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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

९८ रामायणमीमांसा चतुर्थ “नात्र शङ्का त्वया कार्या प्रतीच्छेमां महाद्युते । कृतं त्वया महत्कार्यं देवानाममरप्रभ ।।’’ ३५ ।। तुम सीता के सम्बन्ध में किञ्चिन्मात्र भी शङ्का मत करो। हे महाद्युते ! सीता को ग्रहण करो। हे अमरप्रभ ! तुमने देवताओं का महान् कार्य सम्पन्न किया है। दशरथ उवाच— “प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पिता दशरथोऽस्मि ते । अनुजानामि राज्यञ्च प्रशाधि पुरुषोत्तम ।।’’३६।।१ महाराज दशरथ ने कहा—वत्स, मैं तुम्हारा पिता दशरथ हूँ। मैं आज्ञा देता हूँ, सीता को ग्रहण करो और राज्य का प्रशासन भी करो। राम ने पिता एवं देवताओं का अभिवादन किया। अविन्ध्य एवं त्रिजटा को वरदान दिया। ब्रह्मा ने राम से वरदान माँगने को कहा। राम ने सदा धर्म में स्थिति और रण में अपराजय एवं रण में मारे गये वानरों का पुनर्जीवन माँगा। सीता ने भी हनुमान् को वर प्रदान किया। पुत्र ! राम की कीर्ति के साथ तुम्हारा अनन्त जीवन होगा और मेरे

पञ्चम अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित दशरथ जातक दशरथ जातक के अनुसार बुद्धदेव राजा दशरथ श्रीवाराणसी में धर्मपूर्वक राज्य करते थे । उनकी ज्येष्ठा महिषी की तीन सन्तानें थीं । दो पुत्र रामपण्डित और लक्ष्मण एवं एक पुत्री सीता ( सीतादेवी ) । इस महिषी के पश्चात् राजा ने एक दूसरी को ज्येष्ठा के पद पर नियुक्त किया । उसके भी एक पुत्र ( भरत कुमार ) उत्पन्न हुआ । राजा ने उसी अवसर पर उसको वर दिया । तब भरत की अवस्था सात वर्ष की थी । रानी ने वरस्वरूप अपने पुत्र के लिए राज्य माँगा; पर राजा ने स्पष्ट इनकार कर दिया । लेकिन जब रानी पुनः पुनः इसके लिए अनुरोध करने लगी तब राजा ने उसके षड्यन्त्रों के भय से अपने दोनों पुत्रों को बुलाकर कहा—'यहाँ तुम्हारे रहने से अनर्थ होने की सम्भावना है, किसी अन्य राज्य या वन में जाकर रहो । मेरे मरने के बाद लौटकर राज्य पर अधिकार प्राप्त करो ।' राजा ने ज्योतिषियों से अपने मरने की अवधि जानकर कहा—पुत्रो, बारह वर्ष बाद आकर छत्र को उठाना । पिता की वन्दना कर दोनों भाई जानेवाले ही थे कि सीतादेवी भी पिता से बिदा लेकर उनके साथ हो ली, तीनों चले । तीनों के साथ और भी बहुत से लोग चल पड़े थे; उन सबको लौटाकर तीनों हिमालय पहुँच गये और वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगे । नौ वर्षों के बाद दशरथ पुत्र-शोक से मर गये । रानी भरत को राजा बनाने में असफल रही, क्योंकि अमात्य और भरत भी इसका विरोध करते रहे । तब भरत चतुरङ्गिणी सेना लेकर राम को लाने के उद्देश्य से वन गये । उस समय राम अकेले ही थे । भरत उनसे पिता के देहान्त का सारा समाचार कहकर रोने लगे । रामपण्डित न तो शोक करते हैं, न रोते हैं— “रामपण्डितो नैव शोचति न रोदिति” सन्ध्यासमय लक्ष्मण और सीता लौटते हैं । पिता का मरण सुनकर दोनों रोने लगे । इसपर रामपण्डित ने उनको धैर्य देने के लिए अनित्यता का धर्मोपदेश किया । उसे सुनकर सबों का शोक मिट जाता है । बाद में भरत के बहुत अनुरोध करने पर भी रामपण्डित ने यह कहकर वन में