राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत गोपालसिंह २३५ कर माफ़ कराने की व्यवस्था कर दे। तदनन्तर जयसिंह शक्तावत पेशवा की माता के साथ उदयपुर गया और उसने महाराणा से सब वृत्तांत निवेदन किया' । ता० ६ मई (ज्येष्ठ वदि १०) को पेशवा की माता के उदयपुर पहुंचने पर महाराणा ने उसकी अग्रगामिता कर बड़ा सम्मान किया । फिर वहां से नाथद्वारा होती हुई वह जयपुर गई । महाराणा ने उसके साथ जयपुर तक शक्तावत जयसिंह और सलूंबर के रावत केसरीसिंह को भेजा³, जिन्होंने सवाई जयसिंह से कहकर पेशवा की माता से राहदारी और तीर्थ- कर न लेने की व्यवस्था करवा दी । सवाई जयसिंह की गुप्त अभिसंधि जारी थी, इसी बीच उदयपुर और जयपुर में जाने पर पेशवा की माता का अच्छा सम्मान हुआ, जिसका उसपर बड़ा प्रभाव पड़ा । फिर उसने स्वयं उन दोनों जगहों के राजाओं के पास उपस्थित होकर चौथ और मालवा आदि का मामला तय कर लेना चाहा । वादशाह मुहम्मदशाह भी साम्राज्य की स्थिति नाजुक देख पेशवा का मामला निबटाना चाहता था और सवाई जयसिंह की मारफ़त ही, जो मालवे का सूवेदार था४, इसकी बात चल रही थी। निदान पेशवा के पास (१) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२२२-२४। (२) मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३३ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६४ । (३) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२२४ । (४) मालवा पर सवाई जयसिंह की अंतिम सूबेदारी वि० सं० १७८६ कार्तिक वदि ६ (ई० स० १७३२ ता० २८ सितंबर) से वि० सं० १७६४ भाद्रपद वदि ४ (ई० स० १७३७ ता० ३ अगस्त) तक रही थी । इसके पीछे बादशाह ने वहां की सूबेदारी निज़ामुलमुल्क के ज्येष्ठ पुत्र गाज़ीउद्दीनखां को सौंपी । पेशवा से जयसिंह ही मिलावट न रखता था, प्रत्युत् निज़ामुलमुल्क भी उससे दबता था और वि० सं० १७८८ (ई० स० १७३१) के लगभग उसने ऐसी गुप्त संधि भी की थी कि उत्तर भारत के सम्बन्ध में पेशवा जो कार्यवाही करेगा, उसमें निज़ामुलमुल्क उसका बाधक न होगा ( मालवा में युगान्तर; पृ० २४६ ); किंतु फिर उसको अपना विरोधी देख, मरहटों ने उसके साथ संघर्ष जारी कर दिया । अन्त में मरहटों की युद्ध-कुशलता से निज़ामुलमुल्क का भी साहस कम हो गया और वि० सं० १७६४ माघ वदि १२