राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
महारावत गोपालसिंह २३७ होकर गुजरात की तरफ़ के राज्यों से चौथ का मामला तय कराता हुआ लूणावाड़ा और डूंगरपुर के मार्ग से उदयपुर पहुंचा¹। देवलिया प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों से पाया जाता है कि इस अवसर पर पेशवा ने डूंगरपुर पर घेरा डाल दिया था और महारावत गोपालसिंह ने पेशवा को समझा- कर मरहटी सेना का घेरा उठवाया²। डूंगरपुर राज्य की ख्यातों में पेशवा की सेना के वहां घेरा डालने का वृत्तांत नहीं दिया है, पर यह संभव है कि पेशवा के बृहत् लश्कर के डूंगरपुर पहुंचने पर वहां के तत्कालीन महारावल शिवसिंह ने उसका यथोचित् सत्कार न किया हो और न कुछ द्रव्य ही दिया हो, जिससे पेशवा ने वहां घेरा डाला हो और फिर महारावत गोपालसिंह के, जो संभवतः पेशवा के साथ हो अथवा मित्रता के कारण महारावल के बुलाने पर वहां पहुंचा हो, कहने-सुनने पर खिराज ( चौथ ) की रक़म निर्दिष्ट होकर घेरा उठा दिया गया हो। इस घटना का समय माघ सुदि १३ ( ई० स० १७३६ ता० १५ जनवरी ) के आस-पास होना चाहिये, क्योंकि उस तिथि को पेशवा मेवाड़ की दक्षिणी सीमा पर पहुंच गया था³। महाराणा ने अपने राज्य में होकर पेशवा के जयपुर जाने का समा- चार सुना तो उसको लाने के लिए अपने पिता महाराणा संग्रामसिंह के अभाव में सर्वत्र अशांति और अव्यवस्था बढ़ने लगी। इसमें संदेह नहीं कि इस अवधि में कई राज्यों का विकास भी हुआ और कुछ नये राज्य भी स्थापित हुए, परन्तु कई प्राचीन और प्रतिष्ठित राज्यों के बिगड़ने में भी कसर नहीं रही, जिनका हमने यथा- प्रसङ्ग उल्लेख किया है और आगे भी करेंगे। ( १ ) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२३५ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २३७ । मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३७ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६८ । ( २ ) “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में वि० सं० १७८८ ( ई० स० १७३१ ) में पेशवा बाजीराव का डूंगरपुर को घेरना लिखा है, किंतु यह बात ठीक नहीं जान पड़ती, क्योंकि वि० सं० १७८८ में पेशवा का उधर जाना नहीं हुआ था । ( ३ ) मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३७ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६८ ।
२३८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास काका महाराज तख्तसिंह' और सलूंबर के रावत केसरीसिंह को मेवाड़ की सीमा तक सामने भेजा और जब पेशवा उदयपुर के निकट पहुंचा तो वह स्वयं बड़े समारोहपूर्वक सामने जाकर उसको अपनी राजधानी में ले आया²। पेशवा ने इस असाधारण सम्मान के लिए कृतज्ञता प्रकट करते हुए महाराणा से प्रार्थना की कि आप मुझे सोलह उमरावों के समान एक उमराव समझें। फिर चौथ तथा मालवा आदि के संबंध में बात- चीत हुई। इसपर महाराणा ने बनेड़ा³ परगने की आय प्रति वर्ष पेशवा को देना स्वीकार किया। कर्नल टॉड-कृत "राजस्थान" में महाराणा जगतसिंह का उसके प्रधान विहारीदास पंचोली के नाम का पत्र (१) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग; पृ० ३२३५। यह महाराणा जयसिंह द्वितीय का चतुर्थ पुत्र था और मेवाड़ में बाकरोल (जिसको हम्मीरगढ़ कहते हैं) इसकी जागीर में था। (२) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२३५-३६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १२३२। (३) बनेड़ा का परगना मेवाड़ राज्य के अन्तर्गत था, परन्तु औरंगज़ेब के समय में यह मेवाड़ राज्य से पृथक् हो गया और उक्त बादशाह ने महाराणा राजसिंह (प्रथम) के छोटे कुंवर भीमसिंह को शाही सेवा स्वीकार करने के एवज़ में जागीर के साथ अन्य परगनों के सहित दे दिया। भीमसिंह की मृत्यु के पश्चात् उसके वंशजों का शाही दरबार में विशेष प्रभाव न रहा। औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात् बादशाहत की निर्बलता और मरहटों की लूट-खसोट की नीति से उनकी स्थिति डांवा-डोल हो गई और मालवा में बदनावर आदि के उनके परगने छिन गये। इस अवसर पर महाराणा जगतसिंह (दूसरा) ने भी बनेड़ा अपने राज्य में मिलाकर भीमसिंह के वंशज सरदारसिंह को अपना सरदार बना लिया। अनुमान होता है कि इस परगने की सनद महाराणा के नाम न होने से पेशवा के दबाव देने पर ही इसकी आय उसको देना महाराणा ने स्वीकार किया हो एवं मरहटों का मेवाड़ में दखल न बढ़ने देने के लिए ही वह उक्त परगने की आय वि० सं० १७६६ (ई० स० १७४२) तक उसके पास पहुंचाता रहा हो। इसके बाद उसने बादशाह के पास अपना वकील भेज वि० सं० १८०० आश्विन सुदि ७ (ई० स० १७४३ ता० १३ सितम्बर = हि० स० ११५६ ता० ५ शावान) को बादशाह मुहम्मदशाह के वज़ीर कमरुद्दीन से शाहपुरा, सावर, जहाजपुर और बनेड़ा के परगनों