रहने का निश्चय प्रकट किया कि मेरे पिता ने मुझे बारह वर्ष पर्यन्त वन में रहने का आदेश दिया था । अभी मैं लौटकर उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकूँगा, अतः तीन वर्ष के बाद लौट आऊँगा । जब भरत भी शासनाधिकार अस्वीकार कर देते हैं, तब रामपण्डित ने अपनी पादुकाएँ देकर कहा कि मेरे आने तक ये शासन करेंगी । पादुकाओं को लेकर भरत, लक्ष्मण और सीता अन्य लोगों के साथ वाराणसी लौट आये । अमात्य इन पादुकाओं के आदेश से राज्यकार्य करते थे । अन्याय होते ही 'पादुकाएँ एक दूसरे पर आघात करती थीं 'परिहणन्ति' और ठीक निर्णय होने पर शान्त रहती थीं । तीन वर्ष व्यतीत होने पर रामपण्डित लौटकर अपनी बहन सीता से विवाह करते हैं एवं १६ हजार वर्ष तक राज्य करने के बाद स्वर्ग चले जाते हैं ।

बुद्धदेव ने कहा कि पूर्वकाल में 'शुद्धोदन ही दशरथ थे, महामाया (बुद्धमाता) राम की माता थी, यशोधरा (राहुल की माता) सीता थी, आनन्द भरत थे और मैं राम था। अनामक जातक ऐसा ही एक अनामक जातक है। तीसरी शती ई० में अनामक जातक का चीनी अनुवाद हुआ है। इस जातक में किसी भी पात्र के नाम का उल्लेख नहीं है, लेकिन राम और सीता का वनवास, सीताहरण, जटायु का वृत्तान्त, वाली और सुग्रीव का युद्ध, सेतुबन्ध, सीता की अग्निपरीक्षा आदि के संकेत मिलने हैं। इसके अनुसार राम की विमाता कैकेयी के कारण पिता द्वारा वनवास नहीं दिया जाता, किन्तु वे अपने मामा के आक्रमण की तैयारियां सुनकर स्वेच्छा से राज्य छोड़ देते हैं। वाली के वध का वृत्तान्त भी इसमें बदल गया है। राम के धनुषबाण को देखते ही वाली भयभीत होकर भाग जाता है। शायद बोधिसत्त्व राम के द्वारा वाली का वध उचित नहीं समझा गया हो। उसका सारांश निम्नरोक्त है-- एक समय बोधिसत्त्व एक महान् राजा हुआ। वह सदा ही दान, प्रियवचन, न्याय तथा समदर्शिता से सभी जीवों की रक्षा करता था। उसका मामा भी राजा था। वह लोभी, निर्लज्ज, निर्दय तथा दुष्ट था। उसने बोधिसत्त्व का राज्य छीन लेने के लिए सेना तैयार की। बोधिसत्त्व के अमात्यों ने भी सेना तैयार की। सेना का निरीक्षण करके बोधिसत्त्व अपने स्वार्थ के लिए असङ्ख्य मनुष्यों का जीवन नष्ट करना ठीक नहीं यह सोचकर, राज्य छोड़कर वन चला गया। मामा ने राज्य पर अधिकार कर लिया। बोधिसत्त्व ने वही वन में अपनी रानी के साथ निवास किया। एक दुष्ट नाग ने छद्म से उस समय रानी का हरण कर लिया जिस समय बोधिसत्त्व जङ्गल में फल लेने के लिए गया था। एक पक्षी ने उस दुष्ट नाग का मुकाबला किया। नाग ने पक्षी को मारा और उसका दाहिना पङ्ख तोड़ डाला और स्वयं समुद्र में स्थित अपने द्वीप में चला गया। राजा फल लेकर लौटा, रानी को न पाकर वाण लेकर रानी की खोज में इधर उधर घूमने लगा। एक नदी के स्रोत पर पहुँच कर राजा ने एक बन्दर को देखा, जो बड़ा उदास था। पूछने पर उस बन्दर ने कहा—मैं एक राजा था, मेरे चाचा ने मेरा राज्य छीन लिया है। अब मेरा कोई साथी नहीं रहा। राजा ने भी अपना वृत्तान्त सुनाया। दोनों ने परस्पर सहायता के लिए वचनबद्ध होकर मैत्री कर ली। दूसरे दिन बन्दर ने अपने चाचा से युद्ध किया। राजा ने धनुष में बाण का सन्धान किया। जिसे देखते ही बन्दर का चाचा डरकर भाग