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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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३०८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास फ़ैसला हुआ, जिसमें उक्त गांव पर प्रतापगढ़ राज्य का अधिकार कराया गया और बांसवाड़ा राज्य की ओर से सुंबूत में जो पत्र आदि पेश किये गये वे जाली माने गये । इस घटना से अंग्रेज़ सरकार का बांसवाड़ा के महारावल लछमणसिंह के प्रति बिलकुल विश्वास उठ गया और उसकी बहुत बदनामी हुई । फलस्वरूप अंग्रेज़ सरकार ने छः वर्ष तक के लिए उसकी सलामी की चार तोपें घटा दीं१, जो पीछे ई० स० १८७६ (वि० सं० १९३६) तक न बढ़ीं । वि० सं० १९३२ (ई० स० १८७५ नवंबर) में भारत का वाइसरॉय और गवर्नर जनरल लॉर्ड नॉर्थब्रुक बम्बई से मालवे की तरफ़ होकर उदय- [महारावत का नीमच जाकर] पुर गया । उस समय नीमच के मुक़ाम पर महा- [वाइसरॉय लॉर्ड नॉर्थब्रुक से] रावत उदयसिंह ने जाकर उक्त वाइसरॉय से मुला- [मुलाक़ात करना] क़ात की२ और फ़रवरी ई० स० १८७६ (वि० सं० १९३२) में उसने राजपूताना के एजेंट गवर्नर-जनरल सर ए० सी० लॉयल से भी नीमच जाकर मुलाक़ात की३ । मेवाड़ तथा टोंक राज्य के नींवाहेड़ा परगने में बसनेवाले मोधिये बड़े जरायम पेशा थे । उन दिनों वे अवसर पाकर प्रतापगढ़ राज्य में [मोधियों को महारावत का] जा घुसे और वहां आबाद होने का विचार कर [अपने राज्य में न ठहरने] कुछ चौकीदारों में नौकर हो गये । इसकी इत्तला [देना] महारावत को मिलने पर उसने ऐसे जरायम पेशा लोगों को अपने राज्य में आबाद करने में हानि समझ, वहां उनको न ठहरने दिया४, जिससे उसके राज्य में चोरी-धाड़ों का भय कम हो गया । (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० २४०। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०३६ । अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् बांसवाड़ा स्टेट; पृ० १६५। एचिसन; ट्रीटीज़, एंगेजमेंट्स एण्ड सनद्ज़; जि० ३, पृ० ४४२-६। (२) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५६४ । (३) वही; जि० १, पृ० ५६४ । (४) वही; जि० १, पृ० ५६३-४ ।