महारावत गोपालसिंह २३६
उद्धृत किया है। उससे प्रकट है कि बाजीराव महाराणा से ज़मीन के अतिरिक्त अन्य राजाओं की अपेक्षा बीस गुना अधिक धन लेना चाहता था¹। इस मुलाक़ात के समय बिहारीदास उदयपुर में नहीं था और संभवतः जयपुर या बादशाही दरबार में गया होगा। इसलिए महाराणा ने उसको पत्र लिखकर सूचना दी होगी।
से, जो महाराणा के कुटुम्बियों के थे, सूबेदारों द्वारा नज़राने की रक़म की वसूली की मुआफ़ी की सनद करा ली हो, जिसको “वीरविनोद” के लेखक ने (द्वितीय भाग, पृ० १२४२-४४ में) उद्धृत किया है।
कर्नल टॉड ने “राजस्थान” (जि० १, पृ० ४६४) में इस अवसर पर महाराणा का पेशवा को चौथ के एक लाख साठ हज़ार रुपये वार्षिक देते रहने की बात स्थिर करने और उसके एवज़ में बनेड़ा परगने की आय देते रहने का इक़रार करने का उल्लेख किया है, जिसका समर्थन “वंशभास्कर” से भी होता है; परन्तु वहां रुपयों की संख्या एक लाख पचास हज़ार ही दी है (चतुर्थ भाग, पृ० ३२३७)। “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १२२८-६) में इस सम्बन्ध में एक पत्र उद्धृत किया गया है, जिसमें बनेड़ा परगने की आय के सं० १७६२ से १७६६ (ई० स० १७३५ से ४२) तक के नौ लाख पच्चीस हज़ार रुपये तथा पेशवा उदयपुर गया, उस समय मिहमानी के दो लाख रुपये देने का विवरण है। इससे स्पष्ट है कि मरहटों को वार्षिक १६०००० रुपया महाराणा-द्वारा ख़िराज के देने की बात में कोई तथ्य नहीं है। यह ठीक है कि वि० सं० १७६२ से ६६ (ई० स० १७३५ से ४२) तक उक्त परगने की आय, जिसका औसत लगभग एक लाख पचीस हज़ार रुपया वार्षिक था, पेशवा के पास पहुंचती रही, जिसका कारण हम ऊपर दिखला चुके हैं।
(१) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ४६२ । “वंशभास्कर” से प्रकट है कि बाजीराव को उदयपुर में किसी ने बहकाया कि जगमंदिर नामक महल को दिखाने के बहाने ले जाकर तुम्हें मार डालेंगे। इसपर वह बड़ा क्रोधित हुआ। फिर महाराणा ने उस (बाजीराव) के क्रोध को शांत करने के लिए सात लाख रुपये देकर उसको वहां से विदा किया (भाग ४, पृ० ३२३७)। महाराणा के मंत्री बिहारीदास के नाम के उपर्युक्त पत्र से प्रतीत होता है कि पेशवा ने कोई बहाना निकालकर महाराणा से अधिक रक़म लेने के लिए दबाव डाला होगा। फलतः महाराणा ने उसको प्रसन्न रखने के लिए उपर्युक्त बनेड़ा परगने की आय उसके पास पहुंचाने की बात स्थिर कर उसको वहां से विदा किया हो।
२४० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उदयपुर से पेशवा जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के पास गया । उस समय उसके साथ प्रतापगढ़ का महारावत गोपालसिंह भी था । ता० ३ शव्वाल हि० स० ११४८ ( फाल्गुन सुदि ४ = ता० ५ फ़रवरी ) को पेशवा ने महारावत को रुख़्सत देकर ख़ासा अस्तबल से आभूषण- सहित घोड़े महाराणा के लिए उसके साथ रवाना किये १ । जोधपुर के महाराजा अभयसिंह ने बीकानेर के महाराजा जोरावर- सिंह के समय वि० सं० १७६७ ( ई० स० १७४० ) में बड़ी सेना के साथ बीकानेर पर चढ़ाई कर चारों तरफ़ से राजधानी एवं दुर्ग को घेर लिया । महाराजा जोरावरसिंह ने बहुत दिनों तक जोधपुर की सेना का सामना किया, परंतु जोधपुर की बड़ी सेना के आगे वह छुटकारा न पा सका । अन्त में नागोर के स्वामी राजाधिराज बख्तसिंह (अभयसिंह का छोटा भाई ) की सम्मति के अनुसार जोरावरसिंह ने जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के पास अपने आदमी भेज सहायता के लिए कहलाया । जयसिंह ने अभयसिंह को बीकानेर से घेरा उठाने के लिए कहलाया, परंतु जब उसने वहां से घेरा उठाना स्वीकार न किया तो उस (जयसिंह)- ने विशाल सेना के साथ जोधपुर की ओर प्रयाण किया एवं उदयपुर के महाराणा जगतसिंह (दूसरा ) को भी सेना लेकर आने के लिए लिखा । सवाई जयसिंह के लेखानुसार महाराणा ने सलूंबर के रावत केसरीसिंह को कुछ सेना के साथ तत्काल ही भेज दिया २ और पीछे से वह स्वयं भी पुष्कर-यात्रा के बहाने अपनी सेना के साथ महाराजा जयसिंह को जोधपुर के घेरे में सहायता पहुंचाने के निमित्त रवाना हुआ ३ और उसके साथ कोटा से महाराव दुर्जनसाल, डूंगरपुर से महारावल शिवसिंह तथा प्रतापगढ़ से
[हाशिया / पार्श्व-टिप्पणी:] महारावत का महाराणा के साथ सवाई जयसिंह की सहायतार्थ जाना
[पाद-टिप्पणियाँ:] ( १ ) सिलेक्शन्स फ़्रॉम पेशवाज़ दफ़्तर; जि० ३, पृ० ३२१, सं० ३२१ । ( २ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १२२४ । ( ३ ) वही; द्वितीय भाग, पृ० १२२४ । "वंशभास्कर" ( चतुर्थ भाग, पृ० ३२६६ ) में महाराणा के साथ ८०००० सेना होना बतलाया है ।
