राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
२४४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
और लखणा की लागत देने का उल्लेख है। इस ताम्रपत्र में लेखक का नाम मेहता गोविंद दिया है। ( ९ ) वि० सं० १७९९ आश्विन वदि ३ ( ई० स० १७४२ ता० ६ सितंबर) की पाडलिया लसाण के नाम की सनद, जिसमें चाकरी में उसको गांव थड़ा देने का उल्लेख है। ( १० ) वि० सं० १८०६ माघ वदि ३० ( ई० स० १७५० ता० २६ जनवरी) शुक्रवार की व्यास हरिराम के नाम की सनद, जिसमें नीनोर गांव में बीस बीघा भूमि महोदय अमावस्या के अवसर पर गौतमेश्वर में मंदाकिनी के तट पर दान करने का उल्लेख है। इस सनद में उपर्युक्त अमा- वास्या पर महारावत का दश महादान भी करने का उल्लेख है। यह सनद दोसी रूपजी के हुए होने का उल्लेख है और इसके लेखक का नाम अस्पष्ट है। इसमें महारावत को 'महाराजाधिराज महारावत' लिखा है। ( ११ ) वि० सं० १८१० आश्विन सुदि ७ ( ई० स० १७५३ ता० ३ अक्टोबर) का प्रतापगढ़ में केशवरायजी के मंदिर के पास लगा हुआ शिलालेख, जिसमें वहां के निवासी बोहरों पर भविष्य में किसी प्रकार की सख्ती न होने का उल्लेख है। इस शिलालेख में महारावत को 'महाराज- रावत' लिखा है। ( १२ ) वि० सं० १८११ भाद्रपद वदि ८ ( ई० स० १७५४ ता० ११ अगस्त) का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत का अपने कुंवर सालिमसिंह के साथ नाथद्वारे जाकर वहां के गोस्वामी गोवर्धन की गद्दीनशीनी पर गोवर्धनपुर नामक गांव भेंट करने का उल्लेख है। ( १३ ) वि० सं० १८११ मार्गशीर्ष वदि ५ ( ई० स० १७५४ ता० ५ नवंबर) की शाह कपूरचंद पाडलिया के नाम की सनद, जिसमें उसको राज्य- सेवा सौंपने एवं गांव मोहेड़ा तथा गांव देवासला का खिराज हाथ खर्च के लिए दिये जाने तथा आज्ञानुसार राज्य-सेवा करते रहने का उल्लेख है। महारावत गोपालसिंह वीर, नीतिकुशल और धर्मपरायण शासक था। वह अपने पूर्वजों के समान ही परमार्थ के कार्यों में रुचि रखता था।
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महारावत सालिमसिंह
महारावत सालिमसिंह २४५ महारावत का व्यक्तित्व उसका अपने राज्य की उन्नति की तरफ़ पूरा ध्यान था। व्यापार की वृद्धि के लिए वह बाहर से व्यापा- रियों को बुलवाकर अपने राज्य में आबाद करता और उनपर किसी प्रकार का अत्याचार न हो, इसका सदैव ध्यान रखता था । प्रजा पर भविष्य में अत्याचार न हो, इस दृष्टि से उसने शिलालेख लगवा दिये थे। वह समय की गति के अनुसार आचरण करता था। उसने उस समय के प्रबल राजनीतिज्ञ, महाराष्ट्र के कर्णधार पेशवा बाजीराव की प्रीति सम्पादन की, जिसका परिणाम यह हुआ कि मालवे में चारों तरफ़ मरहटों का उपद्रव होने पर भी उसका राज्य, जो मालवे से मिला हुआ था, क्षति से बचा रहा। पेशवा उसका बड़ा सम्मान करता और उसकी बात मानता था। आपत्तिकाल में महारावत अपने मित्रों की सहायता करना अपना परम कर्त्तव्य समझता था। उसने डूंगरपुर पर महाराणा और पेशवा के आक्रमणों के समय समझौते का प्रयत्न किया तथा बीकानेर पर जोध- पुर के महाराजा की चढ़ाई के समय, जब महाराणा अपनी सेना के साथ जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह की सैन्य-योजना को सफल बनाने के लिए गया, वह भी अपनी सेना के साथ जाकर उसके शामिल हुआ। वह दानी राजा था। उसने कई गांव आदि दान में दिये थे। उसने अपने नाम पर प्रतापगढ़ में गोपालगंज नामक मोहल्ला आबाद किया एवं देवलिया में एक महल भी बनवाया, जिसको गोपाल-महल कहते हैं। सालिमसिंह महारावत गोपालसिंह का परलोकवास होने पर उसका कुंवर राज्य-प्राप्ति सालिमसिंह वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) के लगभग अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ। इसके कुछ वर्ष बाद ही वह (सालिमसिंह) दिल्ली गया और तत्कालीन बादशाह शाहआलम से मिला, जिसने उसे चंवर आदि राज-