निकला। बन्दर ने अपने साथियों को रानी खोजने के लिए भेजा। बन्दरों ने एक पक्षी देखा। उसने बताया कि नाग ने रानी को चुराया है। कपिराज ने अपनी सेना को समुद्रपार जाने में असमर्थ पाया। इन्द्र ने छोटे बन्दर का रूप धारण कर कहा—"प्रत्येक बन्दर को पर्वत का एक टुकड़ा लाने की आज्ञा दो। इस प्रकार समुद्र एक मार्ग बन जायेगा और आप द्वीप में पहुँच जायेंगे।" बन्दरों ने ऐसा ही करके समुद्र पार किया और नागद्वीप को घेर लिया। नाग ने एक विषैला घना कुहरा उत्पन्न किया जिससे सभी पृथ्वी पर गिर पड़े। छोटे बन्दर ने एक दैव ओषधि सबकी नाकों में लगायी जिससे सब स्वस्थ हो गये। नाग ने आँधी और बादलों से सूर्य को छिपा लिया। बिजली चमकने लगी। छोटे बन्दर ने बताया कि बिजली ही नाग है। राजा ने एक बाण से नाग को मार डाला। छोटे बन्दर ने रानी को मुक्त किया एवं राजा अपने मामा का देहान्त सुनकर अपने देश चला गया। राजा ने रानी से कहा—"पति से अलग दूसरे के घर में निवास करने पर लोग स्त्री के आचरण पर सन्देह करते हैं। तुम्हें स्वीकार करने में परम्परा के अनुसार कहाँ तक औचित्य है?"

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०१ रानी ने कहा—"मैं एक नीच की गुफा में रही थी तब भी मैं उसमें पङ्कज-पत्र की तरह निर्लेप रहो हूँ । यदि मुझमें सतीत्व है, तो पृथ्वी फट जाय ।" पृथ्वी फट गयी । रानी ने कहा, "मेरा सतीत्व प्रमाणित हुआ ।" राजा और रानी के प्रभाव से सब वर्ण अपने-अपने धर्म का पालन करने लगे । बुद्ध ने भिक्षुओं से कहा—"तब मैं राजा था, गोपा रानी थी, देवदत्त मामा था और मैत्रेय इन्द्र था । बोधिसत्त्व के आचरण में क्षान्ति की पारमिता असीम है ।" दशरथ-कथानक चीनी भाषा में अनूदित दशरथ-कथानक में कहा गया है कि प्राचीनकाल में, जब कि मनुष्य की आयु चार हजार वर्ष की होती थी, जम्बूद्वीप में एक दशरथ नाम के राजा राज्य करते थे । उनकी महिषी के राम नाम से एक पुत्र हुआ, दूसरी से लक्ष्मण पुत्र हुआ । राम में नारायणीय शक्ति थी । तीसरी रानी से भरत और चौथी रानी से शत्रुघ्न उत्पन्न हुए । तीसरी रानी पर राजा का अत्यधिक प्रेम था । एक दिन राजा ने कहा—"तुम्हारी किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिए मैं अपना सम्पूर्ण धन और कोष देने में संकोच नहीं करूँगा ।" रानी ने कहा—"इस समय मुझे कोई आवश्यकता नहीं है ।" राजा बीमार पड़े और उन्होंने राम का अभिषेक कराया । छोटी रानी ने ईर्ष्या वश कहा—"मैं आपके दिये हुए वर की पूर्ति चाहती हूँ । मैंने दो वर पाये हैं । १ से राम गद्दी से उतार दिये जाएँ और रसरे से मेरे पुत्र का राज्याभिषेक किया जाए ।" यह सुनकर राजा दुःखित हुए । राजधर्म के अनुसार वे अपने वचन को तोड़ना नहीं चाहते थे । इस समय लक्ष्मण ने राम से अपनी शक्ति और साहस दिखाने की प्रार्थना की । राम ने कहा—"अपने पिता की आज्ञा भङ्ग कर पुत्र पितृभक्त नहीं कहला सकता ।" दशरथ ने दोनों पुत्रों को बनवास दिया । बारह वर्ष बाद लौटने की आज्ञा दी । भरत उस समय विदेश में थे । दशरथ की मृत्यु के बाद लौटे । उन्हें अपनी माता के कार्यों से घृणा हो गयी । वे सेना के साथ उस पर्वत पर गये, जहाँ राम निवास करते थे । भरत ने राम से कहा—"मैं