महारावत गोपालसिंह २४१ महारावत गोपालसिंह भी जाकर सम्मिलित हो गये¹, किंतु जयसिंह ने महाराणा के पहुंचने के पूर्व ही जोधपुर पहुंच वहां घेरा डाल दिया। जयपुर की सेना-द्वारा जोधपुर के घेरे जाने का समाचार पाकर अभयसिंह बीकानेर का घेरा उठाकर जोधपुर लौट गया और फिर संधि की बातचीत होने पर उन्नीस लाख रुपये लेकर जयसिंह ने जोधपुर का घेरा उठाकर जयपुर की तरफ़ प्रयाण किया। इस बीच महाराणा भी अजमेर की सीमा में जा पहुंचा और मार्ग में जयसिंह तथा जोरावरसिंह जाकर उससे मिले²। फिर महाराणा और डूंगरपुर एवं प्रतापगढ़ के स्वामी भी अपने- अपने स्थानों को लौट गये। महारावत गोपालसिंह का वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) के लगभग देहांत हुआ³। उसके ग्यारह राणियां थीं, जिनसे चार कुंवर— [महारावत का देहांत और] बख़्तावरसिंह, सालिमसिंह, रत्नसिंह और जैत- [राणियां आदि] सिंह—एवं सूरजकुंवरी तथा एजनकुंवरी नामक दो कुंवरियां हुईं⁴। (१) ठा० चतुरसिंह; चतुरकुल चरित्र; द्वितीय भाग, पृ० १३२। (२) देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; पांचवी जिल्द; प्रथम खंड, पृ० ३१६। (३) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में तथा कुछ दूसरे स्थलों पर वि० सं० १८१४ (ई० स० १७५७) में उक्त महारावत का देहांत होना लिखा है और एक स्थान पर उसकी मृत्यु उसी वर्ष श्रावण वदि १४ (ता० १५ जुलाई) को दी है, जो ठीक नहीं है; क्योंकि उक्त महारावत के उत्तराधिकारी सालिमसिंह की एक सनद वि० सं० १८१३ माघ सुदि १ (ई० स० १७५७ ता० २० जनवरी) की कल्याणपुरा के ठाकुर फ़तहसिंह के छोटे पुत्र दौलतसिंह के नाम देवद और कराड्या गांव जागीर में देने की विद्यमान है। ऐसी अवस्था में उक्त महारावत का वि० सं० १८१४ में देहांत होने का कथन नितान्त असङ्गत है। प्रतापगढ़ से प्राप्त शिलालेखों आदि की सूची में उक्त महारावत का अन्तिम लेख वि० सं० १८१२ वैशाख वदि ३ (ई० स० १७५५ ता० ३० मार्च) का दिया है, अतएव महारावत गोपालसिंह का देहांत वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) में मानना पड़ेगा। (४) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ७-८। प्रतापगढ़ राज्य की एक ३१
२४२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उस (गोपालसिंह) के समय के वि० सं० १७७८ से १८१२ (ई० स० महारावत के समय के १७२१ से १७५५) तक के शिलालेख और दानपत्र शिलालेख और दानपत्र आदि मिले हैं, जिनमें से निम्नलिखित इतिहास के लिए उपयोगी हैं— (१) वि० सं० १७७८ आषाढ सुदि १३ (ई० स० १७२१ ता० २६ जून) का वसाड़ गांव के पटेल लाभा दवेचा नरसिंहदास के नाम का आज्ञापत्र, जिसमें दवे गोरधन को अडाण (कुआं) ज़मीन बीघा ८ देने का उल्लेख है। इसमें महारावत गोपालसिंह को 'महाराजा', और 'रावतजी- श्री' लिखा है एवं यह सनद दुए शाह चंद्रभाण होने का उल्लेख है। इस- पर जो छाप लगी हुई है उसमें 'श्रीमहारावत श्रीगोपालसिंहजी दुए शाह चंद्रभाणजी' लेख अंकित है, जिससे पाया जाता है कि हूंवड़ जाति का महाजन चंद्रभाण उक्त महारावत का मंत्री था। (२) वि० सं० १७७८ श्रावण सुदि १३ (ई० स० १७२१ ता० २५ जुलाई) का सेखड़ी गांव का गुंसाईं गंगागिरि के नाम का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत पृथ्वीसिंह-द्वारा वि० सं० १७७३ ज्येष्ठ सुदि १५ (ई० स० १७१६ ता० २५ मई) को दिये हुए नाथूखेड़ी गांव के एवज़ में उसको गोपालसिंह का उदयपुर की यात्रा के समय उक्त गांव प्रदान करने का उल्लेख है¹। (३) वि० सं० १७७६ वैशाख सुदि २ (ई० स० १७२२ ता० ६ अप्रेल) का भट्टावर के नाम गांव अचलेसर में अट्ठारह बीघा खेत देने का आज्ञापत्र। इसमें उक्त महारावत को श्रीमंत महाराजाधिराज महारावत और दुए शाह चंद्रभाण लिखा है तथा विद्या शिरोमणि-द्वारा यह आज्ञापत्र लिखे जाने का उल्लेख है। पुरानी ख्यात (पृ० ११-१२) में महारावत की रानियों की संख्या १० दी है और बख़्तावरसिंह को चतुर्थ पुत्र लिखा है। उसमें कुंवरियों के नाम नहीं दिये हैं। उसमें दिये हुए कुछ रानियों के नाम और पितृकुल भी भिन्न हैं। (१) देखो ऊपर पृ० २१८, टिप्पण संख्या १।
महारावत गोपालसिंह. २४३ ( ४ ) वि० सं० १७८१ आषाढ वदि १० ( ई० स० १७२४ ता० ५ जून ) का शाह चंद्रभाण के नाम का आज्ञापत्र जिसमें उसको डोराणु गांव जागीर में देने का उल्लेख है। इस सनद में लेखक का नाम पंचोली ईसरदास दिया है और उक्त महारावत की उपाधि 'महाराजा रावत' लिखी है। ( ५ ) वि० सं० १७८३ आषाढ सुदि १३ ( ई० स० १७२६ ता० १ जुलाई ) का नाथद्वारे में श्रीनाथजी के मंदिर को गांव धनेसरी भेंट करने का ताम्रपत्र, जिसमें उक्त महारावत का विवाह के लिए घाणेराव जाते समय उपर्युक्त गांव श्रीनाथजी को भेंट करने का उल्लेख है । इसमें दुए शाह चंद्रभाण तथा लेखक का नाम विद्याशिरोमणि राय दिया है और अंत में धनेसरी गांव के बदले में गांव जेठ्याखेड़ी चढ़ाने का उल्लेख होकर ये पंक्तियां शाह चंद्रभाण और