२४६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत का दिल्ली जाकर बादशाह से सम्मान प्राप्त करना चिह्न, ज़री का निशान और नक़ारा रखने का सम्मान तथा प्रतापगढ़ में टकसाल खोलकर नवीन सिक्का, जो 'सालिमशाही' कहलाता है, बनाने का हक़ प्रदान किया । दिल्ली से लौटते हुए महारावत ने उदयपुर जाकर वहां के तत्कालीन महाराणा राजसिंह (दूसरा) से भेंट की । उस समय तक प्रतापगढ़ राज्य मरहटों के आक्रमणों से अछूता रहा था और वह चौथ आदि से मुक्त था। पेशवा के तीन प्रमुख सेनापति तुकोजी का देवलिया पर घेरा डालना सिंधिया, होल्कर और पंवार के बीच मालवे के परगनों का विभाग होकर प्रतापगढ़ राज्य की चौथ होल्कर के हिस्से में रखी गई। अतएव चौथ की वसूली के लिए मल्हारराव होल्कर की तरफ़ से उसके सेनापति तुकोजी ने ससैन्य प्रतापगढ़ पर चढ़ाई कर वि० सं० १८१८ (ई० स० १७६१) में उसे चारों तरफ़ से घेर लिया, किंतु महारावत की कुशलता से होल्कर के सेनापति को सफलता नहीं मिली। इसी बीच रामपुरा पर अधिकार करने के लिए मल्हारराव होल्कर और उदयपुर राज्य के बीच संघर्ष छिड़ गया तथा उदयपुर के महाराणा की सेना होल्कर के मुक़ाबले के लिए अमरदास चीडक (चंडक, माहेश्वरी वैश्य) की अध्यक्षता में जावद में एकत्रित हुई १। फलतः उस समय होल्कर की सेना को वहां से अपना घेरा उठाना पड़ा। दो वर्ष पीछे जब मल्हारराव होल्कर वि० सं० १८२० (ई० स० १७६३) में उदयपुर की तरफ़ सेना लेकर बढ़ा, तब उसने प्रतापगढ़ पर घेरा डालकर वहां से कुछ धन वसूल किया २। (१) कान्होड़ के रावत जगतसिंह के नाम उदयपुर राज्य के मंत्री सदाराम देपुरा (माहेश्वरी वैश्य) का वि० सं० १८१८ फाल्गुन सुदि ८ (ई० स० १७६२ ता० ३ मार्च) का पत्र। (२) प्रतापगढ़ राज्य से मरहटों (होल्कर) को खिराज किस वर्ष से मिलना आरंभ हुआ, इसका विवरण प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों और मरहटा-काल के इतिहासों से नहीं पाया जाता। इसलिए इस विषय में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा
महारावत सालिमसिंह २४७ महाराणा जगतसिंह (दूसरा) वि० सं० १८०८ (ई० स० १७५१) में परलोक सिधारा और उसके पीछे उसका कुंअर प्रतापसिंह (दूसरा) [महाराणा अरिसिंह की] उदयपुर राज्य का स्वामी हुआ, जिसकी थोड़े समय [सहायतार्थ महारावत का] बाद ही वि० सं० १८१० (ई० स० १७५४) में मृत्यु [सेना भेजना] हुई। तदनन्तर उस (प्रतापसिंह) का पुत्र राजसिंह (दूसरा) दस वर्ष की आयु में महाराणा हुआ, परन्तु वि० सं० १८१७ चैत्र वदि १३ (ई० स० १७६१ ता० ३ अप्रेल) को वह भी निःसंतान काल-कवलित हो गया। इसपर राज-महिषियों की आज्ञा से उस (राज- सिंह) का चाचा अरिसिंह, जो जगतसिंह का छोटा पुत्र और प्रतापसिंह का भाई था, मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया गया। अरिसिंह आतुर और क्रोधी स्वभाव का था, अतएव गद्दीनशीनी के थोड़े दिनों बाद ही ऐसी घटना घटी, जिससे सरदारों आदि का उससे मनोमालिन्य हो गया और वहां विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हो गई। राज्य के अधिकांश बड़े-बड़े सरदारों ने अरि- सिंह को राज्यच्युत् करने के लिए राजगद्दी के दूसरे दावेदार रत्नसिंह का, जो राजसिंह की मृत्यु के पीछे उस (राजसिंह) की झाली राणी से उत्पन्न · हुआ था, पक्ष लिया। उन्होंने गुप्त रूप से उस शिशु राजकुमार को उदयपुर से निकालकर उसके नाना गोगूंड़े के स्वामी झाला जसवन्तसिंह के पास पहुंचाया १। महाराणा इस घटना से बड़ा नाराज़ हुआ और उसने सरदारों का दमन करना स्थिर कर संदेह ही संदेह में अपने पितृव्य बागोर के महाराज नाथसिंह को मरवा डाला और उसके कुछ समय बाद राज्य के सच्चे हितैषी सलूंवर के रावत जोधसिंह का भी प्राण हरण किया, जिससे कुछ सरदारों को छोड़कर कई बड़े-बड़े सरदार प्रत्यक्ष रूप से रत्नसिंह के पक्ष में मिल गये और कुछ तटस्थ रहकर तत्समयक स्थिति को देखने लगे। फिर वि० सं० १८२२ (ई० स० १७६५) में विद्रोही सरदारों ने शिशु रत्नसिंह जा सकता। महारावत गोपालसिंह की पेशवाओं से मित्रता थी, अतएव उसकी मृत्यु के बाद अर्थात् उक्त समय के आस-पास ही होल्कर के साथ वहां का खिराज स्थिर हुआ होगा। (१) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६४८।