आपसे लौटने और राज्य-भार ग्रहण करने की प्रार्थना करता हूँ ।" राम ने कहा, "वनवास के लिए पिता की आज्ञा हो चुकी है । उसे तोड़ने पर मैं आज्ञाकारी पुत्र नही कहलाऊँगा" तब भरत ने राम की खड़ाऊँ माँगीं और अयोध्या लौट गये । खड़ाऊओं को राज्य-सिंहासन पर रखकर भरत शासन की देखभाल करने लगे । प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल पादुकाओं की पूजा करते थे और उनसे आज्ञा लेते थे । अवधि पूरी होने पर राम अपने देश को लौट आये । भरत के बहुत आग्रह करने पर उन्होंने राज्यसिंहासनाधिकार स्वीकार किया''''इत्यादि इत्यादि । वस्तुतः बौद्ध निरीश्वरवादी होते हैं । उनके यहाँ ईश्वर एवं वेद तथा वेदोक्त धर्म दोनों ही अमान्य हैं; परन्तु लोकप्रिय होने के कारण उनके अनुयायी भी रामचरित्र की ओर आकृष्ट होते थे । वाल्मीकिरामायण आदि में प्रवृत्ति होने से ईश्वर और वेद में उनकी प्रवृत्ति हो सकती थी । अतएव उन्होंने रामायण को ही विकृत करके किसी न किसी रूप में रामचरित्र अपने क्षेत्र में प्रचारित किया । साथ ही उसके माध्यम से सनातनियों और वैदिकों में राम के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करके अपने धर्म की ओर आकृष्ट करना भी उनका लक्ष्य था । अतः वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध अंश अनादरणीय ही हैं । बौद्धों में वेदादि शास्त्र के प्रामाण्य की मान्यता नहीं थी । इसी लिए सीता को राम की भगिनी कहा गया है और भाई बहन के विवाह का समर्थन किया गया है ।

१०२ रामायणमीमांसा पञ्चम राम की कहानी राम की जबानी राम की कहानी राम की जबानी नाम की पुस्तक में भदन्त आनन्द कौसल्यायन ने एक आधुनिक नास्तिक विचारवाले युवक के रूप में राम को प्रस्तुत कर वाल्मीकि के वचनाभासों द्वारा अनेक प्रकार की दुःशङ्काएँ पैदा करने का प्रयत्न किया है। पूर्वोक्त दशरथजातक में श्रीसीता को राम की बहन बनाने का प्रयास किया गया है। वैसे संसार में अनेक व्यक्ति एवं अनेक घटनाएँ होती हैं। उनमें किसी का नाम राम हो जाय, या किसी की कुछ घटनाएँ भी वैसी हो जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं है। परन्तु अनादि अपौरुषेय मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदों, उनके अङ्गों और उपाङ्गों एवं तदनुसारी रामायण, पुराणों, उपपुराणों, धर्मशास्त्रों, तन्त्रों एवं आगमों के अनुसार श्रीराम अनन्तब्रह्माण्डनायक परात्पर ब्रह्मस्वरूप ही हैं। वही कृष्ण, विष्णु आदि शब्दों से भी व्यवहृत होते हैं। उनके मर्यादापुरुषोत्तम-स्वरूप के सभी चरित्र आदर्श चरित्र हैं। वेदादि शास्त्रों के अनुसार ही उनके सब चरित्र हैं। सीता सच्चिदानन्द ब्रह्मस्वरूपिणी हैं। अवतार-लीला में वे जनकनन्दिनी, श्रीदशरथ की पुत्रवधू एवं श्रीरामचन्द्रजी की पट्टमहिषी हैं। जनता जनार्दन के लिए श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों महापुरुष न देव हैं, न मानव, बल्कि भगवान् और विष्णु के अवतार हैं। साथ ही यह भी समझना चाहिए कि वे केवल जनता की भावनामात्र नहीं, किन्तु प्रबल प्रमाण वेदादि शास्त्रों से सिद्ध हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने अपनी जीवनी स्वयं नहीं लिखी। यह