भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 534 में से

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पृष्ठ 289

२३६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वादशाह के इशारे से ज्योंही महाराजा सवाई जयसिंह का निमन्त्रण पहुंचा, वह कार्तिक सुदि ५ ( ता० ६ अक्टूबर ) को पूना से रवाना ( ई० स० १७३८ ता० ६ जनवरी ) को मालवे का सारा अधिकार पेशवा को सौंप देने की बात स्थिर हुई; परन्तु उन दिनों नादिरशाह के भारत पर आक्रमण करने की आशंका बढ़ रही थी। इसलिए इस समझौते को क्रियात्मक रूप नहीं दिया जा सका और लिखित रूप से वादशाह की भी स्वीकृति नहीं हुई। इसी बीच बाजीराव पेशवा की वि० सं० १७६७ ज्येष्ठ वदि ११ (ई० स० १७४० ता० १० मई) को मृत्यु हो गई और उसका पुत्र बालाजी बाजीराव पेशवा बना। इस गड़बड़ी के कारण बादशाह का विचार बदल गया और निज़ामुल्मुल्क आसफ़जाह के प्रस्ताव करने पर उसका चचेरा भाई अज़ीमुल्ला वि० सं० १७६७ ( ई० स० १७४० ) के लगभग मालवे का सूबेदार बनाया गया, जिससे पुनः मालवा से मरहटों के सब अधिकार उठ जाने की संभावना दीख पड़ी, जिसका विरोध करने के लिए पेशवा ने पृथक्-पृथक् रूप से उत्तर भारत में अपने विभिन्न दलों को रवाना किया। बादशाह ने शम्सुद्दौला आज़मख़ां और सवाई जयसिंह को मरहटों के मुक़ाबले के लिए भेजा, किंतु शाही सेना की इतनी क्षमता नहीं थी कि वह मरहटा-दल से जमकर मुक़ाबला करती। निदान वादशाह की आज्ञानुसार संवाई जयसिंह ने मरहटों से पुनः बात-चीत जारी की। अन्त में सल्तनत के सम्बन्ध के कार्यों में हस्तक्षेप न करने और चौथ उगाहने का दावा पेशवा के छोड़ने पर गुजरात और मालवा प्रांत का समस्त अधिकार शाही फ़रमान-द्वारा वि० सं० १७६८ भाद्रपद सुदि ८ ( ई० स० १७४१ ता० ७ सितम्बर ) को पेशवा बालाजी बाजीराव को सौंप दिया गया और वादशाहत का इन प्रांतों से कोई सम्बन्ध नहीं रहा। औरंगज़ेब की मृत्यु के पिछले चालीस वर्षों की उलटपल्टी में भारत के भाग्य ने बड़ा पलटा खाया। साम्राज्य की इस निर्बल स्थिति में शाही सरदार दोस्तमुहम्मदख़ां ने बादशाह से कुछ जागीर प्राप्तकर क्रमशः आस-पास की भूमि पर अधिकार कर भोपाल राज्य की स्थापना कर ली, पर मरहटा-संघर्ष में उनसे मेल रखते हुए धन आदि देकर ही वह अपना अस्तित्व स्थिर रख सका था। पेशवा बालाजी बाजीराव की विद्यमानता में ही उसके होल्कर, सिंधिया आदि सेनाध्यक्ष बड़े शक्तिशाली हो गये थे और वे मनमानी कार्यवाही करने से न चूकते थे। फिर भी वे अपने को पेशवा के अधीन ही समझते थे और पेशवा भी सतारा के स्वामी को अपना मालिक मानता था। समय की गति के परिवर्तन के साथ ही सतारा राज्य और पेशवा की सत्ता निर्बल होने पर उन्होंने उनकी आज्ञा मानना छोड़ दिया और स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण कर लूट-खसोट-द्वारा धन संग्रह करने की नीति को अपनाया। फलतः एकतन्त्र शासन के