सुंदर-द्वारा लिखी जाने का भी उल्लेख है। ( ६ ) वि० सं० १७८३ भाद्रपद सुदि १३ ( ई० स० १७२६ ता० २८ अगस्त ) की दुबे गोरधन, लख्मेश्वर तथा बंसीधर के नाम की सनद, जिसमें महारावत हरिसिंह के समय का दान किया हुआ टीकर्या गांव एवं देवलिया के घर, बारा आदि, जो दुबे जगन्नाथ जगनेश्वर के भाग के थे, देने का उल्लेख है। इस सनद में मुद्रा लगी हुई है, जिसमें बादशाह मुहम्मदशाह का नाम है और यह सनद दुए शाह चंद्रभाण होने का उल्लेख है। ( ७ ) वि० सं० १७८८ माघ सुदि ६ ( ई० स० १७३२ ता० २१ जनवरी ) शुक्रवार की देवलिया में लगी हुई ताबूतों की बावड़ी की प्रशस्ति, जिसमें महारावत गोपालसिंह और कुंवर सालिमसिंह के राज्यकाल में उसके महा- मन्त्री शाह चंद्रभाण का दस सहस्र रुपये लगाकर उक्त बावड़ी और वाटिका बनाने का उल्लेख है। इस प्रशस्ति में उपर्युक्त चंद्रभाण के पूर्वजों की नामा- वली के अतिरिक्त उसके पुत्र सुंदर और लक्ष्मीचंद के भी नाम दिये हैं। ( ८ ) वि० सं० १७९६ ज्येष्ठ वदि ३ ( ई० स० १७३६ ता० १४ मई ) का दसूं दी ( भाट ) कान्हा के नाम का वरखेड़ी गांव का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत गोपालसिंह का दसूं दी कान्हा को लाख पसाव में वरखेड़ी गांव
२४४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
और लखणा की लागत देने का उल्लेख है। इस ताम्रपत्र में लेखक का नाम मेहता गोविंद दिया है। ( ९ ) वि० सं० १७९९ आश्विन वदि ३ ( ई० स० १७४२ ता० ६ सितंबर) की पाडलिया लसाण के नाम की सनद, जिसमें चाकरी में उसको गांव थड़ा देने का उल्लेख है। ( १० ) वि० सं० १८०६ माघ वदि ३० ( ई० स० १७५० ता० २६ जनवरी) शुक्रवार की व्यास हरिराम के नाम की सनद, जिसमें नीनोर गांव में बीस बीघा भूमि महोदय अमावस्या के अवसर पर गौतमेश्वर में मंदाकिनी के तट पर दान करने का उल्लेख है। इस सनद में उपर्युक्त अमा- वास्या पर महारावत का दश महादान भी करने का उल्लेख है। यह सनद दोसी रूपजी के हुए होने का उल्लेख है और इसके लेखक का नाम अस्पष्ट है। इसमें महारावत को 'महाराजाधिराज महारावत' लिखा है। ( ११ ) वि० सं० १८१० आश्विन सुदि ७ ( ई० स० १७५३ ता० ३ अक्टोबर) का प्रतापगढ़ में केशवरायजी के मंदिर के पास लगा हुआ शिलालेख, जिसमें वहां के निवासी बोहरों पर भविष्य में किसी प्रकार की सख्ती न होने का उल्लेख है। इस शिलालेख में महारावत को 'महाराज- रावत' लिखा है। ( १२ ) वि० सं० १८११ भाद्रपद वदि ८ ( ई० स० १७५४ ता० ११ अगस्त) का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत का अपने कुंवर सालिमसिंह के साथ नाथद्वारे जाकर वहां के गोस्वामी गोवर्धन की गद्दीनशीनी पर गोवर्धनपुर नामक गांव भेंट करने का उल्लेख है। ( १३ ) वि० सं० १८११ मार्गशीर्ष वदि ५ ( ई० स० १७५४ ता० ५ नवंबर) की शाह कपूरचंद पाडलिया के नाम की सनद, जिसमें उसको राज्य- सेवा सौंपने एवं गांव मोहेड़ा तथा गांव देवासला का खिराज हाथ खर्च के लिए दिये जाने तथा आज्ञानुसार राज्य-सेवा करते रहने का उल्लेख है। महारावत गोपालसिंह वीर, नीतिकुशल और धर्मपरायण शासक था। वह अपने पूर्वजों के समान ही परमार्थ के कार्यों में रुचि रखता था।
इस चित्र में कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है; यह पृष्ठ पूर्णतः रिक्त (blank) है।
महारावत सालिमसिंह
महारावत सालिमसिंह २४५ महारावत का व्यक्तित्व उसका अपने राज्य की उन्नति की तरफ़ पूरा ध्यान था। व्यापार की वृद्धि के लिए वह बाहर से व्यापा- रियों को बुलवाकर अपने राज्य में आबाद करता और उनपर किसी प्रकार का अत्याचार न हो, इसका सदैव ध्यान रखता था । प्रजा पर भविष्य में अत्याचार न हो, इस दृष्टि से उसने शिलालेख लगवा दिये थे। वह समय की गति के अनुसार आचरण करता था। उसने उस समय के प्रबल राजनीतिज्ञ, महाराष्ट्र के कर्णधार पेशवा बाजीराव की प्रीति सम्पादन की, जिसका परिणाम यह हुआ कि मालवे में चारों तरफ़ मरहटों का उपद्रव होने पर भी उसका राज्य, जो मालवे से मिला हुआ था, क्षति से बचा रहा। पेशवा उसका बड़ा सम्मान करता और उसकी बात मानता था। आपत्तिकाल में महारावत अपने मित्रों की सहायता करना अपना परम कर्त्तव्य समझता था। उसने डूंगरपुर पर महाराणा और पेशवा के आक्रमणों के समय समझौते का प्रयत्न किया तथा बीकानेर पर जोध- पुर के महाराजा की चढ़ाई के समय, जब महाराणा अपनी सेना के साथ जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह की सैन्य-योजना को सफल बनाने के लिए गया, वह भी अपनी सेना के साथ जाकर उसके शामिल हुआ। वह दानी राजा था। उसने कई गांव आदि दान में दिये थे। उसने अपने नाम पर प्रतापगढ़ में गोपालगंज नामक मोहल्ला आबाद किया एवं देवलिया में एक महल भी बनवाया, जिसको गोपाल-महल कहते हैं। सालिमसिंह महारावत गोपालसिंह का परलोकवास होने पर उसका कुंवर राज्य-प्राप्ति सालिमसिंह वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) के लगभग अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ। इसके कुछ वर्ष बाद ही वह (सालिमसिंह) दिल्ली गया और तत्कालीन बादशाह शाहआलम से मिला, जिसने उसे चंवर आदि राज-
