दिया। फ़र्रुख़सियर के समय यह लाहोर का सूवेदार था। जब उक्त वादशाह ने सिखों के विरुद्ध इसको सेना देकर भेजा, तब इसने सिक्खों को परास्त कर बंदा वैरागी को क़ैद किया। मुहम्मदशाह के समय यह मुल्तान का सूवेदार बनाया गया और इसको 'अमीरुलउमरा शम्सुद्दौला" की उपाधि मिली। वि० सं० १७६६ (ई० स० १७३६) में भारत पर नादिरशाह की चढ़ाई के समय यह मारा गया। यह महाराजा सवाई जयसिंह का पूरा पक्षपाती एवं साम्राज्य का भी भक्त रहा। मरहटों का उत्थान देख यह उनसे मेल करना चाहता था और वस्तुतः बाजीराव बल्लाल को मालवे की सूबेदारी इसकी सिफ़ारिश से ही मिली थी। शाही अमीर निज़ामुल्मुल्क आसफ़जाह, वज़ीरुल्मुल्क कमरुद्दीनख़ां, बुर्हानुल्मुल्क, सआ- दतख़ां आदि के अनैक्य, राजपूत राजाओं की महत्वाकांक्षा तथा राज्य-वृद्धि की लालसा एवं मरहटों का उत्कर्ष देख यह बार-बार समझौते की चेष्टा किया करता था; क्योंकि उस समय सल्तनत की हालत कमज़ोर थी।