लेखक के अनुसार भी लेखक की अपनी कल्पना ही है। कल्पना में वास्तविकता नहीं होती, यह स्पष्ट ही है। आपका यह कथन सही नहीं है कि तुलसीदास के लिखे 'रामचरितमानस' से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने अपने बारे में महाकवि वाल्मीकि द्वारा उपस्थित की गयी सामग्री को प्रमाण मानकर अपनी कहानी स्वयं लिखने का निश्चय किया है। आपकी उक्त कल्पना निराधार एवं निष्प्रमाण है। तुलसीदासजी ने जो कुछ भी लिखा है वह वेद, रामायण, पुराणादि से सम्मत ही है। उक्त पुस्तक में लेखक के काल्पनिक राम ने तो वाल्मीकिरामायण को भी प्रामाणिक नहीं माना है। वाल्मीकिरामायण में विशेषतः लङ्काकाण्ड में ब्रह्मादि देवताओं ने श्रीराम को परब्रह्मस्वरूप कहा है, पर वह लेखक के काल्पनिक राम को कहाँ मान्य है? असल में वेद-शास्त्र विरोधियों को तुलसीदासजी के रामचरितमानस से भयङ्कर उद्वेग होता है, क्योंकि उसके द्वारा वेद और ईश्वर का विश्वास सुदृढ़ होता है। इसलिए लेखक रामचरितमानस के प्रभाव को न्यून करने के लिए उसे धुन्ध की संज्ञा देकर अपने हृदय के कालुष्य को प्रकट करते हैं, पर आपकी मनोवाञ्छा की पूर्ति नहीं हो सकती। रामचरितमानस का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता ही जायगा। कौसल्यायन आगे कुछ खुलकर स्पष्ट ही कहते हैं—"लेखक के राम, तुलसी के भगवान् राम तो नहीं हैं। वे बहुत कुछ वाल्मीकि के श्रीराम ही हैं।" आगे अपना हृदय व्यक्त करते हुए लिखते हैं—‘‘वाल्मीकि के राम की अपेक्षा भी वे कुछ भिन्न हैं, कुछ विशिष्ट हैं।" पर यदि लेखक के काल्पनिक राम वाल्मीकिरामायण के राम से भिन्न हैं, तो उनकी जीवनी का आधार वाल्मीकिरामायण हो भी कैसे सकता है? आगे लेखक अपनी छद्ममयी नीति के अनुसार कहता है कि—'वाल्मीकिजी सत्य के उपासक थे। उन्होंने अधिक से अधिक यथार्थ का चित्रण किया है।' इसका आन्तर अभिप्राय यह है कि उसमें अयथार्थता है। श्री- कौसल्यायन कहते हैं—‘‘ब्राह्मण उस याज्ञिक युग में क्या-क्या कुछ नहीं करते थे।" ये ही बौद्धवाद के संस्कार हैं।

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०३ ब्राह्मण याज्ञिक वेदप्रमाण के अनुसार यज्ञ, यागादि करते थे । मनमानी कुछ भी नहीं करते थे । यहाँ कौसल्यायन का वैदिक यज्ञ के हिंसामय प्रतीत होने वाले विधानों पर व्यङ्ग्य है । 'श्रीराम के भोजन में माँस और सुरापान अंग रहा था। आज के वैष्णव पाठक को यह समझना चाहिए कि उसके विष्णु के अवतार भगवान् राम भले ही वैष्णवयुग की उपज हों; किन्तु स्वयं श्रीराम वैष्णव युग की उपज नहीं। वे जिस युग की विभूति थे, उसका प्रतिनिधित्व करना स्वाभाविक था।' यह विचार भी अविवेकमूलक है। श्रीराम विष्णु या विष्णु के अवतार थे—यह शाश्वत सिद्धान्त है, वे किसी युग की उपज नहीं थे । वेदवेद्य श्रीराम के अवतीर्ण होने पर साक्षात् वेद ही रामायण के रूप में प्रकट हुए थे । श्रीराम सर्वान्तरात्मा हैं, अतः विभिन्न युगों के अनुरूप उनके भोजन में भेद हो सकता है। पर सर्वदा ही मर्यादापुरुषोत्तम के व्यवहार में भी वेद का नियन्त्रण तो रहता ही है। बुद्ध की अहिंसा का बिल्ला बाँधनेवाले बौद्धों के बुद्ध तो किसी धोबिन के द्वारा दत्त शूकरमांस भक्षण