२४६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत का दिल्ली जाकर बादशाह से सम्मान प्राप्त करना चिह्न, ज़री का निशान और नक़ारा रखने का सम्मान तथा प्रतापगढ़ में टकसाल खोलकर नवीन सिक्का, जो 'सालिमशाही' कहलाता है, बनाने का हक़ प्रदान किया । दिल्ली से लौटते हुए महारावत ने उदयपुर जाकर वहां के तत्कालीन महाराणा राजसिंह (दूसरा) से भेंट की । उस समय तक प्रतापगढ़ राज्य मरहटों के आक्रमणों से अछूता रहा था और वह चौथ आदि से मुक्त था। पेशवा के तीन प्रमुख सेनापति तुकोजी का देवलिया पर घेरा डालना सिंधिया, होल्कर और पंवार के बीच मालवे के परगनों का विभाग होकर प्रतापगढ़ राज्य की चौथ होल्कर के हिस्से में रखी गई। अतएव चौथ की वसूली के लिए मल्हारराव होल्कर की तरफ़ से उसके सेनापति तुकोजी ने ससैन्य प्रतापगढ़ पर चढ़ाई कर वि० सं० १८१८ (ई० स० १७६१) में उसे चारों तरफ़ से घेर लिया, किंतु महारावत की कुशलता से होल्कर के सेनापति को सफलता नहीं मिली। इसी बीच रामपुरा पर अधिकार करने के लिए मल्हारराव होल्कर और उदयपुर राज्य के बीच संघर्ष छिड़ गया तथा उदयपुर के महाराणा की सेना होल्कर के मुक़ाबले के लिए अमरदास चीडक (चंडक, माहेश्वरी वैश्य) की अध्यक्षता में जावद में एकत्रित हुई १। फलतः उस समय होल्कर की सेना को वहां से अपना घेरा उठाना पड़ा। दो वर्ष पीछे जब मल्हारराव होल्कर वि० सं० १८२० (ई० स० १७६३) में उदयपुर की तरफ़ सेना लेकर बढ़ा, तब उसने प्रतापगढ़ पर घेरा डालकर वहां से कुछ धन वसूल किया २। (१) कान्होड़ के रावत जगतसिंह के नाम उदयपुर राज्य के मंत्री सदाराम देपुरा (माहेश्वरी वैश्य) का वि० सं० १८१८ फाल्गुन सुदि ८ (ई० स० १७६२ ता० ३ मार्च) का पत्र। (२) प्रतापगढ़ राज्य से मरहटों (होल्कर) को खिराज किस वर्ष से मिलना आरंभ हुआ, इसका विवरण प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों और मरहटा-काल के इतिहासों से नहीं पाया जाता। इसलिए इस विषय में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा
महारावत सालिमसिंह २४७ महाराणा जगतसिंह (दूसरा) वि० सं० १८०८ (ई० स० १७५१) में परलोक सिधारा और उसके पीछे उसका कुंअर प्रतापसिंह (दूसरा) [महाराणा अरिसिंह की] उदयपुर राज्य का स्वामी हुआ, जिसकी थोड़े समय [सहायतार्थ महारावत का] बाद ही वि० सं० १८१० (ई० स० १७५४) में मृत्यु [सेना भेजना] हुई। तदनन्तर उस (प्रतापसिंह) का पुत्र राजसिंह (दूसरा) दस वर्ष की आयु में महाराणा हुआ, परन्तु वि० सं० १८१७ चैत्र वदि १३ (ई० स० १७६१ ता० ३ अप्रेल) को वह भी निःसंतान काल-कवलित हो गया। इसपर राज-महिषियों की आज्ञा से उस (राज- सिंह) का चाचा अरिसिंह, जो जगतसिंह का छोटा पुत्र और प्रतापसिंह का भाई था, मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया गया। अरिसिंह आतुर और क्रोधी स्वभाव का था, अतएव गद्दीनशीनी के थोड़े दिनों बाद ही ऐसी घटना घटी, जिससे सरदारों आदि का उससे मनोमालिन्य हो गया और वहां विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हो गई। राज्य के अधिकांश बड़े-बड़े सरदारों ने अरि- सिंह को राज्यच्युत् करने के लिए राजगद्दी के दूसरे दावेदार रत्नसिंह का, जो राजसिंह की मृत्यु के पीछे उस (राजसिंह) की झाली राणी से उत्पन्न · हुआ था, पक्ष लिया। उन्होंने गुप्त रूप से उस शिशु राजकुमार को उदयपुर से निकालकर उसके नाना गोगूंड़े के स्वामी झाला जसवन्तसिंह के पास पहुंचाया १। महाराणा इस घटना से बड़ा नाराज़ हुआ और उसने सरदारों का दमन करना स्थिर कर संदेह ही संदेह में अपने पितृव्य बागोर के महाराज नाथसिंह को मरवा डाला और उसके कुछ समय बाद राज्य के सच्चे हितैषी सलूंवर के रावत जोधसिंह का भी प्राण हरण किया, जिससे कुछ सरदारों को छोड़कर कई बड़े-बड़े सरदार प्रत्यक्ष रूप से रत्नसिंह के पक्ष में मिल गये और कुछ तटस्थ रहकर तत्समयक स्थिति को देखने लगे। फिर वि० सं० १८२२ (ई० स० १७६५) में विद्रोही सरदारों ने शिशु रत्नसिंह जा सकता। महारावत गोपालसिंह की पेशवाओं से मित्रता थी, अतएव उसकी मृत्यु के बाद अर्थात् उक्त समय के आस-पास ही होल्कर के साथ वहां का खिराज स्थिर हुआ होगा। (१) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६४८।
