राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
२२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास चालों से वह कागज़ का रही टुकड़ा ही रही। स्वार्थपरता और पारस्परिक वैमनस्य से जयपुर और जोधपुर के नरेश शीघ्र ही उपर्युक्त संधि से पराङ्- मुख हो गये एवं एक दूसरे का विनाश चाहने लगे। उदयपुर का महाराणा उनके पारस्परिक वैमनस्य को मिटाने का प्रयत्न करता था, पर वह बढ़ता ही गया। इससे कहा जा सकता है कि राजपूताना के राज्यों में उस समय कोई राजा नेतृत्व के योग्य नहीं था। इसका परिणाम यह हुआ कि आपसी द्वेष से राजपूताना के राज्यों की दशा हीन हो गई। इस अशांतिमय वातावरण में छोटे-छोटे राज्यों का अस्तित्व लुप्त होने की पूरी संभावना थी। अस्तु, संगठन-शक्ति की भावना छोटे-छोटे महारावत को धरियावद राज्यों में भी जागृत होकर वे बड़े राज्यों का सहारा का परगना मिलना ढूंढने लगे। उदयपुर राज्य, प्रतापगढ़ राज्य के समीप होने एवं वहां के राजाओं के एक ही वंश के होने के कारण उनमें कभी मेल और कभी-कभी वैमनस्य भी हो जाता था; किंतु आपत्तिकाल के समय देवलिया राज्य, उदयपुर राज्य को सहायता देकर अपने कर्त्तव्य का पालन करता था। इसके एवज़ में वहां के रावत को धरियावद की जागीर मिली थी, जो महारावत हरिसिंह के समय जाती रही। ऊपर बतलाया जा चुका है कि महारावत पृथ्वीसिंह ने उदयपुर राज्य से पुनः अपना राजनैतिक संबंध जोड़ा था और धरियावद का परगना पीछा मिलने की बात स्थिर हो गई थी, परंतु उक्त महारावत और उसके कुंवर का देहांत हो जाने एवं वहां उसके दो उत्तराधिकारियों के थोड़े समय तक ही राज्य करने से धरियावद का परगना नहीं मिल सका था। महारावत गोपालसिंह ने राज्यासन पर बैठते ही पुनः धरियावद का परगना प्राप्त करने के लिए प्रयत्न आरंभ किया और अपने कुंवर सालिमसिंह को उदयपुर भेजा¹। इसी प्रकार उसने पेशवा बाजीराव का अभ्युदय देख उससे दुःखदायी परिणाम भोगना पड़ा, जिसका हम उदयपुर राज्य के इतिहास में विस्तृत रूप से उल्लेख कर चुके हैं। (१) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में उपर्युक्त धरियावद का परगना
महारावत गोपालसिंह २२५ भी मित्रता कर ली', क्योंकि देवलिया राज्य मालवे से मिला हुआ होने से उसको मरहटों से भी अच्छा सम्बन्ध रखने की आवश्यकता थी। वि० सं० १७८७ (ई० स० १७३०) में डूंगरपुर के महारावल रामसिंह का देहांत होने पर उसका कुंवर शिवसिंह वहां की गद्दी पर बैठा। उस समय उदयपुर राज्य की सेना ने डूंगरपुर पहुंच वहां घेरा डाल दिया और चार लाख रुपयों आदि का रुक्का लिखवाकर वहां से लौटी²। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि महाराणा की सेना के डूंगरपुर को घेर लेने पर महारावत गोपालसिंह ने महाराणा की सेना के आदमियों से बात-चीत कर वहां का घेरा उठवाया³। इस कथन का समर्थन उदयपुर और डूंगरपुर राज्य की ख्यातों से नहीं होता, परन्तु यह संभव है कि महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) और उक्त महारावत का अच्छा संबंध होने से उसने डूंगरपुर के स्वामी शिवसिंह तथा महा- राणा के बीच संधि करवाकर वहां का घेरा उठवा दिया हो। महाराणा अरिसिंह (वि० सं० १८१७ से १८२६ = ई० स० १७६१ से १७७३) के राज्य- काल में महारावत सालिमसिंह को मेवाड़ के गृह-युद्ध के समय की गई सेवा के उपलक्ष्य में मिलने का उल्लेख है, परंतु यह बात ठीक नहीं है; क्योंकि वहां महारावत पृथ्वीसिंह को मिली हुई 'रावत-राव' की उपाधि प्रयोग में लाने की महाराणा अरिसिंह की सनद् तो दी गई, किंतु धरियावद परगने की कोई सनद नहीं दी और न धरियावद परगना मिलने का संवत् और मास दिया है। यदि वस्तुतः धरियावद का परगना सालिमसिंह को मिला होता तो उसकी सनद् अवश्य उद्धृत की जाती एवं वर्ष तथा मास भी दिया जाता। हमारा अनुमान है कि मेवाड़ में महाराणा अरिसिंह के समय होनेवाले गृह- युद्ध के कई वर्ष पूर्व धरियावद का परगना महारावत गोपालसिंह को मिल चुका था, जिसके कारण ही गोपालसिंह ने उदयपुर में विशेष रूप से आना-जाना जारी किया। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६५ । (२) वही; द्वितीय भाग, पृ० १०११ । (३) वही; द्वितीय भाग, पृ० १०६३ । २६
२२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास मालवे में होनेवाले मरहटों के आक्रमणों को शाही सेना ने रोकने का यथासाध्य प्रयत्न किया और आंबेर का स्वामी सवाई जयसिंह भी मालवे के लिए मरहटों की इस कार्य के लिए नियत किया गया, परंतु इसमें लड़ाइयां सफलता नहीं हुई और मरहटों की शक्ति बढ़ती गई। इस असफलता का मुख्य कारण शाही अफ़- सरों का पारस्परिक मनोमालिन्य, ईर्ष्या और स्वार्थ-परायणता ही थी। उस समय स्वामी-सेवक के भाव नष्ट होने लगे थे और शाही अफ़सरों में से अधिकांश विद्रोही होकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की चेष्टा में थे। ऐसी स्थिति में असफलता होना स्वाभाविक था। मालवे की भांति उन दिनों मरहटों के गुजरात में भी आक्रमण होने लगे, जिससे स्थायी शांति का होना कठिन हो गया। प्रतापगढ़ राज्य मालवा के अंतर्गत था और उसके चारों तरफ़ संघर्ष मच रहा था, तथापि वह महारावत गोपालसिंह के कुशल- शासन से अक्षुण्ण रहा। इतिहास के प्रसङ्ग को मिलाने के लिए संक्षेप में हम यहां मालवे में बादशाह मुहम्मदशाह के समय जो उलट-फेर हुए, उनका वर्णन करते हैं- फ़र्रुख़सियर की मृत्यु के पीछे सैयदों ने निज़ामुल्मुल्क को वि० सं० १७७५ फाल्गुन सुदि १२ (ई० स० १७१६ ता० २० फ़रवरी) को मालवे का सूबेदार बनाया। ई० स० १७२२ ता० ३० अगस्त (वि० सं० १७७६ भाद्रपद वदि ३०) तक वह वहां का सूबेदार रहा। फिर बादशाह मुहम्मद- शाह के समय सैयदों का दमन होने के पीछे निज़ामुल्मुल्क तो वज़ीर बनाया गया और राजा गिरधर बहादुर मालवे का सूबेदार नियत हुआ, परंतु वह पूरा एक वर्ष भी वहां न रहने पाया था कि बादशाह ने निज़ामुल्मुल्क पर ही मालवे का भार डाल दिया। निज़ामुल्मुल्क की शक्ति उस समय बहुत बढ़ गई थी, जिसको बादशाह ने भयावह जान पुनः राजा गिरधर बहादुर की वि० सं० १७८२ प्रथम आषाढ सुदि ३ (ई० स० १७२५ ता० २ जून) को मालवे के सूबे पर नियुक्ति की। राजा गिरधर बहादुर इलाहाबाद के सूबेदार छबीलेराम नागर (ब्राह्मण) का भतीजा था