करके मृत्यु को प्राप्त होते हैं। क्या कौसल्यायन बतायेंगे कि उन्होंने किस युग का प्रतिनिधित्व किया था। प्रियावियोग में राम के व्याकुल होने आदि की नरलीला भी ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य होकर मुक्तिका हेतु बनती है । गीता कहती हैं कि भगवान् के दिव्य जन्म और कर्म को जो जानता है वह जन्म और कर्म के बन्धनों से मुक्त हो जाता है— “जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥” (गी० ४।९ ) अपने समर्थन में कौसल्यायन ने एक जैन श्लोक उद्धृत किया है— “पक्षपातो न मे वीरे न द्वेषः कपिलादिषु । युक्तिमद्वचनं यस्य तस्य कार्यः परिग्रहः ॥” अर्थात्—मेरा महावीर में पक्षपात नहीं एवं कपिलादि में द्वेष नहीं है । जिसका भी वचन प्रकृतिसम्मत, युक्तियुक्त हो उसका ही परिग्रह करना चाहिये । पर यदि कौसल्यायन सचमुच उक्त वचन का आदर करते हैं, तो नैरात्म्यवाद तथा अनेकान्तवाद को त्याग कर उन्हें अनादि अपौरुषेय स्वतःसिद्ध वेदों के अनुसार ही धर्म, ब्रह्म की शरण ग्रहण करनी चाहिये । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं—"जैसे कोई नहीं जानता कि उसका जन्म कब और कहाँ हुआ वैसे ही मैं भी नहीं जानता कि मेरा जन्म कैसे, कब और कहाँ हुआ ?” परन्तु यह गीता के विरुद्ध है । गीता के भगवान् कहते हैं—"हमारे और तुम्हारे कई जन्म हुए, पर उन सबको मैं जानता हूँ । हे परन्तप ! तुम नहीं जानते हो"— “बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥” (गी० ४।५ ) कौसल्यायन अपने जन्म के बारे में कहते हैं—"मैंने सुना है कि जब मेरे पिता सन्तानोत्पत्ति की ओर से निराश हो गये, तब उन्होंने वसिष्ठ के सहयोग से 'अश्वमेध यज्ञ' किया । राजा रोमपाद के जामाता ऋष्यशृङ्ग बालब्रह्मचारी थे । वे वेश्याओं के द्वारा लुभाकर अपनी कन्या शान्ता के लिए वररूप में प्राप्त किये गये थे । यज्ञ में ३०० पशु यज्ञस्तम्भों में बाँधे गये थे । उनमें अश्वमेध का यज्ञीय अश्व भी था । मेरी माता कौशल्या ने धर्म की इच्छा से एक रात उस अश्व के निकट गुजारी थी । इससे पहले भली प्रकार अश्व की परिचर्या करके तीन तलवारों से उसका स्पर्श किया था । इनके बाद याज्ञिकों ने मेरे पिता की अन्य दो भार्याओं को भी घोड़े के साथ नियोजन

१०४ रामायणमीमांसा पञ्चम किया था। मेरी दूसरी माता सुमित्रा वैश्य जाति की थी और मेरी तीसरी माता ( कैकेयी ) शूद्र जाति की थी । तीनों को महिषी, वावाता और परिवृत्ति कहा जाता था ।” पाठकों को मालूम होना चाहिये कि यह कथन वाल्मीकिवर्णित मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सम्बन्ध का नहीं है । यह तो मिथ्या वासुदेव के समान मिथ्या काल्पनिक, नास्तिक बौद्ध राम का या आनन्द कौसल्यायन का ही कथन है । वास्तविक राम ने कभी अपनी कहानी नहीं लिखी है। जैसे मिथ्या वासुदेव पौण्ड्रक नकली दो भुजाएँ तथा नकली गरुड़ बनाकर वासुदेव बन गया था, वैसे ही कौसल्यायन नकली मनगढ़न्त कहानी बनाकर नकली बौद्ध नास्तिक राम बन गये हैं। अश्वमेध की इष्टि के याजक महर्षि वसिष्ठ कोई अन्य नहीं । पुत्रेष्टि के याजक ऋष्यशृङ्ग नहीं ऋष्यशृङ्ग थे । वे महात्मा बालब्रह्मचारी थे । वेश्याएँ नहीं, दिव्य अप्सराएँ उन्हें तपोवन से लायी थीं । वे अपने को ऋषि बताकर उनको रोमपाद के राज्य में अनावृष्टि दूर करने के लिए लाने में समर्थ हो गयीं । राजा ने उनके पिता की