२४८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को कुंभलगढ़ ले जाकर उसको मेवाड़ का महाराणा घोषित किया और तटस्थ एवं अरिसिंह के पक्षपाती सरदारों को भी वे लोभ देकर अपनी तरफ़ मिलाने लगे । उधर अरिसिंह ने भी भेद-नीति का आश्रय लेकर कई बड़े-बड़े सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया । विद्रोही सरदारों ने नागों (साधुओं) आदि को नौकर रखकर चारों तरफ़ लूट-मार आरम्भ की और मेवाड़ में कई स्थानों पर अपना अधिकार जमा लिया, पर शीघ्र ही अरिसिंह ने अपने सहायक सरदारों एवं वैतनिक सिन्धी सेना की सहायता से किसी क़दर उनका दख़ल उठा दिया¹ । मेवाड़ के इस गृह-कलह को बढ़ाने में जोधपुर के महाराजा विजयसिंह का भी हाथ था । जोधपुर राज्य की ख्यात में लिखा है कि अरिसिंह की तरफ़ से उक्त महाराजा के पास वकील पहुंचने पर उस(विजयसिंह) ने सेना-व्यय देने के इक़रार करने पर सिंघवी फ़तेचंद और भीमराज को अपनी सेना देकर रवाना किया और उनके साथ नागोर की फ़ौज भी भेज दी, जिसने जाकर भांडेसर (जोधपुर राज्य) में अपना मुक़ाम डाला। वहां कुंभलगढ़ से रत्नसिंह के वकील पहुंचे और उन्होंने कहा कि जितना रुपया अरिसिंह देगा उतना हम लोग दे देंगे, तुम उसकी मदद मत करो । फिर रत्नसिंह की तरफ़ से रुपये मिलने पर वह सेना हटा दी गई और सिंघवी फ़तेचंद तथा भीमराज दोनों जोधपुर चले गये । रत्नसिंह की तरफ़ से खींवसर के ठाकुर जोरावरसिंह के पास भी सहायता देने के लिए रक़म भेजी गई, जिससे वह अपने राजपूतों के साथ रत्नसिंह के शामिल हो गया । उसको दो वर्ष तक तो वह तनख़्वाह देता रहा और उसके बाद सेरा (सायरा) का परगना देना स्थिर हुआ² । संयोग से सात वर्ष की आयु होने पर शीतला रोग से रत्नसिंह का देहांत हो गया³ । उस समय उसके पक्षपाती सरदारों को विश्वास दिलाने (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५५२। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५१ । (२) जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० ३, पृ० ५७ । (३) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५४ ।
महारावत सालिमसिंह २४६ पर बेदला का राव रामचंद्र, भींडर का महाराज मुहकमसिंह ( शक्तावत ) आदि सरदार और अमरदास देपुरा महाराणा के पास उपस्थित हो गये१; किंतु इससे बचे हुए रत्नसिंह के पक्षपाती सरदारों का साहस कम न हुआ और उन्होंने शिशु रत्नसिंह के स्थान में एक कृत्रिम लड़के को खड़ा कर उपद्रव ज्यों का त्यों जारी रक्खा। उन दिनों कोटा से झाला ज़ालिमसिंह भी जाकर महाराणा के शामिल हो गया। उस समय अरिसिंह का विरोधियों की अपेक्षा बल बढ़ गया था, इसलिए देवगढ़ के रावत जसवंतसिंह और उसके पुत्र राघवदेव ने माधवराव सिंधिया को उदयपुर पर अधिकार हो जाने पर सवा करोड़ रुपया देने का इक़रार कर अपना सहायक बना लिया। उधर महाराणा ने माधवराव के प्रतिद्वंद्वी बेहरजी ताकपीर और पंडित राघवराम के द्वारा पेशवा से बातचीत कर उन दोनों को अपनी तरफ़ मिला विपक्षियों का मूलोच्छेद हो जाने पर बीस लाख रुपया देना तय किया२। महाराणा अरिसिंह ने सलूंबर के रावत पहाड़- सिंह, देलवाड़ा के राज झाला राघवदेव और शाहपुरा के राजा उम्मेदसिंह को माधवराव सिंधिया के पास भेज रत्नसिंह का पक्ष छोड़ देने को कह- लाया३; किंतु लोभी माधवराव ने रत्नसिंह का पक्ष छोड़ना स्वीकार न ( १ ) महाराणा अरिसिंह का कानोड़ के रावत जगतसिंह के नाम का वि० सं० १८२५ श्रावण वदि ८ ( ई० स० १७६८ ता० ७ जुलाई ) गुरुवार का ख़ास रुक्का। कानोड़ के रावत जगतसिंह के नाम बेदला के राव रामचन्द्र, सलूंबर के रावत पहाड़- सिंह, देलवाड़ा के राज झाला राघवदेव और भींडर के महाराज मुहकमसिंह का वि० सं० १८२५ श्रावण वदि ८ ( ई० स० १७६८ ता० ७ जुलाई ) का पत्र। अमरदास देपुरा का कानोड़ के रावत जगतसिंह के नाम का वि० सं० १८२५ श्रावण वदि ६ ( ई० स० १७६८ ता० ८ जुलाई ) का पत्र। ( २ ) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६४१। यह इक़रार- नामा वि० सं० १८२५ भाद्रपद सुदि.१५ ( ई० स० १७६८ ता० २५ सितम्बर ) को हुआ था। ( ३ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५४५। सलूंबर के रावत पहाड़सिंह, देलवाड़ा के राज राघवदेव और शाहपुरा के राजा उम्मेदसिंह का महाराणा अरिसिंह के ३२