महारावत गोपालसिंह २२७
और साम्राज्य-भक्त था । उसने मालवा में मरहटों का प्रभाव न बढ़ने देने के लिए स्तुत्य प्रयत्न किया और अंत में वह आमझरा में मरहटों से युद्ध करता हुआ ई० स० १७२८ ता० २६ नवंबर ( वि० सं० १७८५ मार्गशीर्ष शुदि ६) को मारा गया । उसके बाद उसका पुत्र भवानीराम मालवे का सूबेदार बनाया गया । उसने भी मरहटों को मालवा में न बढ़ने देने का उद्योग किया, किन्तु आवश्यक सहायता न मिलने से वह असफल रहा । मालवा ही नहीं अपितु गुजरात में भी मरहटों के आक्रमण होते देख वादशाह मुहम्मदशाह को बड़ी चिंता हुई । वि० सं० १७८६ ( ई० स० १७२६ ) में उसने सवाई जयसिंह को दूसरी बार मालवे का सूवेदार बनाया और सैन्य-संगठन के लिए तेरह लाख रुपयें भी दिये, परन्तु वह अपनी मेल-मिलाप की नीति से कुछ दे-दिलाकर मरहटों का वहां से कब्ज़ा उठाना चाहता था । उस समय मालवा में मरहटे मुकासा नामक कर उगाह्ते थे, इसलिए वहां से उनका यह अधिकार उठाने एवं उनके आक्रमणों को रोकने के लिए जब वह (जयसिंह) मालवे की तरफ़ आगे बढ़ा तो उसके साथ वहां के प्रायः सब राजा उपस्थित हो गये¹। फिर वह उज्जैन से मांडू की तरफ़ बढ़ा और ई० स० १७३० के जनवरी ( वि० सं० १७८६ माघ ) मास में उसने वह क़िला मरहटों से खाली करवा लिया² । महाराजा जयसिंह का विचार मरहटों से मालवा खाली करवाकर उसे अपने राज्य में मिलाने का था। इस बात को ताड़कर राजपूताना के नरेश । उस- से शंकित रहते थे, क्योंकि उन्हीं दिनों उसने बूंदी से राव बुधसिंह को हटाकर दलेलसिंह को वहां का स्वामी बना दिया था³ और रामपूरे का परगना भी चंद्रावतों ( सीसोदियों की एक शाखा ) से ज़ब्त करवाकर
( १ ) डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० १७८। मालवा में युगान्तर; पृ० २०० । सूर्यमल; वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३१३७-३८ । ( २ ) सूर्यमल; वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३१३८ । डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा में युगान्तर; पृ० २०१ । मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० १७८ । ( ३ ) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३१३२-३६ ।
महाराणा संग्रामसिंह से अपने छोटे कुंवर माधवसिंह को दिलवा दिया था १। ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६७४-५ । मालवा में रामपुरा चंद्रावत सीसोदियों का प्राचीन स्थान है । मालवे के सुलतान होशंग के समय इस ठिकाने की स्थापना हुई और बहुत समय तक इसका वहां के सुलतानों से संबंध रहा । फिर मेवाड़ के उत्कर्ष के पिछले समय में यहां के स्वामी मेवाड़ राज्य के अधीन हो गये और राव दुर्ग- भान ने कई युद्धों में महाराणा उदयसिंह का साथ दिया । जब वि० सं० १६२४ ( ई० स० १५६७ ) में बादशाह अकबर की चित्तौड़ पर चढ़ाई हुई उस समय वह रामपुरा पर भी शाही आक्रमण होने के भय से चित्तौड़ में चला गया था । तदनंतर उक्त दुर्ग पर अकबर का अधिकार हो जाने पर दुर्गभान ने भी शाही अधीनता स्वीकार की और बादशाह अकबर से लगाकर मुहम्मदशाह तक दुर्गभान एवं उसके वंशधर साम्राज्य के भक्त रहे तथा युद्ध के अवसरों पर उन्होंने मुसलमान बादशाहों को पूरी सहायता पहुं- चाई । बादशाह औरंगज़ेब के समय दुर्गभान के वंशज गोपालसिंह ने, जब वह( वाद- शाह ) दक्षिण में मरहटों की सेना से लड़ने में व्यस्त था, अच्छा पराक्रम दिखलाया था । शाही नौकरों के बहकाने से उस ( गोपालसिंह ) के पुत्र रत्नसिंह ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया । इसपर वादशाह ने उसका नाम इस्लामखां रखकर रामपुरा का नाम इस्लामपुरा कर दिया । इस गड़बड़ी में रत्नसिंह को रामपुरा से निकालने के लिए गोपालसिंह ने बहुत झगड़ा किया और उदयपुर के महाराणा अमरसिंह (दूसरा ) को भी अपना सहायक बनाया । जहांदारशाह के समय रत्नसिंह शाही सेना से लड़कर मारा गया । तब गोपालसिंह ने वहां पर पुनः अपना अधिकार जमाने की चेष्टा की । इसी बीच महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा ) ने वह इलाक़ा वादशाह फ़र्रुख़- सियर के समय अपने अधिकार में लेने का प्रयत्न कर उक्त बादशाह से रामपुरा का फ़रमान अपने नाम करा लिया । फिर उसने सेना भेजकर अपनी अधीनता में रहने के इक़रार पर आधा इलाक़ा चंद्रावतों के पास रहने दिया और आधा अपने ख़ालसे में मिलाकर वहां के प्रबंध के लिए राठोड़ दुर्गादास को नियत किया । फिर जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने वह इलाक़ा महाराणा से वि० सं० १७८६ ( ई० स० १७२६ ) में अपने छोटे पुत्र माधवसिंह (जो महाराजा का भानजा था) के नाम लिखवा लिया । जयसिंह की मृत्यु पर जयपुर के राज्य की प्राप्ति के लिए मेवाड़ राज्य ने कई बार माधवसिंह की सहायतार्थ सेना रवाना की, जिसमें मल्हारराव होल्कर आदि भी थे । अंत में ईश्वरीसिंह की मृत्यु पर माधवसिंह जयपुर का स्वामी हुआ । फिर भी उसने रामपुरा पर अपना अधिकार कुछ दिनों तक और बनाये रखा और वि० सं० १८१७ (ई० स० १७६० ) के आस-पास वह ठिकाना मल्हारराव होल्कर को जयपुर पर अधि- कार कराने के एवज़ में दे दिया ।
