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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२३८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास काका महाराज तख्तसिंह' और सलूंबर के रावत केसरीसिंह को मेवाड़ की सीमा तक सामने भेजा और जब पेशवा उदयपुर के निकट पहुंचा तो वह स्वयं बड़े समारोहपूर्वक सामने जाकर उसको अपनी राजधानी में ले आया²। पेशवा ने इस असाधारण सम्मान के लिए कृतज्ञता प्रकट करते हुए महाराणा से प्रार्थना की कि आप मुझे सोलह उमरावों के समान एक उमराव समझें। फिर चौथ तथा मालवा आदि के संबंध में बात- चीत हुई। इसपर महाराणा ने बनेड़ा³ परगने की आय प्रति वर्ष पेशवा को देना स्वीकार किया। कर्नल टॉड-कृत "राजस्थान" में महाराणा जगतसिंह का उसके प्रधान विहारीदास पंचोली के नाम का पत्र (१) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग; पृ० ३२३५। यह महाराणा जयसिंह द्वितीय का चतुर्थ पुत्र था और मेवाड़ में बाकरोल (जिसको हम्मीरगढ़ कहते हैं) इसकी जागीर में था। (२) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२३५-३६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १२३२। (३) बनेड़ा का परगना मेवाड़ राज्य के अन्तर्गत था, परन्तु औरंगज़ेब के समय में यह मेवाड़ राज्य से पृथक् हो गया और उक्त बादशाह ने महाराणा राजसिंह (प्रथम) के छोटे कुंवर भीमसिंह को शाही सेवा स्वीकार करने के एवज़ में जागीर के साथ अन्य परगनों के सहित दे दिया। भीमसिंह की मृत्यु के पश्चात् उसके वंशजों का शाही दरबार में विशेष प्रभाव न रहा। औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात् बादशाहत की निर्बलता और मरहटों की लूट-खसोट की नीति से उनकी स्थिति डांवा-डोल हो गई और मालवा में बदनावर आदि के उनके परगने छिन गये। इस अवसर पर महाराणा जगतसिंह (दूसरा) ने भी बनेड़ा अपने राज्य में मिलाकर भीमसिंह के वंशज सरदारसिंह को अपना सरदार बना लिया। अनुमान होता है कि इस परगने की सनद महाराणा के नाम न होने से पेशवा के दबाव देने पर ही इसकी आय उसको देना महाराणा ने स्वीकार किया हो एवं मरहटों का मेवाड़ में दखल न बढ़ने देने के लिए ही वह उक्त परगने की आय वि० सं० १७६६ (ई० स० १७४२) तक उसके पास पहुंचाता रहा हो। इसके बाद उसने बादशाह के पास अपना वकील भेज वि० सं० १८०० आश्विन सुदि ७ (ई० स० १७४३ ता० १३ सितम्बर = हि० स० ११५६ ता० ५ शावान) को बादशाह मुहम्मदशाह के वज़ीर कमरुद्दीन से शाहपुरा, सावर, जहाजपुर और बनेड़ा के परगनों