२५० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किया। इसके बाद अरिसिंह ने कुछ लोगों के बहकाने पर झाला राघवदेव को भी रत्नसिंह से मिला हुआ होने के संदेह में मरवा डाला१ । इससे जो सरदार महाराणा के पास उपस्थित हो गये थे, वे भी पीछा विपक्षियों से जा मिले। इस अवसर पर रघुजी पायगिया और दौला मियां भी, अपनी- अपनी सेनाओं के साथ अरिसिंह से जा मिले और जब महाराणा ने उनके बल पर विरोधियों पर अधिक दबाव डाला, तब माधवराव ने भी उदयपुर की तरफ़ प्रयाण करना निश्चय कर लिया । इसपर अरिसिंह ने माधवराव के मेवाड़ में पहुंचने के पूर्व ही अपनी सेना उज्जैन भेजकर वहीं उस(माधवराव) से युद्ध करने की योजना बनाई और वि० सं० १८२५ (ई० स० १७६८) के शीतकाल में अपनी बीस हज़ार सेना उज्जैन रवाना की। पौष सुदि ६ (ई० स० १७६६ ता० १३ जनवरी) को क्षिप्रा के तट पर माधवराव की सेना से महाराणा की सेना का मुक़ाबला हुआ। तीन दिन तक बराबर युद्ध होता रहा। मेवाड़ी सेना ने वीरतापूर्वक युद्ध कर शत्रु सैन्य को हटा दिया और विजयोन्मत्त हो नगर में लूटमार आरंभ की। इतने में ही जयपुर से देवगढ़ के रावत जसवंतसिंह की भेजी हुई पंद्रह हज़ार नांगों, की सेना ने जाकर अरिसिंह की सेना पर धावा बोल दिया, जिससे उसमें भगदड़ मच गई । फिर भी महाराणा के सरदारों, रघुजी पायगिया तथा दौला मियां ने शत्रु पक्ष का वीरता से मुक़ाबला किया। अंत में सलूंबर के रावत पहाड़सिंह, शाहपुरा के राजा उम्मेदसिंह, बनेड़ा के राजा रायसिंह, रघुजी पायगिया, दौला मियां आदि कई सरदारों के मारे जाने और झाला ज़ालिमसिंह, रावत मानसिंह तथा मेहता अगरचंद के घायल होकर युद्धक्षेत्र में गिर जाने पर अरिसिंह की सेना भाग गई । शत्रुओं ने झाला ज़ालिमसिंह, रावत मानसिंह और नाम का वि० सं० १८२१ आश्विन वदि १४ (ई० स० १७६८ ता० ६ अक्टूबर) का प्रार्थनापत्र । (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १४५५ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५१ ।
महारावत सालिमसिंह २५१ मेहता अगरचंद को क़ैद कर दिया१। तोपों और बंदूकों के सामने खड़े होकर तलवारों और बरछियों से वीरता दिखलाने का मेवाड़ी राजपूतों का यह अन्तिम युद्ध था। इसके बाद पारस्परिक संघर्ष से उनकी स्थिति ऐसी हो गई कि वे फिर न संभल सके। उज्जैन के युद्ध में माधवराव ने महाराणा की सेना को परास्त कर वहीं से अपने लश्कर को उदयपुर की तरफ़ मोड़ा और शीघ्र ही उदयपुर को घेर लिया। उज्जैन के युद्ध में महाराणा की बहुत सी सेना का नाश हो गया था, फिर भी उसके पास सेना की कमी नहीं थी। वैतनिक सिंधी सेना के अतिरिक्त उसके पास बहुत से लड़ मरनेवाले स्वामिभक्त राजपूत विद्यमान थे, जिनके बल पर उसने उदयपुर नगर की चारों ओर से मोर्चाबंदी कर उसकी रक्षा का यथेष्ट प्रबंध कर लिया। छः महीने के लगभग महाराणा के सरदारों ने सिंधिया का मुक़ाबला किया। जब उदयपुर पर अधिकार करने में सिंधिया को सफलता न मिली, तब उसने साढ़े तिरसठ लाख रुपये सैन्य-व्यय के महाराणा से लेना तय कर उदयपुर से घेरा उठाना और रत्नसिंह का साथ छोड़ना स्वीकार किया। फलतः ज़ेवर, नक़द आदि मिलाकर साढ़े तैंतीस लाख रुपये तो उस समय पूरे कर दिये गये और बाकी रक़म के एवज़ में जावद, जीरण, नीमच, मोरवण आदि मेवाड़ के ज़िले, जबतक रुपये अदा न हों तबतक के लिए, सिंधिया को सौंप दिये गये२। इसके बाद कुछ और सरदार विद्रोहियों का साथ छोड़कर महा- राणा से जा मिले, जिससे कृत्रिम रत्नसिंह की ताक़त घट गई; फिर भी उसके पक्षपातियों ने उपद्रव में कमी न आने दी और वि० सं० १८२६ (ई० स० १७७०) में टोपला गांव के पास तथा वि० सं० १८२८ (ई० स० १७७१) ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १४५५-८ । मेरा उदयपुर राज्य का इति- हास; जि० २, पृ० ६५२-३ । ( २ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग; पृ० १४६०-६६ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५४-७ ।
२५२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास में गंगराड़ में उनका महाराणा की सेना से मुक़ाबला हुआ, जिसमें उनकी हार हुई और उनका बल टूट गया¹। तदनन्तर महाराणा ने विद्रोहियों के अधिकृत क़िलों पर अधिकार जमाना शुरू किया और चित्तोड़ पर भी अधिकार कर लिया²। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि मेवाड़ के इस गृह- कलह के समय महाराणा अरिसिंह की तरफ़ से आदेश पाते ही महारावत सालिमसिंह ने अपनी सेना भेज दी थी, जिसने युद्ध के प्रत्येक अवसर पर शत्रु-सैन्य से धीरतापूर्वक युद्ध किया था; किंतु इसका मेवाड़ के इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। इतिहास के संरक्षण का अनुराग न होने से उस समय का क्रम-बद्ध वृत्तांत मिलना असंभव है। इसलिए प्रतापगढ़ के राजपूतों ने इस अवसर पर कब-कब और कहां-कहां युद्ध में भाग लिया इसपर अधिक प्रकाश नहीं डाला जा सकता। फिर भी यह कहा जा सकता है कि महारावत सालिमसिंह के पास उस समय मेवाड़ राज्य की तरफ़ से दिया हुआ धरियावद का परगना विद्यमान था, जिसके कारण युद्ध के अवसर पर उसका महाराणा के पास अपनी सेना भेजना असंभव नहीं है। इसकी पुष्टि महाराणा अरिसिंह के वि० सं० १८२८ फाल्गुन वदि ६ (ई० स० १७७२ ता० २७ फरवरी) गुरुवार के महारावत सालिमसिंह के नाम के परवाने से भी होती है, जिसमें बादशाह फ़र्रुखसियर-द्वारा महारावत पृथ्वी- सिंह को 'रावत राव' की उपाधि मिलने का उल्लेख है³। उपर्युक्त परवाने से स्पष्ट है कि मेवाड़ के इस गृहकलह में महारावत सालिमसिंह, महाराणा अरिसिंह का सहायक था, इसी कारण से उसकी दी हुई सहायता के पुरस्कार में उक्त महाराणा ने उसके नाम यह परवाना भेज, महारावत का (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५६६। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५८। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५७०-७१। मेरा उदयपुर राज्य का इति- हास; जि० २, पृ० ६५६। (३) देखो ऊपर पृ० २२४-५, टिप्पण संख्या १।