महारावत गोपालसिंह २२६ मांडू पर अधिकार करने के थोड़े ही दिनों पीछे जयसिंह मालवे का कार्य अपूर्ण छोड़कर अपनी राजधानी को लौट गया और साम्राज्य एवं अन्य कार्यों में व्यस्त हो गया, किन्तु मरहटों के साथ उसकी बात-चीत चलती रही । उसका कुछ परिणाम निकलनेवाला ही था कि इसी बीच उसके स्थान पर मुहम्मद बंगश वहां का सूबेदार बना दिया गया । उधर मरहटों ने जब जयसिंह के साथ जारी की हुई बात-चीत का परिणाम न निकलता देखा और मुहम्मद बंगश की कार्रवाइयां अपने विपरीत समझीं तो पुनः मालवे पर आक्रमण जारी कर दिये, जिससे वहां की स्थिति गंभीर हो गई और उसे मुहम्मद बंगश सम्हाल नहीं सका; क्योंकि शाही दरबार से उसको यथेष्ट सहायता नहीं मिली तथा निज़ाम आदि अन्य शाही अमीरों ने भी ( जिन्होंने उसको सहायता देने का क़रार किया था ) अवसर आने पर मौन साध लिया । अंत में वि० सं० १७८६ ( ई० स० १७३२ ) में तीसरी बार पुनः जयसिंह मालवे का सूबेदार बनाया गया । फ़रवरी मास में, जब जयसिंह मंदसोर के पास ठहरा हुआ था, होल्कर और सिंधिया ने उस ( जयसिंह ) को घेर लिया । यह समाचार सुनकर बादशाह ने स्वयं सेना के साथ मालवे की तरफ़ प्रस्थान कर दिया, जिसका संवाद पाने पर जयसिंह के साथी राजपूतों का भी उत्साह बढ़ गया और वे मरहटों के मुक़ाबले को आगे बढ़े । फिर मल्हारराव होल्कर और जयसिंह के बीच छोटा सा युद्ध भी हो गया, जिसमें मल्हारराव होल्कर को वहां से हट जाना पड़ा । जयसिंह ने होल्कर का पीछा किया, परंतु उसकी कुशलता से वह- ( जयसिंह ) स्वयं घिर गया¹ । बादशाह तब तक राजधानी से थोड़ी दूर ही आगे बढ़ा था और सहायक सेना भी उस समय तक न पहुंची थी । अत- एव विवश होकर उस ( जयसिंह ) को मरहटे सेनापतियों से संधि का प्रस्ताव चलाना पड़ा । निदान दो किश्तों में पांच लाख रुपये लेकर मालवा ( १ ) डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २२४। मालवा में युगान्तर; पृ० २५५ ।
२३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
छोड़ने की शर्त पर उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह के धायभाई राव नग- राज' की मध्यस्थता में संधि हो गई। जयसिंह का मरहटों को विश्वास न था, इसलिए दो लाख रुपये तो एक महीने बाद और तीन लाख रुपये मालवा छोड़कर मरहटी सेना के गुजरात की सीमा पर पहुंच जाने पर मरहटों को देने का इक़रारनामा वि० सं० १७८६ चैत्र वदि ६ (ई० स० १७३३ ता० २७ फ़रवरी) को धायभाई नगराज ने मरहटा सेनापति मल्हारराव होल्कर, राणोजी सिंधिया और आनंदराव पंवार के नाम लिख दिया। ऐसी तहरीर उन तीनों सेनापतियों की तरफ़ से भी नगराज के नाम लिखी गई। फिर मरहटे सेनापतियों ने उस समय इक़रार का पालनकर मालवा से अपनी सेना हटा ली और नगराज ने भी इक़रार के अनुसार उन्हें रुपये देकर रसीदें ले लीं²। इसके बाद महाराजा जयसिंह की मालवा की तरफ़ से चिंता मिट गई और वह वहां से लौट गया। उसके वहां से लौटने के छः महीने बाद ही मरहटों ने पुनः मालवे पर धावा किया और वि० सं० १७६१ वैशाख वदि ३० (ई० स० १७३४ ता० २२ अप्रेल) को बुधसिंह की सहायतार्थ मरहटे सेनापति रामचंद्र, मल्हारराव होल्कर, राणोजी सिंधिया और आनंदराव पंवार ने दलेलसिंह को वहां से निकालने के लिए उस(दलेलसिंह) के भाई प्रतापसिंह के छः लाख रुपये देने का इक़- रार करने पर बूंदी पर चढ़ाई की और वहां से दलेलसिंह का अधिकार उठा दिया; परन्तु थोड़े दिनों बाद ही जयसिंह ने वहां पुनः दलेलसिंह का
(१) नगराज गूजर जाति का था और महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) का धायभाई था। वह महाराणा का पूर्ण विश्वासपात्र होने से मुसाहब के पद तक पहुंच गया था। युद्ध के अवसरों पर महाराणा की सेना का सेनापतित्व भी बहुधा वही किया करता था। धीर और नीतिकुशल व्यक्ति होने से महाराणा ने उसका सम्मान बढ़ाने के लिए उसे 'राव' की उपाधि प्रदान की थी। इस समय महाराणा ने सवाई जयसिंह के लिखने पर अपनी सेना के साथ उसको मरहटों की गति रोकने के लिए भेजा था। फलतः उसने मध्यस्थ बनकर उपर्युक्त समझौता करवा दिया। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १२१६ ।
महारावत गोपालसिंह २३१ अधिकार करा दिया' । राजपूताने में मरहटों के हस्तछेप करने का यह पहला अवसर था। उन्हीं दिनों उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) का देहांत होकेर उसका कुंवर जगतसिंह (दूसरा) राजगद्दी पर बैठा । मेवाड़ राज्य की सीमा मालवे से मिली हुई होने के कारण वहां के महाराणाओं को मरहटों के बढ़ते हुए प्रभाव से पूरा भय था, इसलिए संग्रामसिंह और जगतसिंह मरहटों से मेल रखते थे एवं उन्होंने मल्हारराव होल्कर के साले नारायणराव को बूढ़ा की जागीर भी दी थी और उस (नारायणराव) के दक्षिण में चले जाने पर उक्त परगने की आय भी उसके पास पहुंचा दी जाती थी । पूर्वी राजपूताना के इस आक्रमण से वहां के नरेशों की भी आंखें खुलीं। अतएव वि० सं० १७६१ श्रावण वदि १३ (ई० स० १७३४ ता० १७ जुलाई) को मेवाड़ के हुरडा गांव में उदयपुर, जयपुर, जोधपुर, कोटा, बूंदी, करौली आदि के राजा एकत्रित हुए और उन्होंने सलाहकर पर- स्पर एकता रखने, एक के शत्रु को सबका शत्रु समझने एवं बरसात के बाद रामपुरा में अपनी-अपनी सेना के साथ एकत्र होने का इक़रार- नामा लिखा; किंतु पारस्परिक फूट और स्वार्थ-परता की भावनाओं के कारण इस इक़रारनामे का कुछ भी परिणाम नहीं निकला ४ । (१) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२१६-२०। (२) महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) वि० सं० १७६० माघ वदि ३ (ई० स० १७३४ ता० ११ जनवरी) को परलोक सिधारा और उसी दिन उसके कुंवर जग- तसिंह (द्वितीय) ने राज्यासीन होकर वि० सं० १७६१ ज्येष्ठ सुदि १३ (ई० स० १७३४ ता० ३ जून) को अपना राज्याभिषेकोत्सव किया। (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १२१८ । (४) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६२८-६। "वंशभा- स्कर" (चतुर्थ भाग, पृ० ३२२७) में हुरडा के मुकाम पर वि० सं० १७६१ के कार्तिक (ई० स० १७३४ आक्टोबर) मास में और "जोधपुर राज्य की ख्यात" (जि० २, पृ० ..१४२) में वि० सं० १७६२ (ई० स० १७२५) में राजपूताने के सब राजाओं का एकत्र होना लिखा है, जो ठीक नहीं है । उदयपुर में असली इक़रारनामा मौजूद है,
