राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 372, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत उदयसिंह ३०७ शामिल थे, पांच-पांच वर्ष के लिए क़ैद कर उदयपुर के जेलखाने में रखे गये। अंत में मेवाड़ भील कोर के कमांडैंट मेजर गनिंग ने मौक़े पर जाकर वि० सं० १६३१ (ई० स० १८७५) में उचित फ़ैसला कर दोनों राज्यों की सीमा पर मीनारे खड़े करवा दिये'। इस फ़ैसले से तनाज़े की ३६ वर्ग मील भूमि पर प्रतापगढ़ राज्य का अधिकार बहाल रहा और इस मुक़दमे में प्रतापगढ़ राज्य के कामदार ओंकारलाल व्यास, मोतमिद अमृतराव दक्षिणी तथा बड़ा सेलारपुरा के ठाकुर विशनसिंह की कारगुज़ारी अच्छी रही, जिसकी मेजर गनिंग ने महारावत के पास प्रशंसा लिख भेजी। इसी प्रकार एक दूसरा झगड़ा प्रतापगढ़ राज्य के सांडनी गांव के नील के पठार नामक खेतों के सम्बन्ध में बांसवाड़ा राज्य के सेमलिया पट्टे के सूरजपुरा गांव के बीच वि० सं० १९२६ (ई० स० १८७२) में उत्पन्न हुआ। उसमें भी बांसवाड़ावालों ने अपनी सेना भिजवाकर प्रतापगढ़ राज्य के दो आदमियों को मार डाला। उसका फ़ैसला ई० स० १८७४ ता० १६ सितम्बर (वि० सं० १६३१ भाद्रपद सुदि ५) को मेवाड़ के असिस्टेन्ट पोलि- टिकल एजेंट पारसी फ़्रामजी सीकाजी ने, जो बांसवाड़ा में नियत था, किया। उसके अनुसार नील के पठार के क्षेत्रों का अधिकार प्रतापगढ़ राज्य का स्वीकार किया गया और सांडनी तथा सूरजपुरा गांव की सीमाएं निर्धारित कर मीनारे खड़े करवा दिये गये। इस मुक़दमें में महारावत के कामदार ओंकारलाल व्यास, मोतमिद शाह जोधकरण और अर्जुनसिंह की कार- गुज़ारी अच्छी रही। बांसवाड़ा राज्य ने प्रतापगढ़ राज्य के अजंदा गांव को वि० सं० १६१७ (ई० स० १८६०) में बलपूर्वक दबा लिया था, जिसका मुक़दमा महारावत दलपतसिंह के समय से ही चल रहा था। उसका भी उन्हीं दिनों (१) ज्वालासहाय; वक़ाये राजपूताना; जि० १, पृ० ५२८ तथा ५४७ । उक्त पुस्तक में प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से इस झगड़े में मारे जानेवाले व्यक्ति की संख्या २६ और घायलों की ५४ दी है। "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०३६) में बांसवाड़ा के कामदार चिमनलाल कोठारी पर दस हज़ार रुपये जुरमाना होने का उल्लेख है।