२४८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को कुंभलगढ़ ले जाकर उसको मेवाड़ का महाराणा घोषित किया और तटस्थ एवं अरिसिंह के पक्षपाती सरदारों को भी वे लोभ देकर अपनी तरफ़ मिलाने लगे । उधर अरिसिंह ने भी भेद-नीति का आश्रय लेकर कई बड़े-बड़े सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया । विद्रोही सरदारों ने नागों (साधुओं) आदि को नौकर रखकर चारों तरफ़ लूट-मार आरम्भ की और मेवाड़ में कई स्थानों पर अपना अधिकार जमा लिया, पर शीघ्र ही अरिसिंह ने अपने सहायक सरदारों एवं वैतनिक सिन्धी सेना की सहायता से किसी क़दर उनका दख़ल उठा दिया¹ । मेवाड़ के इस गृह-कलह को बढ़ाने में जोधपुर के महाराजा विजयसिंह का भी हाथ था । जोधपुर राज्य की ख्यात में लिखा है कि अरिसिंह की तरफ़ से उक्त महाराजा के पास वकील पहुंचने पर उस(विजयसिंह) ने सेना-व्यय देने के इक़रार करने पर सिंघवी फ़तेचंद और भीमराज को अपनी सेना देकर रवाना किया और उनके साथ नागोर की फ़ौज भी भेज दी, जिसने जाकर भांडेसर (जोधपुर राज्य) में अपना मुक़ाम डाला। वहां कुंभलगढ़ से रत्नसिंह के वकील पहुंचे और उन्होंने कहा कि जितना रुपया अरिसिंह देगा उतना हम लोग दे देंगे, तुम उसकी मदद मत करो । फिर रत्नसिंह की तरफ़ से रुपये मिलने पर वह सेना हटा दी गई और सिंघवी फ़तेचंद तथा भीमराज दोनों जोधपुर चले गये । रत्नसिंह की तरफ़ से खींवसर के ठाकुर जोरावरसिंह के पास भी सहायता देने के लिए रक़म भेजी गई, जिससे वह अपने राजपूतों के साथ रत्नसिंह के शामिल हो गया । उसको दो वर्ष तक तो वह तनख़्वाह देता रहा और उसके बाद सेरा (सायरा) का परगना देना स्थिर हुआ² । संयोग से सात वर्ष की आयु होने पर शीतला रोग से रत्नसिंह का देहांत हो गया³ । उस समय उसके पक्षपाती सरदारों को विश्वास दिलाने (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५५२। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५१ । (२) जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० ३, पृ० ५७ । (३) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५४ ।
महारावत सालिमसिंह २४६ पर बेदला का राव रामचंद्र, भींडर का महाराज मुहकमसिंह ( शक्तावत ) आदि सरदार और अमरदास देपुरा महाराणा के पास उपस्थित हो गये१; किंतु इससे बचे हुए रत्नसिंह के पक्षपाती सरदारों का साहस कम न हुआ और उन्होंने शिशु रत्नसिंह के स्थान में एक कृत्रिम लड़के को खड़ा कर उपद्रव ज्यों का त्यों जारी रक्खा। उन दिनों कोटा से झाला ज़ालिमसिंह भी जाकर महाराणा के शामिल हो गया। उस समय अरिसिंह का विरोधियों की अपेक्षा बल बढ़ गया था, इसलिए देवगढ़ के रावत जसवंतसिंह और उसके पुत्र राघवदेव ने माधवराव सिंधिया को उदयपुर पर अधिकार हो जाने पर सवा करोड़ रुपया देने का इक़रार कर अपना सहायक बना लिया। उधर महाराणा ने माधवराव के प्रतिद्वंद्वी बेहरजी ताकपीर और पंडित राघवराम के द्वारा पेशवा से बातचीत कर उन दोनों को अपनी तरफ़ मिला विपक्षियों का मूलोच्छेद हो जाने पर बीस लाख रुपया देना तय किया२। महाराणा अरिसिंह ने सलूंबर के रावत पहाड़- सिंह, देलवाड़ा के राज झाला राघवदेव और शाहपुरा के राजा उम्मेदसिंह को माधवराव सिंधिया के पास भेज रत्नसिंह का पक्ष छोड़ देने को कह- लाया३; किंतु लोभी माधवराव ने रत्नसिंह का पक्ष छोड़ना स्वीकार न ( १ ) महाराणा अरिसिंह का कानोड़ के रावत जगतसिंह के नाम का वि० सं० १८२५ श्रावण वदि ८ ( ई० स० १७६८ ता० ७ जुलाई ) गुरुवार का ख़ास रुक्का। कानोड़ के रावत जगतसिंह के नाम बेदला के राव रामचन्द्र, सलूंबर के रावत पहाड़- सिंह, देलवाड़ा के राज झाला राघवदेव और भींडर के महाराज मुहकमसिंह का वि० सं० १८२५ श्रावण वदि ८ ( ई० स० १७६८ ता० ७ जुलाई ) का पत्र। अमरदास देपुरा का कानोड़ के रावत जगतसिंह के नाम का वि० सं० १८२५ श्रावण वदि ६ ( ई० स० १७६८ ता० ८ जुलाई ) का पत्र। ( २ ) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६४१। यह इक़रार- नामा वि० सं० १८२५ भाद्रपद सुदि.१५ ( ई० स० १७६८ ता० २५ सितम्बर ) को हुआ था। ( ३ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५४५। सलूंबर के रावत पहाड़सिंह, देलवाड़ा के राज राघवदेव और शाहपुरा के राजा उम्मेदसिंह का महाराणा अरिसिंह के ३२