२३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
उसी वर्ष के नवंबर मास में वज़ीर कमरुद्दीन$^१$ ने मरहटों को दबाने के लिए मालवे की ओर प्रस्थान किया और दूसरी तरफ़ से खानदौराँ$^२$ भी जिसमें श्रावण मास में सब राजाओं का एकत्र होना लिखा है और "वीरविनोद" तथा कर्नल टॉड ने भी वि० सं० १७६१ का श्रावण मास ही दिया है। (१) यह एतमादुद्दौला मुहम्मद अमीनख़ां का पुत्र और निज़ामुल्मुल्क आसफ़- जाह का भतीजा था। इसका असली नाम मीर मुहम्मद फ़ाज़िल लिखा मिलता है। वाद- शाह मुहम्मदशाह ने निज़ामुल्मुल्क चिनक़लीचख़ां आसफ़जाह के वज़ीर का पद परित्याग करने पर वि० सं० १७६१ (ई० स० १७३४) में इसको अपना वज़ीर बनाया और एतमा- दुद्दौला नवाब कमरुद्दीनख़ां बहादुर नसरतजंग की उपाधि से विभूषित किया। वि० सं० १८०४ चैत्र वदि ८ (ई० स० १७४८ ता० ११ मार्च) को मुहम्मदशाह के राज्य-काल में अहमदशाह अब्दाली (दुर्रानी) के आक्रमण के समय सरहिंद के युद्ध में इसकी मृत्यु हुई। "मेमोरंडम ऑन इंडियन स्टेट्स' तथा ए० वेदी वेलू-कृत "रूलिंग चीफ्स, नोबल्स एंड ज़मींदार्स ऑव् इंडिया" आदि पुस्तकों में हैदराबाद के निज़ाम को उपर्युक्त वज़ीर कमरुद्दीन का वंशधर लिखकर उसका उपनाम चिनक़लीचख़ां लिखा है, जो ठीक नहीं है; क्योंकि अधिकांश स्थलों पर उसे चिनक़लीचख़ां का ही वंशज बतलाया है, जिसका उपनाम निज़ामुल्मुल्क था। (२) ख़ानदौराँ का पूरा नाम अब्दुत्समंदख़ां था और इसकी पूरी उपाधि "नवाब शम्सुद्दौला बहादुरजंग" थी। यह ख़्वाजा अब्दुलकरीम का पुत्र था। वादशाह औरंगज़ेब के समय इसने प्रारंभ में छः सौ सवारों का मंसब पाया, जो बढ़ते-बढ़ते पंद्रह सौ सवारों तक पहुंच गया। जहांदारशाह ने इसको सात हज़ारी मंसबदार बनाकर "अली जंग" का ख़िताब दिया। फ़र्रुख़सियर के समय यह लाहोर का सूवेदार था। जब उक्त वादशाह ने सिखों के विरुद्ध इसको सेना देकर भेजा, तब इसने सिक्खों को परास्त कर बंदा वैरागी को क़ैद किया। मुहम्मदशाह के समय यह मुल्तान का सूवेदार बनाया गया और इसको 'अमीरुलउमरा शम्सुद्दौला" की उपाधि मिली। वि० सं० १७६६ (ई० स० १७३६) में भारत पर नादिरशाह की चढ़ाई के समय यह मारा गया। यह महाराजा सवाई जयसिंह का पूरा पक्षपाती एवं साम्राज्य का भी भक्त रहा। मरहटों का उत्थान देख यह उनसे मेल करना चाहता था और वस्तुतः बाजीराव बल्लाल को मालवे की सूबेदारी इसकी सिफ़ारिश से ही मिली थी। शाही अमीर निज़ामुल्मुल्क आसफ़जाह, वज़ीरुल्मुल्क कमरुद्दीनख़ां, बुर्हानुल्मुल्क, सआ- दतख़ां आदि के अनैक्य, राजपूत राजाओं की महत्वाकांक्षा तथा राज्य-वृद्धि की लालसा एवं मरहटों का उत्कर्ष देख यह बार-बार समझौते की चेष्टा किया करता था; क्योंकि उस समय सल्तनत की हालत कमज़ोर थी।
महारावत गोपालसिंह २३३. मरहटों से समझौते के लिए मरहटों को दबाने के लिए आगे बढ़ा, जिसके साथ देवलिया के समीप एकत्र सवाई जयसिंह, कोटा का महाराव दुर्जनसाल, होने की विफल जोधपुर का महाराजा अभयसिंह आदि भी विद्य- योजना मान थे¹। मरहटा-दल ने शाही सेना को घेरकर रसद का मार्ग रोक दिया और कोटा, बूंदी की तरफ़ होते हुए उन्होंने जयपुर तथा जोधपुर राज्य में पहुंचकर लूट-मार आरंभ की । छः मास तक शाही फ़ौज मरहटों की सेना का पीछा कर उसको दबाने में व्यस्त रही, परंतु इससे मरहटों की गति मंद न हुई । उनका सैन्य-संगठन और परिचालन इतना अच्छा था कि शाही फ़ौज घिर गई और उसकी बड़ी हानि हुई । अंत में महाराजा जयसिंह के परामर्श के अनुसार खानदौरां ने उस समय सिंधिया और होल्कर से संधि कर चौथ के बाईस लाख रुपये देना स्वीकार किया²। कर्नल टॉड-कृत "राजस्थान" में महाराणा जगतसिंह (दूसरा) का अपने मन्त्री बिहारीदास के नाम वि० सं० १७६१ आश्विन (ई० स० १७३४) में भेजा हुआ पत्र दिया है, जिससे प्रकट है कि महाराणा ने इस अवसर पर आश्विन मास के पूर्व ही अपने मन्त्री पंचोली बिहारीदास को ससैन्य भेज दिया था। इस पत्र में उसने लिखा था—"मरहटों का मामला अच्छी तरह से तय किया जाय एवं इस संबंध में विचार-विमर्श के लिए किसी स्थान पर एकत्रित होना स्थिर हो तो देवलिया के समीप एकत्र होना बुद्धिमानी नहीं होगी। तुम अपने साथ की सेना की संख्या कम कर दो, जिससे रुपयों की आवश्यकता न होगी। रामपुरा का कार्य गत वर्ष की भांति तय किया जाय और दौलतसिंह³ को (१) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२२७ । जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० २, पृ० १४४ । मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३१ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६२ । (२) मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३२ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६३ । (३) "वंशभास्कर" (चतुर्थ भाग, पृ० ३२२५-२६) से पाया जाता है कि यह परमार जाति का राजपूत और महाराणा का सरदार था । संभव है कि यह महाराणा की तरफ से मरहटों के पास वकील के रूप में रहता हो । ३०
