भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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९८ रामायणमीमांसा चतुर्थ “नात्र शङ्का त्वया कार्या प्रतीच्छेमां महाद्युते । कृतं त्वया महत्कार्यं देवानाममरप्रभ ।।’’ ३५ ।। तुम सीता के सम्बन्ध में किञ्चिन्मात्र भी शङ्का मत करो। हे महाद्युते ! सीता को ग्रहण करो। हे अमरप्रभ ! तुमने देवताओं का महान् कार्य सम्पन्न किया है। दशरथ उवाच— “प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पिता दशरथोऽस्मि ते । अनुजानामि राज्यञ्च प्रशाधि पुरुषोत्तम ।।’’३६।।१ महाराज दशरथ ने कहा—वत्स, मैं तुम्हारा पिता दशरथ हूँ। मैं आज्ञा देता हूँ, सीता को ग्रहण करो और राज्य का प्रशासन भी करो। राम ने पिता एवं देवताओं का अभिवादन किया। अविन्ध्य एवं त्रिजटा को वरदान दिया। ब्रह्मा ने राम से वरदान माँगने को कहा। राम ने सदा धर्म में स्थिति और रण में अपराजय एवं रण में मारे गये वानरों का पुनर्जीवन माँगा। सीता ने भी हनुमान् को वर प्रदान किया। पुत्र ! राम की कीर्ति के साथ तुम्हारा अनन्त जीवन होगा और मेरे