२५० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास किया। इसके बाद अरिसिंह ने कुछ लोगों के बहकाने पर झाला राघवदेव को भी रत्नसिंह से मिला हुआ होने के संदेह में मरवा डाला१ । इससे जो सरदार महाराणा के पास उपस्थित हो गये थे, वे भी पीछा विपक्षियों से जा मिले। इस अवसर पर रघुजी पायगिया और दौला मियां भी, अपनी- अपनी सेनाओं के साथ अरिसिंह से जा मिले और जब महाराणा ने उनके बल पर विरोधियों पर अधिक दबाव डाला, तब माधवराव ने भी उदयपुर की तरफ़ प्रयाण करना निश्चय कर लिया । इसपर अरिसिंह ने माधवराव के मेवाड़ में पहुंचने के पूर्व ही अपनी सेना उज्जैन भेजकर वहीं उस(माधवराव) से युद्ध करने की योजना बनाई और वि० सं० १८२५ (ई० स० १७६८) के शीतकाल में अपनी बीस हज़ार सेना उज्जैन रवाना की। पौष सुदि ६ (ई० स० १७६६ ता० १३ जनवरी) को क्षिप्रा के तट पर माधवराव की सेना से महाराणा की सेना का मुक़ाबला हुआ। तीन दिन तक बराबर युद्ध होता रहा। मेवाड़ी सेना ने वीरतापूर्वक युद्ध कर शत्रु सैन्य को हटा दिया और विजयोन्मत्त हो नगर में लूटमार आरंभ की। इतने में ही जयपुर से देवगढ़ के रावत जसवंतसिंह की भेजी हुई पंद्रह हज़ार नांगों, की सेना ने जाकर अरिसिंह की सेना पर धावा बोल दिया, जिससे उसमें भगदड़ मच गई । फिर भी महाराणा के सरदारों, रघुजी पायगिया तथा दौला मियां ने शत्रु पक्ष का वीरता से मुक़ाबला किया। अंत में सलूंबर के रावत पहाड़सिंह, शाहपुरा के राजा उम्मेदसिंह, बनेड़ा के राजा रायसिंह, रघुजी पायगिया, दौला मियां आदि कई सरदारों के मारे जाने और झाला ज़ालिमसिंह, रावत मानसिंह तथा मेहता अगरचंद के घायल होकर युद्धक्षेत्र में गिर जाने पर अरिसिंह की सेना भाग गई । शत्रुओं ने झाला ज़ालिमसिंह, रावत मानसिंह और नाम का वि० सं० १८२१ आश्विन वदि १४ (ई० स० १७६८ ता० ६ अक्टूबर) का प्रार्थनापत्र । (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १४५५ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५१ ।
महारावत सालिमसिंह २५१ मेहता अगरचंद को क़ैद कर दिया१। तोपों और बंदूकों के सामने खड़े होकर तलवारों और बरछियों से वीरता दिखलाने का मेवाड़ी राजपूतों का यह अन्तिम युद्ध था। इसके बाद पारस्परिक संघर्ष से उनकी स्थिति ऐसी हो गई कि वे फिर न संभल सके। उज्जैन के युद्ध में माधवराव ने महाराणा की सेना को परास्त कर वहीं से अपने लश्कर को उदयपुर की तरफ़ मोड़ा और शीघ्र ही उदयपुर को घेर लिया। उज्जैन के युद्ध में महाराणा की बहुत सी सेना का नाश हो गया था, फिर भी उसके पास सेना की कमी नहीं थी। वैतनिक सिंधी सेना के अतिरिक्त उसके पास बहुत से लड़ मरनेवाले स्वामिभक्त राजपूत विद्यमान थे, जिनके बल पर उसने उदयपुर नगर की चारों ओर से मोर्चाबंदी कर उसकी रक्षा का यथेष्ट प्रबंध कर लिया। छः महीने के लगभग महाराणा के सरदारों ने सिंधिया का मुक़ाबला किया। जब उदयपुर पर अधिकार करने में सिंधिया को सफलता न मिली, तब उसने साढ़े तिरसठ लाख रुपये सैन्य-व्यय के महाराणा से लेना तय कर उदयपुर से घेरा उठाना और रत्नसिंह का साथ छोड़ना स्वीकार किया। फलतः ज़ेवर, नक़द आदि मिलाकर साढ़े तैंतीस लाख रुपये तो उस समय पूरे कर दिये गये और बाकी रक़म के एवज़ में जावद, जीरण, नीमच, मोरवण आदि मेवाड़ के ज़िले, जबतक रुपये अदा न हों तबतक के लिए, सिंधिया को सौंप दिये गये२। इसके बाद कुछ और सरदार विद्रोहियों का साथ छोड़कर महा- राणा से जा मिले, जिससे कृत्रिम रत्नसिंह की ताक़त घट गई; फिर भी उसके पक्षपातियों ने उपद्रव में कमी न आने दी और वि० सं० १८२६ (ई० स० १७७०) में टोपला गांव के पास तथा वि० सं० १८२८ (ई० स० १७७१) ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १४५५-८ । मेरा उदयपुर राज्य का इति- हास; जि० २, पृ० ६५२-३ । ( २ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग; पृ० १४६०-६६ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५४-७ ।