महारावत सालिमसिंह २५३ सम्मान बढ़ाया । “वीरविनोद” के लेखक महामहोपाध्याय कविराजा श्या- मलदास ने इस विषय को अधिक स्पष्ट करने के लिए अपने बृहद् ग्रंथ में प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के प्रसङ्ग में निम्नलिखित उल्लेख किया है— “जब माधवराव सिंधिया ने उदयपुर को विक्रमी १८२५ ( हि० स० ११८२ = ई० स० १७६८ ) में जा घेरा, तब रावत सालिमसिंह भी अपनी सेना लेकर महाराणा अरिसिंह के पास गये और घेरा उठने के बाद तक मददगार रहे। इस खैरख्वाही के एवज़ में इनको महाराणा अरिसिंह ने धरियावद का परगना जागीर में दे दिया और 'रावत राव' का ख़िताब भी, जो बादशाह ने दिया था, इनके नाम पर बहाल रक्खा¹ ।” उपर्युक्त कथन से प्रत्यक्ष है कि मेवाड़ के गृहकलह के समय प्रतापगढ़ राज्य से केवल सेना ही नहीं, प्रत्युत् महारावत सालिमसिंह भी स्वयं उदयपुर के सिंधिया-द्वारा घेरे जाने पर महाराणा अरिसिंह की सहायतार्थ गया था और युद्ध के अवसर पर उसने वीरता प्रदर्शित की थी। संभव है कि उस समय के भी इतिहास के साधन पूरे न मिलने से “भीमविलास” के लेखक कवि कृष्ण अहाड़ा और कर्नल टॉड ने महारावत की सहायता का उल्लेख छोड़ दिया हो । महारावत सालिमसिंह का वि० सं० १८३१ कार्तिक वदि ७ ( ई० स० १७७४ ता० २६ अक्टोबर ) को देहांत होना पाया जाता है । महारावत का देहांत और उसके ग्यारह राणियां थीं², जिनमें से एक उसकी राणियां आदि कुन्दनकुंवरी आमझरा³ के राव लालसिंह की पुत्री और जसरूपसिंह की पौत्री थी । उक्त राणी के ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग; पृ० १०६४ । प्रतापगढ़ राज्य की कुछ ख्यातों में भी धरियावद का परगना मेवाड़ के गृहकलह के समय महारावत सालिमसिंह-द्वारा महाराणा अरिसिंह को सहायता देने के एवज़ में मिलने का उल्लेख है, परन्तु हमारे अनु- मान से धरियावद का परगना महारावत गोपालसिंह के समय मिला था । इस विषय के विस्तृत विवेचन के लिए देखो ऊपर पृ० २२४, टिप्पण संख्या १ तथा पृ० २४२ । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ८-६ । ( ३ ) आमझरा, दक्षिणी मालवे में गुजरात की सीमा से मिला हुआ वर्तमान
२५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
उधर से कुंवर सामन्तसिंह का जन्म हुआ । महारावत के अन्य कुंवर रोड़सिंह, विजयसिंह, गजसिंह, महतावसिंह, लालसिंह तथा मयाकुंवरी और रूपकुंवरी नामक दो कन्याएं हुई थीं। उनमें से रोड़सिंह से महतावसिंह तक के चारों कुंवर बाल्य-काल में ही मृत्यु' को प्राप्त हुए और सामन्तसिंह तथा लालसिंह' उस (सालिमसिंह) की मृत्यु के पीछे विद्यमान थे । उस (सालिमसिंह) के समय के निम्नलिखित शिलालेख और ताम्रपत्र मिले हैं- ( १ ) वि० सं० १८१३ माघ सुदि १ ( ई० [महारावत के समय के] [शिलालेख, दानपत्र आदि] स० १७५७ ता० २० जनवरी ) की देवद और करा- इ़ठा गांव की कुंवर दौलतसिंह ( कल्याणपुरा ) के नाम की सनद, जिसमें सेवा के एवज़ देवद और कराइ़ठा गांव प्रदान करने और बदले में एक हज़ार रुपये वार्षिक खिराज जमा कराने का उल्लेख है । ( २ ) वि० सं० १८१४ भाद्रपद सुदि १२ ( ई० स० १७५७ ता० २६ अगस्त ) का व्यास हरिराम, खीमराम, नाथूराम और भवानीशंकर के नाम का ३० बीघा ज़मीन का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत का उपर्युक्त व्यक्तियों को नीनोर गांव में ज़मीन देने का उल्लेख है । ( ३ ) वि० सं० १८१५ श्रावण सुदि १ ( ई० स० १७५८ ता० ४ अग- स्त ) की शाह सुंदर के नाम की सनद, जिसमें उसकी जागीर और मान-
झाबुआ राज्य के निकट एक राठोड़ राज्य था, जहां के स्वामी जोधपुर राज्य के स्वामी मालदेव के ज्येष्ठ पुत्र राम के वंशधर थे । मुग़ल साम्राज्य की अवनति के समय आम- झरा मरहटा-युद्ध का केन्द्र रहा और वहीं पर मालवा की रक्षार्थ मरहटी सेना से युद्ध करते हुए मालवा के सूबेदार राजा गिरधरबहादुर और दयाबहादुर मारे गये थे । तद- नन्तर उक्त राज्य सिंधिया का खिराजगुज़ार रहा और वि० सं० १६१४ ( ई० स० १८५७ ) के सिपाही विद्रोह में वहां का स्वामी बख़्तावरसिंह बाग़ी दल से मिल गया । इसपर अंग्रेज़ सरकार ने उसको गिरफ़्तार कर इंदौर में फांसी का दंड दिया और उक्त राज्य ज़ब्त कर सिंधिया ( ग्वालियर राज्य ) को दे दिया । ( १ ) लालसिंह के वंशज अरण्योद के स्वामी हैं ।