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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 534 में से

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महारावत गोपालसिंह २३६

उद्धृत किया है। उससे प्रकट है कि बाजीराव महाराणा से ज़मीन के अतिरिक्त अन्य राजाओं की अपेक्षा बीस गुना अधिक धन लेना चाहता था¹। इस मुलाक़ात के समय बिहारीदास उदयपुर में नहीं था और संभवतः जयपुर या बादशाही दरबार में गया होगा। इसलिए महाराणा ने उसको पत्र लिखकर सूचना दी होगी।

से, जो महाराणा के कुटुम्बियों के थे, सूबेदारों द्वारा नज़राने की रक़म की वसूली की मुआफ़ी की सनद करा ली हो, जिसको “वीरविनोद” के लेखक ने (द्वितीय भाग, पृ० १२४२-४४ में) उद्धृत किया है।

कर्नल टॉड ने “राजस्थान” (जि० १, पृ० ४६४) में इस अवसर पर महाराणा का पेशवा को चौथ के एक लाख साठ हज़ार रुपये वार्षिक देते रहने की बात स्थिर करने और उसके एवज़ में बनेड़ा परगने की आय देते रहने का इक़रार करने का उल्लेख किया है, जिसका समर्थन “वंशभास्कर” से भी होता है; परन्तु वहां रुपयों की संख्या एक लाख पचास हज़ार ही दी है (चतुर्थ भाग, पृ० ३२३७)। “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १२२८-६) में इस सम्बन्ध में एक पत्र उद्धृत किया गया है, जिसमें बनेड़ा परगने की आय के सं० १७६२ से १७६६ (ई० स० १७३५ से ४२) तक के नौ लाख पच्चीस हज़ार रुपये तथा पेशवा उदयपुर गया, उस समय मिहमानी के दो लाख रुपये देने का विवरण है। इससे स्पष्ट है कि मरहटों को वार्षिक १६०००० रुपया महाराणा-द्वारा ख़िराज के देने की बात में कोई तथ्य नहीं है। यह ठीक है कि वि० सं० १७६२ से ६६ (ई० स० १७३५ से ४२) तक उक्त परगने की आय, जिसका औसत लगभग एक लाख पचीस हज़ार रुपया वार्षिक था, पेशवा के पास पहुंचती रही, जिसका कारण हम ऊपर दिखला चुके हैं।

(१) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ४६२ । “वंशभास्कर” से प्रकट है कि बाजीराव को उदयपुर में किसी ने बहकाया कि जगमंदिर नामक महल को दिखाने के बहाने ले जाकर तुम्हें मार डालेंगे। इसपर वह बड़ा क्रोधित हुआ। फिर महाराणा ने उस (बाजीराव) के क्रोध को शांत करने के लिए सात लाख रुपये देकर उसको वहां से विदा किया (भाग ४, पृ० ३२३७)। महाराणा के मंत्री बिहारीदास के नाम के उपर्युक्त पत्र से प्रतीत होता है कि पेशवा ने कोई बहाना निकालकर महाराणा से अधिक रक़म लेने के लिए दबाव डाला होगा। फलतः महाराणा ने उसको प्रसन्न रखने के लिए उपर्युक्त बनेड़ा परगने की आय उसके पास पहुंचाने की बात स्थिर कर उसको वहां से विदा किया हो।

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