२५२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास में गंगराड़ में उनका महाराणा की सेना से मुक़ाबला हुआ, जिसमें उनकी हार हुई और उनका बल टूट गया¹। तदनन्तर महाराणा ने विद्रोहियों के अधिकृत क़िलों पर अधिकार जमाना शुरू किया और चित्तोड़ पर भी अधिकार कर लिया²। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि मेवाड़ के इस गृह- कलह के समय महाराणा अरिसिंह की तरफ़ से आदेश पाते ही महारावत सालिमसिंह ने अपनी सेना भेज दी थी, जिसने युद्ध के प्रत्येक अवसर पर शत्रु-सैन्य से धीरतापूर्वक युद्ध किया था; किंतु इसका मेवाड़ के इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। इतिहास के संरक्षण का अनुराग न होने से उस समय का क्रम-बद्ध वृत्तांत मिलना असंभव है। इसलिए प्रतापगढ़ के राजपूतों ने इस अवसर पर कब-कब और कहां-कहां युद्ध में भाग लिया इसपर अधिक प्रकाश नहीं डाला जा सकता। फिर भी यह कहा जा सकता है कि महारावत सालिमसिंह के पास उस समय मेवाड़ राज्य की तरफ़ से दिया हुआ धरियावद का परगना विद्यमान था, जिसके कारण युद्ध के अवसर पर उसका महाराणा के पास अपनी सेना भेजना असंभव नहीं है। इसकी पुष्टि महाराणा अरिसिंह के वि० सं० १८२८ फाल्गुन वदि ६ (ई० स० १७७२ ता० २७ फरवरी) गुरुवार के महारावत सालिमसिंह के नाम के परवाने से भी होती है, जिसमें बादशाह फ़र्रुखसियर-द्वारा महारावत पृथ्वी- सिंह को 'रावत राव' की उपाधि मिलने का उल्लेख है³। उपर्युक्त परवाने से स्पष्ट है कि मेवाड़ के इस गृहकलह में महारावत सालिमसिंह, महाराणा अरिसिंह का सहायक था, इसी कारण से उसकी दी हुई सहायता के पुरस्कार में उक्त महाराणा ने उसके नाम यह परवाना भेज, महारावत का (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५६६। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ६५८। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १५७०-७१। मेरा उदयपुर राज्य का इति- हास; जि० २, पृ० ६५६। (३) देखो ऊपर पृ० २२४-५, टिप्पण संख्या १।
महारावत सालिमसिंह २५३ सम्मान बढ़ाया । “वीरविनोद” के लेखक महामहोपाध्याय कविराजा श्या- मलदास ने इस विषय को अधिक स्पष्ट करने के लिए अपने बृहद् ग्रंथ में प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के प्रसङ्ग में निम्नलिखित उल्लेख किया है— “जब माधवराव सिंधिया ने उदयपुर को विक्रमी १८२५ ( हि० स० ११८२ = ई० स० १७६८ ) में जा घेरा, तब रावत सालिमसिंह भी अपनी सेना लेकर महाराणा अरिसिंह के पास गये और घेरा उठने के बाद तक मददगार रहे। इस खैरख्वाही के एवज़ में इनको महाराणा अरिसिंह ने धरियावद का परगना जागीर में दे दिया और 'रावत राव' का ख़िताब भी, जो बादशाह ने दिया था, इनके नाम पर बहाल रक्खा¹ ।” उपर्युक्त कथन से प्रत्यक्ष है कि मेवाड़ के गृहकलह के समय प्रतापगढ़ राज्य से केवल सेना ही नहीं, प्रत्युत् महारावत सालिमसिंह भी स्वयं उदयपुर के सिंधिया-द्वारा घेरे जाने पर महाराणा अरिसिंह की सहायतार्थ गया था और युद्ध के अवसर पर उसने वीरता प्रदर्शित की थी। संभव है कि उस समय के भी इतिहास के साधन पूरे न मिलने से “भीमविलास” के लेखक कवि कृष्ण अहाड़ा और कर्नल टॉड ने महारावत की सहायता का उल्लेख छोड़ दिया हो । महारावत सालिमसिंह का वि० सं० १८३१ कार्तिक वदि ७ ( ई० स० १७७४ ता० २६ अक्टोबर ) को देहांत होना पाया जाता है । महारावत का देहांत और उसके ग्यारह राणियां थीं², जिनमें से एक उसकी राणियां आदि कुन्दनकुंवरी आमझरा³ के राव लालसिंह की पुत्री और जसरूपसिंह की पौत्री थी । उक्त राणी के ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग; पृ० १०६४ । प्रतापगढ़ राज्य की कुछ ख्यातों में भी धरियावद का परगना मेवाड़ के गृहकलह के समय महारावत सालिमसिंह-द्वारा महाराणा अरिसिंह को सहायता देने के एवज़ में मिलने का उल्लेख है, परन्तु हमारे अनु- मान से धरियावद का परगना महारावत गोपालसिंह के समय मिला था । इस विषय के विस्तृत विवेचन के लिए देखो ऊपर पृ० २२४, टिप्पण संख्या १ तथा पृ० २४२ । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ८-६ । ( ३ ) आमझरा, दक्षिणी मालवे में गुजरात की सीमा से मिला हुआ वर्तमान
२५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
