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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 534 में से

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महारावत गोपालसिंह २३७ होकर गुजरात की तरफ़ के राज्यों से चौथ का मामला तय कराता हुआ लूणावाड़ा और डूंगरपुर के मार्ग से उदयपुर पहुंचा¹। देवलिया प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों से पाया जाता है कि इस अवसर पर पेशवा ने डूंगरपुर पर घेरा डाल दिया था और महारावत गोपालसिंह ने पेशवा को समझा- कर मरहटी सेना का घेरा उठवाया²। डूंगरपुर राज्य की ख्यातों में पेशवा की सेना के वहां घेरा डालने का वृत्तांत नहीं दिया है, पर यह संभव है कि पेशवा के बृहत् लश्कर के डूंगरपुर पहुंचने पर वहां के तत्कालीन महारावल शिवसिंह ने उसका यथोचित् सत्कार न किया हो और न कुछ द्रव्य ही दिया हो, जिससे पेशवा ने वहां घेरा डाला हो और फिर महारावत गोपालसिंह के, जो संभवतः पेशवा के साथ हो अथवा मित्रता के कारण महारावल के बुलाने पर वहां पहुंचा हो, कहने-सुनने पर खिराज ( चौथ ) की रक़म निर्दिष्ट होकर घेरा उठा दिया गया हो। इस घटना का समय माघ सुदि १३ ( ई० स० १७३६ ता० १५ जनवरी ) के आस-पास होना चाहिये, क्योंकि उस तिथि को पेशवा मेवाड़ की दक्षिणी सीमा पर पहुंच गया था³। महाराणा ने अपने राज्य में होकर पेशवा के जयपुर जाने का समा- चार सुना तो उसको लाने के लिए अपने पिता महाराणा संग्रामसिंह के अभाव में सर्वत्र अशांति और अव्यवस्था बढ़ने लगी। इसमें संदेह नहीं कि इस अवधि में कई राज्यों का विकास भी हुआ और कुछ नये राज्य भी स्थापित हुए, परन्तु कई प्राचीन और प्रतिष्ठित राज्यों के बिगड़ने में भी कसर नहीं रही, जिनका हमने यथा- प्रसङ्ग उल्लेख किया है और आगे भी करेंगे। ( १ ) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२३५ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २३७ । मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३७ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६८ । ( २ ) “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में वि० सं० १७८८ ( ई० स० १७३१ ) में पेशवा बाजीराव का डूंगरपुर को घेरना लिखा है, किंतु यह बात ठीक नहीं जान पड़ती, क्योंकि वि० सं० १७८८ में पेशवा का उधर जाना नहीं हुआ था । ( ३ ) मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३७ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६८ ।

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