२३४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कह दिया जाय कि फिर ऐसा अवसर न हो' ।" इससे अनुमान होता है कि मरहटों का उपद्रव देवलिया राज्य के निकट तक पहुंच गया था और संभव है कि वह मरहटी सेना के आवागमन के कारण उपद्रवों से सुरक्षित न हो एवं मरहटों तथा राजा लोगों के परामर्श के निमित्त देवलिया के आस-पास एकत्र होने से उक्त राज्य तथा वहां की प्रजा को कष्ट होने की संभावना हो । बादशाह की तरफ़ से मालवे में मरहटों की गति रोके जाने और चौथ की वसूली के स्वत्व की बाबत कोई बात तय न होने से पेशवा बाजीराव किसी भी दशा में मालवे के संबंध में सम्मानपूर्ण • पेशवा के राजपूताना में समझौता करने को उत्सुक था । उसने इसके पहुंचने पर महारावत का लिए उदयपुर और जयपुर के राजाओं को अपनी उसके पास जाना ओर मिलाकर कोई मार्ग निकालना चाहा । वैसे तो उक्त दोनों राज्यों का मरहटों से मेल था, पर क्रियात्मक रूप से वे मरहटों का साथ न देते थे । कहा जाता है कि शाही दरबार में मरहटों से मिलावट रखने की सवाई जयसिंह की पूर्ण शिकायत हो रही थी, इसलिए उसको शाही दरबार से घृणा हो गई और वह मरहटों को उकसाने लगा । फलतः पेशवा ने इस अवसर से लाभ उठाने के लिए अपनी माता को, जो गया आदि की यात्रा के हेतु जानेवाली थी, मार्ग में उदयपुर तथा जयपुर के राजाओं के पास भेजना स्थिर किया और वि० सं० १७६२ (ई० स० १७३५) में महाराणा के वकील जयसिंह शक्तावत² के साथ उसको रवाना कर उस (जयसिंह) को आदेश दिया कि वह महाराणा से निवेदन कर सवाई जयसिंह को कहलादे कि वह शाही इलाक़े में राहदारी और तीर्थ ( १ ) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ४६१-२ । ( २ ) जयसिंह शक्तावत मेवाड़ में पीपलिया के ठिकानेवालों का पूर्वज था । उसके पिता शक्तावत बाघसिंह को महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) ने छत्रपति राजा शाहू की सहायतार्थ भेजा था । शाहू के यहां बाघसिंह का बड़ा सम्मान था । उसकी मृत्यु के बाद जयसिंह वहां रहकर महाराणा की तरफ़ से राजदूत का कार्य करता था ।
महारावत गोपालसिंह २३५ कर माफ़ कराने की व्यवस्था कर दे। तदनन्तर जयसिंह शक्तावत पेशवा की माता के साथ उदयपुर गया और उसने महाराणा से सब वृत्तांत निवेदन किया' । ता० ६ मई (ज्येष्ठ वदि १०) को पेशवा की माता के उदयपुर पहुंचने पर महाराणा ने उसकी अग्रगामिता कर बड़ा सम्मान किया । फिर वहां से नाथद्वारा होती हुई वह जयपुर गई । महाराणा ने उसके साथ जयपुर तक शक्तावत जयसिंह और सलूंबर के रावत केसरीसिंह को भेजा³, जिन्होंने सवाई जयसिंह से कहकर पेशवा की माता से राहदारी और तीर्थ- कर न लेने की व्यवस्था करवा दी । सवाई जयसिंह की गुप्त अभिसंधि जारी थी, इसी बीच उदयपुर और जयपुर में जाने पर पेशवा की माता का अच्छा सम्मान हुआ, जिसका उसपर बड़ा प्रभाव पड़ा । फिर उसने स्वयं उन दोनों जगहों के राजाओं के पास उपस्थित होकर चौथ और मालवा आदि का मामला तय कर लेना चाहा । वादशाह मुहम्मदशाह भी साम्राज्य की स्थिति नाजुक देख पेशवा का मामला निबटाना चाहता था और सवाई जयसिंह की मारफ़त ही, जो मालवे का सूवेदार था४, इसकी बात चल रही थी। निदान पेशवा के पास (१) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२२२-२४। (२) मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३३ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६४ । (३) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२२४ । (४) मालवा पर सवाई जयसिंह की अंतिम सूबेदारी वि० सं० १७८६ कार्तिक वदि ६ (ई० स० १७३२ ता० २८ सितंबर) से वि० सं० १७६४ भाद्रपद वदि ४ (ई० स० १७३७ ता० ३ अगस्त) तक रही थी । इसके पीछे बादशाह ने वहां की सूबेदारी निज़ामुलमुल्क के ज्येष्ठ पुत्र गाज़ीउद्दीनखां को सौंपी । पेशवा से जयसिंह ही मिलावट न रखता था, प्रत्युत् निज़ामुलमुल्क भी उससे दबता था और वि० सं० १७८८ (ई० स० १७३१) के लगभग उसने ऐसी गुप्त संधि भी की थी कि उत्तर भारत के सम्बन्ध में पेशवा जो कार्यवाही करेगा, उसमें निज़ामुलमुल्क उसका बाधक न होगा ( मालवा में युगान्तर; पृ० २४६ ); किंतु फिर उसको अपना विरोधी देख, मरहटों ने उसके साथ संघर्ष जारी कर दिया । अन्त में मरहटों की युद्ध-कुशलता से निज़ामुलमुल्क का भी साहस कम हो गया और वि० सं० १७६४ माघ वदि १२
२३६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वादशाह के इशारे से ज्योंही महाराजा सवाई जयसिंह का निमन्त्रण पहुंचा, वह कार्तिक सुदि ५ ( ता० ६ अक्टूबर ) को पूना से रवाना ( ई० स० १७३८ ता० ६ जनवरी ) को मालवे का सारा अधिकार पेशवा को सौंप देने की बात स्थिर हुई; परन्तु उन दिनों नादिरशाह के भारत पर आक्रमण करने की आशंका बढ़ रही थी। इसलिए इस समझौते को क्रियात्मक रूप नहीं दिया जा सका और लिखित रूप से वादशाह की भी स्वीकृति नहीं हुई। इसी बीच बाजीराव पेशवा की वि० सं० १७६७ ज्येष्ठ वदि ११ (ई० स० १७४० ता० १० मई) को मृत्यु हो गई और उसका पुत्र बालाजी बाजीराव पेशवा बना। इस गड़बड़ी के कारण बादशाह का विचार बदल गया और निज़ामुल्मुल्क आसफ़जाह के प्रस्ताव करने पर उसका चचेरा भाई अज़ीमुल्ला वि० सं० १७६७ ( ई० स० १७४० ) के लगभग मालवे का सूबेदार बनाया गया, जिससे पुनः मालवा से मरहटों के सब अधिकार उठ जाने की संभावना दीख पड़ी, जिसका विरोध करने के लिए पेशवा ने पृथक्-पृथक् रूप से उत्तर भारत में अपने विभिन्न दलों को रवाना किया। बादशाह ने शम्सुद्दौला आज़मख़ां और सवाई जयसिंह को मरहटों के मुक़ाबले के लिए भेजा, किंतु शाही सेना की इतनी क्षमता नहीं थी कि वह मरहटा-दल से जमकर