उधर से कुंवर सामन्तसिंह का जन्म हुआ । महारावत के अन्य कुंवर रोड़सिंह, विजयसिंह, गजसिंह, महतावसिंह, लालसिंह तथा मयाकुंवरी और रूपकुंवरी नामक दो कन्याएं हुई थीं। उनमें से रोड़सिंह से महतावसिंह तक के चारों कुंवर बाल्य-काल में ही मृत्यु' को प्राप्त हुए और सामन्तसिंह तथा लालसिंह' उस (सालिमसिंह) की मृत्यु के पीछे विद्यमान थे । उस (सालिमसिंह) के समय के निम्नलिखित शिलालेख और ताम्रपत्र मिले हैं- ( १ ) वि० सं० १८१३ माघ सुदि १ ( ई० [महारावत के समय के] [शिलालेख, दानपत्र आदि] स० १७५७ ता० २० जनवरी ) की देवद और करा- इ़ठा गांव की कुंवर दौलतसिंह ( कल्याणपुरा ) के नाम की सनद, जिसमें सेवा के एवज़ देवद और कराइ़ठा गांव प्रदान करने और बदले में एक हज़ार रुपये वार्षिक खिराज जमा कराने का उल्लेख है । ( २ ) वि० सं० १८१४ भाद्रपद सुदि १२ ( ई० स० १७५७ ता० २६ अगस्त ) का व्यास हरिराम, खीमराम, नाथूराम और भवानीशंकर के नाम का ३० बीघा ज़मीन का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत का उपर्युक्त व्यक्तियों को नीनोर गांव में ज़मीन देने का उल्लेख है । ( ३ ) वि० सं० १८१५ श्रावण सुदि १ ( ई० स० १७५८ ता० ४ अग- स्त ) की शाह सुंदर के नाम की सनद, जिसमें उसकी जागीर और मान-
झाबुआ राज्य के निकट एक राठोड़ राज्य था, जहां के स्वामी जोधपुर राज्य के स्वामी मालदेव के ज्येष्ठ पुत्र राम के वंशधर थे । मुग़ल साम्राज्य की अवनति के समय आम- झरा मरहटा-युद्ध का केन्द्र रहा और वहीं पर मालवा की रक्षार्थ मरहटी सेना से युद्ध करते हुए मालवा के सूबेदार राजा गिरधरबहादुर और दयाबहादुर मारे गये थे । तद- नन्तर उक्त राज्य सिंधिया का खिराजगुज़ार रहा और वि० सं० १६१४ ( ई० स० १८५७ ) के सिपाही विद्रोह में वहां का स्वामी बख़्तावरसिंह बाग़ी दल से मिल गया । इसपर अंग्रेज़ सरकार ने उसको गिरफ़्तार कर इंदौर में फांसी का दंड दिया और उक्त राज्य ज़ब्त कर सिंधिया ( ग्वालियर राज्य ) को दे दिया । ( १ ) लालसिंह के वंशज अरण्योद के स्वामी हैं ।
- महारावत सालिमसिंह २५५
मर्यादा बनी रहने का उल्लेख है । ( ४ ) वि० सं० १८१६ भाद्रपद वदि १४ ( ई० स० १७६२ ता० १८ अगस्त ) बुधवार की गांव अंबेली की पाडलिया शाह कपूरचंद के नाम की सनद, जिसमें अंबेली गांव राजकीय सेवा के एवज़ में प्रदान किये जाने का उल्लेख है । ( ५ ) वि० सं० १८१६ आश्विन सुदि १० ( ई० स० १७६२ ता० २७ सितंबर ) का नीनोर गांव के शिव-मंदिर का शिलालेख, जिसमें सात हज़ार पैंतीस रुपये के व्यय से वीसलनगरा नागर ब्राह्मण खीमज तथा हरनाथ-द्वारा व्यापार में लाभ होने पर महारावत सालिमसिंह के समय वह मंदिर बनवाये जाने का उल्लेख है । अपने पूर्वजों के समान ही महारावत सालिमसिंह उदार विचार का राजा था । उसने शाही दरबार में अपना प्रभाव बढ़ाया और प्रतापगढ़ महारावत का व्यक्तित्व : राज्य में टकसाल खोलने की इजाज़त प्राप्त की । फलतः महारावत के कुंवर सामंतसिंह के राज्य- काल में वादशाह शाहआलम (द्वितीय) के समय उक्त बादशाह के सन् जुलूस १५ में नवीन सिक्का ढलकर जारी हुआ, जो “सालिमशाही” नाम से प्रसिद्ध है । इस नवीन सिक्के के निर्माण से पाया जाता है कि प्रतापगढ़ राज्य उस समय मालवे के राज्यों में समृद्ध था और छोटा होने पर भी वहां का सिक्का आस-पास के बहुधा सब राज्यों-डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, सीतामऊ, रतलाम, जावरा, ग्वालियर के मंदसोर परगने और टोंक के नींवाहेड़े परगने—में चलता था। यही नहीं अंग्रेज़ सरकार ने भी संधि के समय आवश्यकता पड़ने पर प्रतापगढ़ की टकसाल से सालिमशाही रुपये ढलवाकर दिये जाने की विशेष शर्त रक्खी । इससे उक्त राज्य का महत्त्व प्रकट होता है । महारावत के समय प्रतापगढ़ राज्य पर भी होल्कर का आक्रमण हुआ, परंतु वह अक्षुण्ण बना रहा । यह उक्त रावत की नीति-कुशलता का सूचक है। मालवा में उसका राज्य सिंधिया के इलाक़े से मिला हुआ होने पर भी उसने माधवराव का कुछ भी भय
२५६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
