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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत उदयसिंह ३०५ ई० स० १८६६ ता० १६ फ़रवरी (वि० सं० १६२५ फाल्गुन सुदि ८) को फ़ोर्ट विलियम (कलकत्ता) में भारत के वाइसरॉय और गवर्नर जेनरल ने इस अहदनामे की तस्दीक़ की१। (दस्तख़त) डब्लयू० एस० सेटनकर, सेक्रेटरी, भारत गवर्नमेंट, वैदेशिक विभाग। अठारह वर्ष बाद इस अहदनामे की एक शर्त में परिवर्त्तन हुआ, जो नीचे लिखे अनुसार है— ई० स० १८६६ ता० १६ फ़रवरी को अपराधियों के सौंपने के संबंध में अंग्रेज़ सरकार एवं प्रतापगढ़ राज्य के बीच जो अहदनामा हुआ था, उसमें अंग्रेज़ी इलाक़े से भागकर प्रतापगढ़ राज्य में शरण लेनेवाले अपराधियों को सौंप देने के लिए जो तजवीज़ हुई थी, वह अनुभव से ब्रिटिश भारत में प्रच- लित क़ानूनी अमल से कम आसान और कम कारगर पाई गई। इसलिए इस इक़रारनामे के द्वारा अंग्रेज़-सरकार तथा प्रतापगढ़ राज्य के बीच स्थिर हुआ है कि भविष्य में अहदनामे की शर्तें, जिनमें अभियुक्तों की सुपुर्दगी की बाबत तजवीज़ हुई है, वह ब्रिटिश भारत से भागकर प्रतापगढ़ राज्य में आश्रय लेनेवाले अपराधियों की सुपुर्दगी के विषय में लागू न होंगी और इस समय ऐसे प्रत्येक मामले में अपराधियों को सौंपने के संबंध में ब्रिटिश भारत में जो क़ानूनी अमल जारी है, उसकी पाबंदी करनी होगी। ई० स० १८८७ ता० २६ अगस्त (वि० सं० १६४४ भाद्रपद सुदि ११) को प्रतापगढ़ में दस्तख़त हुए। (दस्तख़त, हिन्दी भाषा में) [मुहर] महारावत प्रतापगढ़। (दस्तख़त) ए० एफ० पिन्हे, लेफ़्टेनेन्ट, [मुहर] असिस्टेन्ट पोलिटिकल एजेंट, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़। ई० स० १८८८ ता० २८ मार्च (वि० सं० १६४५ द्वितीय चैत्र वदि १) (१) एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४६३-५। ३६