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०५ फिर अयोध्याकाण्ड में भी भरत मातुलकुल गये और अयोध्या आते समय बहुत से राजकीय उपहार उनके साथ भेजे गये । उन महाराज कैकेय की पुत्री कैकेयी को शूद्रा एवं परिवृत्ति कहना साहस ही है । अन्य रामायणों के अनुसार सुमित्रा का वैश्यपुत्री होना भी अप्रामाणिक है । रघुवंश ९।१७ के अनुसार सुमित्रा मगधनरेश की पुत्री थीं । यहाँ वावाता और परिवृत्ति दोनों शब्द कृताभिषेका महिषी से भिन्न क्रमेण द्वितीय तथा तृतीय भार्याओं के ही बोधक हैं। इसी दृष्टि से सुमित्रा को वावाता और कैकेयी को परिवृत्ति कहा गया है । “राज्ञां हि विविधाः स्त्रिय उत्तममध्यमाधमजातियाः ।” इत्यादि ऐतरेयब्राह्मण तृतीय पञ्चिका के वावाता शब्द के भाष्य के अनुसार यदि वैश्य और शूद्र जाति की राजवल्लभा पत्नियाँ हों तो उनका भी नियोजन होता है; परन्तु अनिवार्यरूप में वैसा अपेक्षित नहीं है। अतएव श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ में कृताभिषेका महिषी सीता की काञ्चनी प्रतिमा का ही उपयोग हुआ था। वहाँ अन्य जातीया भार्याओं का प्रसङ्ग ही नहीं आया। काञ्चनी प्रतिमा से भी यज्ञ सम्पन्न होना वैध है, यह इसी ग्रन्थ में अन्यत्र देखिये । इसी तरह अन्यत्र भी कौसल्यायन ने वाल्मीकि का नाम लेकर उनका अभिप्राय न समझकर या जान- बूझकर श्लोकों का भ्रामक अर्थ करके जनता को भ्रान्त करने का प्रयत्न किया है । 'हे मिथ्याप्रतिज्ञ ! तू शूर वीर हो ।' (रामकहानी पृ० ४) यह अर्थ भी इसी प्रकार का है। मूल में संबोधन रूप में 'मिथ्याप्रतिज्ञ' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है— "यदीदं ते क्षमं राजन् गमिष्यामि यथागतम् । मिथ्याप्रतिज्ञः काकुत्स्थ सुखी भव सुहृद्वृतः ॥” ( वा० रा० १।२१।३ ) अर्थात् यदि प्रतिज्ञाहानिरूप दोष आपको सह्य है तो मैं जाता हूँ । आप मिथ्याप्रतिज्ञ होकर अपने सुहृदों के साथ सुखी हों । 'विश्वामित्र के कहने से हमने ताड़का का वध कर डाला । आखिर हम क्या करते, हमसे चलते समय पिताजी ने कहा था कि विश्वामित्र की हर आज्ञा का पालन करना । हम अपनी बुद्धि से विचार करने में स्वतन्त्र न थे।' (रामकहानी पृ० ५१ ) यह भी मिथ्यावादी बौद्धों के मिथ्या भाषण का ही नमूना है, क्योंकि वाल्मीकीयरामायण में ऐसा उल्लेख नहीं है। श्रीराम ने मारीच को मारा नहीं, किन्तु 'मानव परमास्त्र' से सौ योजन दूर डाल दिया था । सुबाहु तथा अन्य बहुत से राक्षसों का वध कर वे ऋषियों द्वारा पूजित एवं प्रशंसित हुए थे । हाँ, अयोध्याकाण्ड में जब जाबालि ने राम को लौटाने के लिए धर्मविरुद्ध नास्तिकों जैसी बाते करते हुए कहा—"कौन किसका बन्धु है । किसको किससे क्या लेना है । प्राणी अकेला ही उत्पन्न होता है। जो उसमें माता- पिता की बुद्धि करता है वह उन्मत्त ही है । आप अपने पित्र्य राज्य को त्यागकर बहुकण्टक कुत्सित पथ का आश्रयण कर रहे हैं । जो लोग धर्मपरायण होते हैं, उनके लिए ही हम सोचते हैं । वे यहाँ भी दुःख पाते हैं। अन्त में विनाश को प्राप्त हो जाते हैं आदि । ब्राह्मण आदि अन्य के भोजन करने से यदि देवताओं तथा पितरों को कुछ मिल सकता हो, तब तो प्रवासी सम्बन्धियों को घर में ही दिया हुआ अन्न आदि मार्ग में मिल जाना चाहिए, फिर मार्गार्थ सामग्री-सङ्कलन व्यर्थ होगा। अतः देवताओं तथा पितरों सम्बन्धी अष्टका श्राद्ध केवल अन्न का अपव्ययमात्र है। यज्ञादि में देवपूजा १४