न कर मेवाड़ के गृह-कलह के समय स्वयं उदयपुर जाकर महाराणा अरिसिंह को सैनिक सहायता दी। यह भी उसके लिए गौरवप्रद बात है। वह नीति-कुशल, दानी और शांतिप्रिय शासक था। उसके समय राज्य के वैभव में अच्छी वृद्धि हुई। पड़ोस के इंदौर आदि राज्यों के साथ उसका संबंध अच्छा रहा। वि० सं० १८१८ और १८२० (ई० स० १७६१ और १७६३) में वहां होल्कर की चढ़ाइयां हुईं, पर अंत में सम्मानपूर्वक समझौता हो जाने से उसके राज्य की अधिक क्षति नहीं हुई। वह होल्कर के यहां किसी वैवाहिक कार्य के अवसर पर वि० सं० १८२४ (ई० स० १७६७) में इंदौर भी गया था; परंतु इसका वर्णन इंदौर राज्य के इतिहास में नहीं मिलता है, जिसका कारण यही हो सकता है कि वहां के इतिहास लेखकों ने ऐसी घटनाओं को उपयुक्त न समझ छोड़ दिया हो। उसने प्रतापगढ़ क़स्बे में अपने नाम से सालिमपुरा नामक मोहल्ला आबाद कर जनता के साथ किसी प्रकार की अनुचित छेड़-छाड़ न की जावे, इस दृष्टि से वहां पर पाषाण लेख खुदवाकर लगा दिया, जो प्रताप- गढ़ के सूरजपोल दरवाज़े के बाहर एक चबूतरे पर विद्यमान है। अपने नाम से उसने सालिमगढ़ गांव बसाया, जो वहां के प्रथम वर्ग के सरदारों का एक ठिकाना है। उसने देवलिया के दुर्ग का जीर्णोद्धार कराने के अति- रिक्त वहां एक महल और प्रतापगढ़ क़स्बे का प्राकार भी बनवाया एवं द्वारिका में अपनी तरफ़ से सदाव्रत जारी किया, जो उसकी धार्मिक रुचि और कृष्ण-भक्ति का परिचायक है।
सामन्तसिंह
महारावत सामन्तसिंह का जन्म वि० सं० १८२४ आश्विन सुदि १३ (ई० स० १७६७ ता० ५ अक्टूबर) को हुआ था और वह वि० सं० १८३१ कार्तिक वदि ७ (ई० स० १७७४ ता० २६ अक्टूबर) [राज्य-प्राप्ति] को सात वर्ष की आयु में प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ। उसकी बाल्यावस्था के कारण राजमाता कुंदनकुंवरी की
महारावत सामन्तसिंह
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महारावत सामन्तसिंह २५७ तत्त्वावधानता में शासन-कार्य शाह कपूर पाडलिया, महारावत का मामा सरदारसिंह, राघव बख्शी और शाह गुमान चलाते थे। यह ऊपर बतलाया जा चुका है कि उन दिनों प्रतापगढ़ के स्वामी के पास उदयपुर राज्य की तरफ़ से धरियावद् की जागीर थी, जिसके एवज़ में वहां से उदयपुर में सेवा के लिए सेना भेजनी पड़ती थी। सामन्तसिंह की बाल्यावस्था के कारण राजमाता ने उदयपुर में सेना भेजना बंद कर दिया और महारावत ने वय प्राप्त होने पर भी सेना भेजना जारी नहीं किया। उन दिनों उदयपुर राज्य की स्थिति भी अत्यंत कमज़ोर हो गई थी। वि० सं० १८२६ (ई० स० १७७३) में महाराणा अरिसिंह का देहांत होने पर उसके दोनों पुत्रों हम्मीरसिंह (दूसरा) और भीमसिंह के क्रमशः बालक अवस्था में महाराणा होने के कारण राज्यरक्षा के लिए राजपूत- सैनिकों की पूरी आवश्यकता रहती थी। ऐसी स्थिति में महारावत का अपनी सेना उदयपुर में सेवा के लिए न भेजना महाराणा और उसके मुसाहबों आदि को अखरने लगा। वि० सं० १८४० (ई० स० १७८४) में उदयपुर से महाराणा भीमसिंह अपना विवाह करने के लिए दूसरी बार ईडर गया। वहां से पीछा लौटते समय उक्त महाराणा ने डूंगरपुर पर घेरा डाल दिया और फिर वहां से वह बांसवाड़ा की तरफ़ रवाना हुआ। जब माही नदी के तट पर महाराणा की सेना का मुक़ाम हुआ तो बांसवाड़ा के स्वामी महारावल विजयसिंह ने गढ़ी के ठाकुर जोधसिंह की मार्फ़त तीन लाख रुपये दंड के भेजकर महाराणा से सुलह कर ली। उसी स्थान पर महारावत सामंतसिंह ने भी महाराणा की सेवा में अपने वकील के साथ तीन लाख रुपये भेज, धरियावद् की जागीर छोड़ देने का इक़रार लिख भेजा। इसपर महाराणा ने वहां से अपनी राजधानी की ओर प्रस्थान किया और धरियावद की जागीर महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) के वंशधर राणावत रघुनाथसिंह को प्रदान की¹, जिसके वंशजों का अब भी वहां अधिकार है। (१) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में महारावत सामन्तसिंह-द्वारा धरियावद की ३३