मुक़ाबला करती। निदान वादशाह की आज्ञानुसार संवाई जयसिंह ने मरहटों से पुनः बात-चीत जारी की। अन्त में सल्तनत के सम्बन्ध के कार्यों में हस्तक्षेप न करने और चौथ उगाहने का दावा पेशवा के छोड़ने पर गुजरात और मालवा प्रांत का समस्त अधिकार शाही फ़रमान-द्वारा वि० सं० १७६८ भाद्रपद सुदि ८ ( ई० स० १७४१ ता० ७ सितम्बर ) को पेशवा बालाजी बाजीराव को सौंप दिया गया और वादशाहत का इन प्रांतों से कोई सम्बन्ध नहीं रहा। औरंगज़ेब की मृत्यु के पिछले चालीस वर्षों की उलटपल्टी में भारत के भाग्य ने बड़ा पलटा खाया। साम्राज्य की इस निर्बल स्थिति में शाही सरदार दोस्तमुहम्मदख़ां ने बादशाह से कुछ जागीर प्राप्तकर क्रमशः आस-पास की भूमि पर अधिकार कर भोपाल राज्य की स्थापना कर ली, पर मरहटा-संघर्ष में उनसे मेल रखते हुए धन आदि देकर ही वह अपना अस्तित्व स्थिर रख सका था। पेशवा बालाजी बाजीराव की विद्यमानता में ही उसके होल्कर, सिंधिया आदि सेनाध्यक्ष बड़े शक्तिशाली हो गये थे और वे मनमानी कार्यवाही करने से न चूकते थे। फिर भी वे अपने को पेशवा के अधीन ही समझते थे और पेशवा भी सतारा के स्वामी को अपना मालिक मानता था। समय की गति के परिवर्तन के साथ ही सतारा राज्य और पेशवा की सत्ता निर्बल होने पर उन्होंने उनकी आज्ञा मानना छोड़ दिया और स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण कर लूट-खसोट-द्वारा धन संग्रह करने की नीति को अपनाया। फलतः एकतन्त्र शासन के
महारावत गोपालसिंह २३७ होकर गुजरात की तरफ़ के राज्यों से चौथ का मामला तय कराता हुआ लूणावाड़ा और डूंगरपुर के मार्ग से उदयपुर पहुंचा¹। देवलिया प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों से पाया जाता है कि इस अवसर पर पेशवा ने डूंगरपुर पर घेरा डाल दिया था और महारावत गोपालसिंह ने पेशवा को समझा- कर मरहटी सेना का घेरा उठवाया²। डूंगरपुर राज्य की ख्यातों में पेशवा की सेना के वहां घेरा डालने का वृत्तांत नहीं दिया है, पर यह संभव है कि पेशवा के बृहत् लश्कर के डूंगरपुर पहुंचने पर वहां के तत्कालीन महारावल शिवसिंह ने उसका यथोचित् सत्कार न किया हो और न कुछ द्रव्य ही दिया हो, जिससे पेशवा ने वहां घेरा डाला हो और फिर महारावत गोपालसिंह के, जो संभवतः पेशवा के साथ हो अथवा मित्रता के कारण महारावल के बुलाने पर वहां पहुंचा हो, कहने-सुनने पर खिराज ( चौथ ) की रक़म निर्दिष्ट होकर घेरा उठा दिया गया हो। इस घटना का समय माघ सुदि १३ ( ई० स० १७३६ ता० १५ जनवरी ) के आस-पास होना चाहिये, क्योंकि उस तिथि को पेशवा मेवाड़ की दक्षिणी सीमा पर पहुंच गया था³। महाराणा ने अपने राज्य में होकर पेशवा के जयपुर जाने का समा- चार सुना तो उसको लाने के लिए अपने पिता महाराणा संग्रामसिंह के अभाव में सर्वत्र अशांति और अव्यवस्था बढ़ने लगी। इसमें संदेह नहीं कि इस अवधि में कई राज्यों का विकास भी हुआ और कुछ नये राज्य भी स्थापित हुए, परन्तु कई प्राचीन और प्रतिष्ठित राज्यों के बिगड़ने में भी कसर नहीं रही, जिनका हमने यथा- प्रसङ्ग उल्लेख किया है और आगे भी करेंगे। ( १ ) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२३५ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २३७ । मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३७ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६८ । ( २ ) “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में वि० सं० १७८८ ( ई० स० १७३१ ) में पेशवा बाजीराव का डूंगरपुर को घेरना लिखा है, किंतु यह बात ठीक नहीं जान पड़ती, क्योंकि वि० सं० १७८८ में पेशवा का उधर जाना नहीं हुआ था । ( ३ ) मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० २३७ । मालवा में युगान्तर; पृ० २६८ ।
२३८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास काका महाराज तख्तसिंह' और सलूंबर के रावत केसरीसिंह को मेवाड़ की सीमा तक सामने भेजा और जब पेशवा उदयपुर के निकट पहुंचा तो वह स्वयं बड़े समारोहपूर्वक सामने जाकर उसको अपनी राजधानी में ले आया²। पेशवा ने इस असाधारण सम्मान के लिए कृतज्ञता प्रकट करते हुए महाराणा से प्रार्थना की कि आप मुझे सोलह उमरावों के समान एक उमराव समझें। फिर चौथ तथा मालवा आदि के संबंध में बात- चीत हुई। इसपर महाराणा ने बनेड़ा³ परगने की आय प्रति वर्ष पेशवा को देना स्वीकार किया। कर्नल टॉड-कृत "राजस्थान" में महाराणा जगतसिंह का उसके प्रधान विहारीदास पंचोली के नाम का पत्र (१) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग; पृ० ३२३५। यह महाराणा जयसिंह द्वितीय का चतुर्थ पुत्र था और मेवाड़ में बाकरोल (जिसको हम्मीरगढ़ कहते हैं) इसकी जागीर में था। (२) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३२३५-३६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १२३२। (३) बनेड़ा का परगना मेवाड़ राज्य के अन्तर्गत था, परन्तु औरंगज़ेब के समय में यह मेवाड़ राज्य से पृथक् हो गया और उक्त बादशाह ने महाराणा राजसिंह (प्रथम) के छोटे कुंवर भीमसिंह को शाही सेवा स्वीकार करने के एवज़ में जागीर के साथ अन्य परगनों के सहित दे दिया। भीमसिंह की मृत्यु के पश्चात् उसके वंशजों का शाही दरबार में विशेष प्रभाव न रहा। औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात् बादशाहत की निर्बलता और मरहटों की लूट-खसोट की नीति से उनकी स्थिति डांवा-डोल हो गई और मालवा में बदनावर आदि के उनके परगने छिन गये। इस अवसर पर महाराणा जगतसिंह (दूसरा) ने भी बनेड़ा अपने राज्य में मिलाकर भीमसिंह के वंशज सरदारसिंह को अपना सरदार बना लिया। अनुमान होता है कि इस परगने की सनद महाराणा के नाम न होने से पेशवा के दबाव देने पर ही इसकी आय उसको देना महाराणा ने स्वीकार किया हो एवं मरहटों का मेवाड़ में दखल न बढ़ने देने के लिए ही वह उक्त परगने की आय वि० सं० १७६६ (ई० स० १७४२) तक उसके पास पहुंचाता रहा हो। इसके बाद उसने बादशाह के पास अपना वकील भेज वि० सं० १८०० आश्विन सुदि ७ (ई० स० १७४३ ता० १३ सितम्बर = हि० स० ११५६ ता० ५ शावान) को बादशाह मुहम्मदशाह के वज़ीर कमरुद्दीन से शाहपुरा, सावर, जहाजपुर और बनेड़ा के परगनों
