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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 534 में से

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महारावत गोपालसिंह २३३. मरहटों से समझौते के लिए मरहटों को दबाने के लिए आगे बढ़ा, जिसके साथ देवलिया के समीप एकत्र सवाई जयसिंह, कोटा का महाराव दुर्जनसाल, होने की विफल जोधपुर का महाराजा अभयसिंह आदि भी विद्य- योजना मान थे¹। मरहटा-दल ने शाही सेना को घेरकर रसद का मार्ग रोक दिया और कोटा, बूंदी की तरफ़ होते हुए उन्होंने जयपुर तथा जोधपुर राज्य में पहुंचकर लूट-मार आरंभ की । छः मास तक शाही फ़ौज मरहटों की सेना का पीछा कर उसको दबाने में व्यस्त रही, परंतु इससे मरहटों की गति मंद न हुई । उनका सैन्य-संगठन और परिचालन इतना अच्छा था कि शाही फ़ौज घिर गई और उसकी बड़ी हानि हुई । अंत में महाराजा जयसिंह के परामर्श के अनुसार खानदौरां ने उस समय सिंधिया और होल्कर से संधि कर चौथ के बाईस लाख रुपये देना स्वीकार किया²। कर्नल टॉड-कृत "राजस्थान" में महाराणा जगतसिंह (दूसरा) का अपने मन्त्री बिहारीदास के नाम वि० सं० १७६१ आश्विन (ई० स० १७३४) में भेजा हुआ पत्र दिया है, जिससे प्रकट है कि महाराणा ने इस अवसर पर आश्विन मास के पूर्व ही अपने मन्त्री पंचोली बिहारीदास को ससैन्य भेज दिया था। इस पत्र में उसने लिखा था—"मरहटों का मामला अच्छी तरह से तय किया जाय एवं इस संबंध में विचार-विमर्श के लिए किसी स्थान पर एकत्रित होना स्थिर हो तो देवलिया के समीप एकत्र होना बुद्धिमानी नहीं होगी। तुम अपने साथ की सेना की संख्या कम कर दो, जिससे रुपयों की आवश्यकता न होगी। रामपुरा का कार्य गत वर्ष की भांति तय किया जाय और दौलतसिंह³ को (१) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२२७ । जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० २, पृ० १४४ । मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३१ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६२ । (२) मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३२ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६३ । (३) "वंशभास्कर" (चतुर्थ भाग, पृ० ३२२५-२६) से पाया जाता है कि यह परमार जाति का राजपूत और महाराणा का सरदार था । संभव है कि यह महाराणा की तरफ से मरहटों के पास वकील के रूप में रहता हो । ३०