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पेशवा बाजीराव बल्लाल के समय से ही मालवा के इलाके पर मर- हठों का आधिपत्य हो गया था । फिर बालाजी बाजीराव को उक्त सूबे पर [होल्कर का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज स्थिर करना] अधिकार रखने की बादशाह की तरफ़ से सनद भी मिल गई, जिसपर उसने मालवा अपने सरदारों में बांट दिया; परंतु इसके पूर्व ही पेशवा तथा उसके सेनापतियों ने आतंक जमाकर मालवा तथा राजपूताने के राजाओं से चौथ की वसूली का सिलसिला शुरू कर दिया था । प्रतापगढ़ राज्य से चौथ की वसूली का स्वत्व होल्कर का रहा, किन्तु पेशवाओं के साथ महारावत गोपालसिंह की मित्रता होने से उसपर चौथ की बावत अधिक दबाव न पड़ा । विभिन्न ख्यातों के लेखों से पाया जाता है कि देव- लिया प्रतापगढ़ राज्य की ओर से पहले शाही दरबार में पंद्रह हज़ार रुपये वार्षिक खिराज के दिये जाते थे । बादशाहत की निर्बलता देख महा- रावत ने वह होल्कर को देना स्वीकार कर लिया था; किंतु होल्कर ने केवल पंद्रह हज़ार रुपये वार्षिक खिराज पर ही संतोष न किया और संभवतः महारावत सामन्तसिंह के समय में दबाव डाल वार्षिक ७२७२० रुपये सालिमशाही लेना स्थिर किया¹, जो अंग्रेज़ सरकार से संधि होने के पूर्व तक वहां से होल्कर को मिलते रहे ।
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जागीर छोड़ देने का उल्लेख तो इसी प्रकार मिलता है, परन्तु उनमें महाराणा को तीन लाख रुपये देने का वर्णन नहीं है । महाराणा भीमसिंह के समय अढ़ाड़ा कवि किशन ने 'भीमविलास'-नामक काव्य की रचना की । उसमें इस घटना का निम्नलिखित वर्णन है— ∙∙∙ऊपरि मुकाम तट महिय आय, घर बंसवार आतंक पाय । रावल विजेस करि मंत्र साम, कर जोध भेज त्रय लक्ख दाम । ताही मुकाम सामंत राव, भेजिय वकील महरान पाव । तिन सीस दंड मनमान थप्प, त्रय लक्ख दाम इक ठाम अप्प । छंडाय धरावद ग्राम लीन, रघुनाथ राव कहूं पटे दीन ∙∙∙॥२६॥ पृ० ११६ । ( १ ) के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६६ । माल्कम की
महारावत सामन्तसिंह २५६ निरन्तर उपद्रवों के कारण उस समय प्रतापगढ़ राज्य की स्थिति संतोषप्रद न थी और महारावत इतना अधिक वार्षिक खिराज होल्कर होल्कर सरकार को खिराज सरकार को देने में सर्वथा असमर्थ था । खिराज की रक़म न देने से बहुधा चढ़ भी जाया करता था, जिसकी वसूली कुंवर दीपसिंह का के लिए होल्कर को अपनी सेना भेजनी पड़ती थी, ओल में जाना जिससे राज्य को बहुत हानि होती थी और अंत में ज़ेवर, सामान, घोड़े आदि देकर किसी तरह होल्कर की सेना को विदा किया जाता था। एक बार होल्कर की सेना के खिराज की वसूली के लिए प्रतापगढ़ राज्य में जाने पर अर्थ-संकट होने से महारावत की तरफ़ से खिराज न दिया जा सका और कई दिन तक होल्कर की सेना प्रतापगढ़ को घेरे रही । अंत में जब तक खिराज की रक़म बेबाक न हो, तब तक के लिए महारावत ने अपने तेरह वर्ष के कुंवर दीपसिंह को होल्कर की ओलो में देना तय किया। फिर होल्कर की सेना दीपसिंह को लेकर इंदौर पहुंची। दो-तीन वर्ष तक उक्त कुंवर होल्कर सरकार के यहां ओल में रहा । फिर वहां से विदा मिलने पर वह प्रतापगढ़ लौटा¹ । होल्कर सरकार का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज का संबंध हो जाने से सिंधिया सरकार का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज आदि का कोई प्रत्यक्ष सिंधिया की सेना का प्रताप- संबंध नहीं रहा था, परंतु उन दिनों भारत में 'जिस- गढ़ को घेरना की लाठी उसकी भैंस' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी और न्याय तथा अन्याय का विचार न कर
"रिपोर्ट ऑन दि प्राविंस ऑव् मालवा एंड एडज्वाइर्निंग डिस्ट्रिक्ट्स" (पृ० २२५) में होल्कर का ७५००० रुपये सालिमशाही वार्षिक खिराज लेने का उल्लेख है। "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६५) में मलहारराव होल्कर का महारावत पर दबाव डाल खिराज की रक़म ७२००० रुपये स्थिर करने का ही उल्लेख है। मलहारराव की मृत्यु वि० सं० १८२३ (ई० स० १७६६) में हुई । उस समय प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी महारावत सालिमसिंह था। ऐसी अवस्था में महारावत सालिमसिंह के समय ही उपर्युक्त रक़म स्थिर होना मानना पड़ेगा । (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६५ ।