महारावत गोपालसिंह २३६
उद्धृत किया है। उससे प्रकट है कि बाजीराव महाराणा से ज़मीन के अतिरिक्त अन्य राजाओं की अपेक्षा बीस गुना अधिक धन लेना चाहता था¹। इस मुलाक़ात के समय बिहारीदास उदयपुर में नहीं था और संभवतः जयपुर या बादशाही दरबार में गया होगा। इसलिए महाराणा ने उसको पत्र लिखकर सूचना दी होगी।
से, जो महाराणा के कुटुम्बियों के थे, सूबेदारों द्वारा नज़राने की रक़म की वसूली की मुआफ़ी की सनद करा ली हो, जिसको “वीरविनोद” के लेखक ने (द्वितीय भाग, पृ० १२४२-४४ में) उद्धृत किया है।
कर्नल टॉड ने “राजस्थान” (जि० १, पृ० ४६४) में इस अवसर पर महाराणा का पेशवा को चौथ के एक लाख साठ हज़ार रुपये वार्षिक देते रहने की बात स्थिर करने और उसके एवज़ में बनेड़ा परगने की आय देते रहने का इक़रार करने का उल्लेख किया है, जिसका समर्थन “वंशभास्कर” से भी होता है; परन्तु वहां रुपयों की संख्या एक लाख पचास हज़ार ही दी है (चतुर्थ भाग, पृ० ३२३७)। “वीरविनोद” (द्वितीय भाग, पृ० १२२८-६) में इस सम्बन्ध में एक पत्र उद्धृत किया गया है, जिसमें बनेड़ा परगने की आय के सं० १७६२ से १७६६ (ई० स० १७३५ से ४२) तक के नौ लाख पच्चीस हज़ार रुपये तथा पेशवा उदयपुर गया, उस समय मिहमानी के दो लाख रुपये देने का विवरण है। इससे स्पष्ट है कि मरहटों को वार्षिक १६०००० रुपया महाराणा-द्वारा ख़िराज के देने की बात में कोई तथ्य नहीं है। यह ठीक है कि वि० सं० १७६२ से ६६ (ई० स० १७३५ से ४२) तक उक्त परगने की आय, जिसका औसत लगभग एक लाख पचीस हज़ार रुपया वार्षिक था, पेशवा के पास पहुंचती रही, जिसका कारण हम ऊपर दिखला चुके हैं।
(१) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ४६२ । “वंशभास्कर” से प्रकट है कि बाजीराव को उदयपुर में किसी ने बहकाया कि जगमंदिर नामक महल को दिखाने के बहाने ले जाकर तुम्हें मार डालेंगे। इसपर वह बड़ा क्रोधित हुआ। फिर महाराणा ने उस (बाजीराव) के क्रोध को शांत करने के लिए सात लाख रुपये देकर उसको वहां से विदा किया (भाग ४, पृ० ३२३७)। महाराणा के मंत्री बिहारीदास के नाम के उपर्युक्त पत्र से प्रतीत होता है कि पेशवा ने कोई बहाना निकालकर महाराणा से अधिक रक़म लेने के लिए दबाव डाला होगा। फलतः महाराणा ने उसको प्रसन्न रखने के लिए उपर्युक्त बनेड़ा परगने की आय उसके पास पहुंचाने की बात स्थिर कर उसको वहां से विदा किया हो।
२४० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उदयपुर से पेशवा जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के पास गया । उस समय उसके साथ प्रतापगढ़ का महारावत गोपालसिंह भी था । ता० ३ शव्वाल हि० स० ११४८ ( फाल्गुन सुदि ४ = ता० ५ फ़रवरी ) को पेशवा ने महारावत को रुख़्सत देकर ख़ासा अस्तबल से आभूषण- सहित घोड़े महाराणा के लिए उसके साथ रवाना किये १ । जोधपुर के महाराजा अभयसिंह ने बीकानेर के महाराजा जोरावर- सिंह के समय वि० सं० १७६७ ( ई० स० १७४० ) में बड़ी सेना के साथ बीकानेर पर चढ़ाई कर चारों तरफ़ से राजधानी एवं दुर्ग को घेर लिया । महाराजा जोरावरसिंह ने बहुत दिनों तक जोधपुर की सेना का सामना किया, परंतु जोधपुर की बड़ी सेना के आगे वह छुटकारा न पा सका । अन्त में नागोर के स्वामी राजाधिराज बख्तसिंह (अभयसिंह का छोटा भाई ) की सम्मति के अनुसार जोरावरसिंह ने जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के पास अपने आदमी भेज सहायता के लिए कहलाया । जयसिंह ने अभयसिंह को बीकानेर से घेरा उठाने के लिए कहलाया, परंतु जब उसने वहां से घेरा उठाना स्वीकार न किया तो उस (जयसिंह)- ने विशाल सेना के साथ जोधपुर की ओर प्रयाण किया एवं उदयपुर के महाराणा जगतसिंह (दूसरा ) को भी सेना लेकर आने के लिए लिखा । सवाई जयसिंह के लेखानुसार महाराणा ने सलूंबर के रावत केसरीसिंह को कुछ सेना के साथ तत्काल ही भेज दिया २ और पीछे से वह स्वयं भी पुष्कर-यात्रा के बहाने अपनी सेना के साथ महाराजा जयसिंह को जोधपुर के घेरे में सहायता पहुंचाने के निमित्त रवाना हुआ ३ और उसके साथ कोटा से महाराव दुर्जनसाल, डूंगरपुर से महारावल शिवसिंह तथा प्रतापगढ़ से
[हाशिया / पार्श्व-टिप्पणी:] महारावत का महाराणा के साथ सवाई जयसिंह की सहायतार्थ जाना
[पाद-टिप्पणियाँ:] ( १ ) सिलेक्शन्स फ़्रॉम पेशवाज़ दफ़्तर; जि० ३, पृ० ३२१, सं० ३२१ । ( २ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १२२४ । ( ३ ) वही; द्वितीय भाग, पृ० १२२४ । "वंशभास्कर" ( चतुर्थ भाग, पृ० ३२६६ ) में महाराणा के साथ ८०००० सेना होना बतलाया है ।
