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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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पृष्ठ 287

२३४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कह दिया जाय कि फिर ऐसा अवसर न हो' ।" इससे अनुमान होता है कि मरहटों का उपद्रव देवलिया राज्य के निकट तक पहुंच गया था और संभव है कि वह मरहटी सेना के आवागमन के कारण उपद्रवों से सुरक्षित न हो एवं मरहटों तथा राजा लोगों के परामर्श के निमित्त देवलिया के आस-पास एकत्र होने से उक्त राज्य तथा वहां की प्रजा को कष्ट होने की संभावना हो । बादशाह की तरफ़ से मालवे में मरहटों की गति रोके जाने और चौथ की वसूली के स्वत्व की बाबत कोई बात तय न होने से पेशवा बाजीराव किसी भी दशा में मालवे के संबंध में सम्मानपूर्ण • पेशवा के राजपूताना में समझौता करने को उत्सुक था । उसने इसके पहुंचने पर महारावत का लिए उदयपुर और जयपुर के राजाओं को अपनी उसके पास जाना ओर मिलाकर कोई मार्ग निकालना चाहा । वैसे तो उक्त दोनों राज्यों का मरहटों से मेल था, पर क्रियात्मक रूप से वे मरहटों का साथ न देते थे । कहा जाता है कि शाही दरबार में मरहटों से मिलावट रखने की सवाई जयसिंह की पूर्ण शिकायत हो रही थी, इसलिए उसको शाही दरबार से घृणा हो गई और वह मरहटों को उकसाने लगा । फलतः पेशवा ने इस अवसर से लाभ उठाने के लिए अपनी माता को, जो गया आदि की यात्रा के हेतु जानेवाली थी, मार्ग में उदयपुर तथा जयपुर के राजाओं के पास भेजना स्थिर किया और वि० सं० १७६२ (ई० स० १७३५) में महाराणा के वकील जयसिंह शक्तावत² के साथ उसको रवाना कर उस (जयसिंह) को आदेश दिया कि वह महाराणा से निवेदन कर सवाई जयसिंह को कहलादे कि वह शाही इलाक़े में राहदारी और तीर्थ ( १ ) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ४६१-२ । ( २ ) जयसिंह शक्तावत मेवाड़ में पीपलिया के ठिकानेवालों का पूर्वज था । उसके पिता शक्तावत बाघसिंह को महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) ने छत्रपति राजा शाहू की सहायतार्थ भेजा था । शाहू के यहां बाघसिंह का बड़ा सम्मान था । उसकी मृत्यु के बाद जयसिंह वहां रहकर महाराणा की तरफ़ से राजदूत का कार्य करता था ।