महारावत गोपालसिंह २४१ महारावत गोपालसिंह भी जाकर सम्मिलित हो गये¹, किंतु जयसिंह ने महाराणा के पहुंचने के पूर्व ही जोधपुर पहुंच वहां घेरा डाल दिया। जयपुर की सेना-द्वारा जोधपुर के घेरे जाने का समाचार पाकर अभयसिंह बीकानेर का घेरा उठाकर जोधपुर लौट गया और फिर संधि की बातचीत होने पर उन्नीस लाख रुपये लेकर जयसिंह ने जोधपुर का घेरा उठाकर जयपुर की तरफ़ प्रयाण किया। इस बीच महाराणा भी अजमेर की सीमा में जा पहुंचा और मार्ग में जयसिंह तथा जोरावरसिंह जाकर उससे मिले²। फिर महाराणा और डूंगरपुर एवं प्रतापगढ़ के स्वामी भी अपने- अपने स्थानों को लौट गये। महारावत गोपालसिंह का वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) के लगभग देहांत हुआ³। उसके ग्यारह राणियां थीं, जिनसे चार कुंवर— [महारावत का देहांत और] बख़्तावरसिंह, सालिमसिंह, रत्नसिंह और जैत- [राणियां आदि] सिंह—एवं सूरजकुंवरी तथा एजनकुंवरी नामक दो कुंवरियां हुईं⁴। (१) ठा० चतुरसिंह; चतुरकुल चरित्र; द्वितीय भाग, पृ० १३२। (२) देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; पांचवी जिल्द; प्रथम खंड, पृ० ३१६। (३) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में तथा कुछ दूसरे स्थलों पर वि० सं० १८१४ (ई० स० १७५७) में उक्त महारावत का देहांत होना लिखा है और एक स्थान पर उसकी मृत्यु उसी वर्ष श्रावण वदि १४ (ता० १५ जुलाई) को दी है, जो ठीक नहीं है; क्योंकि उक्त महारावत के उत्तराधिकारी सालिमसिंह की एक सनद वि० सं० १८१३ माघ सुदि १ (ई० स० १७५७ ता० २० जनवरी) की कल्याणपुरा के ठाकुर फ़तहसिंह के छोटे पुत्र दौलतसिंह के नाम देवद और कराड्या गांव जागीर में देने की विद्यमान है। ऐसी अवस्था में उक्त महारावत का वि० सं० १८१४ में देहांत होने का कथन नितान्त असङ्गत है। प्रतापगढ़ से प्राप्त शिलालेखों आदि की सूची में उक्त महारावत का अन्तिम लेख वि० सं० १८१२ वैशाख वदि ३ (ई० स० १७५५ ता० ३० मार्च) का दिया है, अतएव महारावत गोपालसिंह का देहांत वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) में मानना पड़ेगा। (४) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ७-८। प्रतापगढ़ राज्य की एक ३१
२४२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उस (गोपालसिंह) के समय के वि० सं० १७७८ से १८१२ (ई० स० महारावत के समय के १७२१ से १७५५) तक के शिलालेख और दानपत्र शिलालेख और दानपत्र आदि मिले हैं, जिनमें से निम्नलिखित इतिहास के लिए उपयोगी हैं— (१) वि० सं० १७७८ आषाढ सुदि १३ (ई० स० १७२१ ता० २६ जून) का वसाड़ गांव के पटेल लाभा दवेचा नरसिंहदास के नाम का आज्ञापत्र, जिसमें दवे गोरधन को अडाण (कुआं) ज़मीन बीघा ८ देने का उल्लेख है। इसमें महारावत गोपालसिंह को 'महाराजा', और 'रावतजी- श्री' लिखा है एवं यह सनद दुए शाह चंद्रभाण होने का उल्लेख है। इस- पर जो छाप लगी हुई है उसमें 'श्रीमहारावत श्रीगोपालसिंहजी दुए शाह चंद्रभाणजी' लेख अंकित है, जिससे पाया जाता है कि हूंवड़ जाति का महाजन चंद्रभाण उक्त महारावत का मंत्री था। (२) वि० सं० १७७८ श्रावण सुदि १३ (ई० स० १७२१ ता० २५ जुलाई) का सेखड़ी गांव का गुंसाईं गंगागिरि के नाम का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत पृथ्वीसिंह-द्वारा वि० सं० १७७३ ज्येष्ठ सुदि १५ (ई० स० १७१६ ता० २५ मई) को दिये हुए नाथूखेड़ी गांव के एवज़ में उसको गोपालसिंह का उदयपुर की यात्रा के समय उक्त गांव प्रदान करने का उल्लेख है¹। (३) वि० सं० १७७६ वैशाख सुदि २ (ई० स० १७२२ ता० ६ अप्रेल) का भट्टावर के नाम गांव अचलेसर में अट्ठारह बीघा खेत देने का आज्ञापत्र। इसमें उक्त महारावत को श्रीमंत महाराजाधिराज महारावत और दुए शाह चंद्रभाण लिखा है तथा विद्या शिरोमणि-द्वारा यह आज्ञापत्र लिखे जाने का उल्लेख है। पुरानी ख्यात (पृ० ११-१२) में महारावत की रानियों की संख्या १० दी है और बख़्तावरसिंह को चतुर्थ पुत्र लिखा है। उसमें कुंवरियों के नाम नहीं दिये हैं। उसमें दिये हुए कुछ रानियों के नाम और पितृकुल भी भिन्न हैं। (१) देखो ऊपर पृ० २१८, टिप्पण संख्या १।
महारावत गोपालसिंह. २४३ ( ४ ) वि० सं० १७८१ आषाढ वदि १० ( ई० स० १७२४ ता० ५ जून ) का शाह चंद्रभाण के नाम का आज्ञापत्र जिसमें उसको डोराणु गांव जागीर में देने का उल्लेख है। इस सनद में लेखक का नाम पंचोली ईसरदास दिया है और उक्त महारावत की उपाधि 'महाराजा रावत' लिखी है। ( ५ ) वि० सं० १७८३ आषाढ सुदि १३ ( ई० स० १७२६ ता० १ जुलाई ) का नाथद्वारे में श्रीनाथजी के मंदिर को गांव धनेसरी भेंट करने का ताम्रपत्र, जिसमें उक्त महारावत का विवाह के लिए घाणेराव जाते समय उपर्युक्त गांव श्रीनाथजी को भेंट करने का उल्लेख है । इसमें दुए शाह चंद्रभाण तथा लेखक का नाम विद्याशिरोमणि राय दिया है और अंत में धनेसरी गांव के बदले में गांव जेठ्याखेड़ी चढ़ाने का उल्लेख होकर ये पंक्तियां शाह चंद्रभाण और सुंदर-द्वारा लिखी जाने का भी उल्लेख है। ( ६ ) वि० सं० १७८३ भाद्रपद सुदि १३ ( ई० स० १७२६ ता० २८ अगस्त ) की दुबे गोरधन, लख्मेश्वर तथा बंसीधर के नाम की सनद, जिसमें महारावत हरिसिंह के समय का दान किया हुआ टीकर्या गांव एवं देवलिया के घर, बारा आदि, जो दुबे जगन्नाथ जगनेश्वर के भाग के थे, देने का उल्लेख है। इस सनद में मुद्रा लगी हुई है, जिसमें बादशाह मुहम्मदशाह का नाम है और यह सनद दुए शाह चंद्रभाण होने का उल्लेख है। ( ७ ) वि० सं० १७८८ माघ सुदि ६ ( ई० स० १७३२ ता० २१ जनवरी ) शुक्रवार की देवलिया में लगी हुई ताबूतों की बावड़ी की प्रशस्ति, जिसमें महारावत गोपालसिंह और कुंवर सालिमसिंह के राज्यकाल में उसके महा- मन्त्री शाह चंद्रभाण का दस सहस्र रुपये लगाकर उक्त बावड़ी और वाटिका बनाने का उल्लेख है। इस प्रशस्ति में उपर्युक्त चंद्रभाण के पूर्वजों की नामा- वली के अतिरिक्त उसके पुत्र सुंदर और लक्ष्मीचंद के भी नाम दिये हैं। ( ८ ) वि० सं० १७९६ ज्येष्ठ वदि ३ ( ई० स० १७३६ ता० १४ मई ) का दसूं दी ( भाट ) कान्हा के नाम का वरखेड़ी गांव का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत गोपालसिंह का दसूं दी कान्हा को लाख पसाव में वरखेड़ी गांव