१०६ रामायणमीमांसा पञ्चम करो, अन्नादि-दान करो, चान्द्रायणादि व्रत करो, संन्यास करो इत्यादि वैदिकाचार का प्रतिपादन करनेवाले वेदादि ग्रन्थों का निर्माण मेधावियों ने दानादि प्राप्त करने के लिए तथा देवताओं को वश में करने के लिए ही किया है। पामरों की प्रतारणा कर धनग्रहण करने का यह सब धन्धामात्र है। परलोक आदि कुछ भी नहीं है। प्रत्यक्ष को अपनाओ परोक्ष का त्याग करो।" तब ऐसी बातों को सुनकर राम ने कहा था—'आपका यह सब उपदेश कर्तव्य के तुल्य प्रतीत होनेवाला अकार्य ही है। पथ्य के तुल्य प्रतीत होने पर भी यह अपथ्य ही है। पापाचारसमन्वित निर्मर्याद पुरुष लोकायत उच्छृङ्खल आचार एवं उच्छृङ्खल दर्शन का अनुगामी होने के कारण सत्पुरुषों में संमान प्राप्त नहीं कर सकता है। वेदानुमत आचाररूप चरित्र ही प्राणी की कुलीनता या अकुलीनता, पवित्रता या अपवित्रता का प्रख्यापन करता है। जिसमें आचार होता है, वही कुलीन एवं पवित्र समझा जाता है। तद्विपरीत अकुलीन एवं अशुचि समझा जाता है। जो आपके उपदेश का अनुसरण करेगा वह आर्य के समान प्रतीत होनेपर भी अनार्य, पवित्रताहीन एवं दुःशील होने पर भी शुचि और शीलवान् जैसा प्रतीत होगा एवं अलक्षण होकर लक्षणवान् सा प्रतीत होगा। यदि मैं आपके द्वारा उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करूँगा एवं धर्मवेश से युक्त होकर शास्त्रोक्त शुभ कर्म को छोड़कर विधिवर्जित क्रिया करूँगा तो अशुभ स्थिति को ही प्राप्त होऊँगा। कार्य-अकार्य का विवेक रखनेवाला कौन समझदार लोकदूषण दुर्वृत्त का आदर करेगा। प्रतिज्ञाहीन वृत्ति का अनुसरण करने पर किस साधन से स्वर्गादि प्राप्त हो सकेगा। आपके द्वारा उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करने से मैं दुर्वृत्त बन जाऊँगा। राजा के दुर्वृत्त होने से प्रजा भी दुर्वृत्त हो ही जाती है। अतः सत्य और आनृशंस्य ही सनातन राजवृत्त है। सत्यात्मक राज्य सत्य में ही प्रतिष्ठित होता है। ऋषि एवं देवता सत्य का ही आदर करते हैं। सत्यवादी ही इस लोक और परलोक में अक्षय फल का भागी होता है। सत्य ही ईश्वर है, सत्य में ही धर्म प्रतिष्ठित है। सत्य से श्रेष्ठ कोई उत्कृष्ट पद नहीं है। सर्पतुल्य अनृतवादी से सबको उद्वेग होता है। दान, यज्ञ, तप, वेद सब सत्य में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए सत्यपरायण होना चाहिये— “दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च। वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत् ॥” (वा० रा० २।१०९।१४) इस कर्मभूमि को प्राप्त कर शास्त्रोक्त कर्म ही करना चाहिये। सैकड़ों क्रतुओं, यज्ञों का अनुष्ठान करके ही शतक्रतु देवराज होकर त्रिदिव के आधिपत्य को प्राप्त हुए हैं। उग्र तप के द्वारा ही ऋषि लोग स्वर्ग गये हैं। सत्य, धर्म, भूतानुकम्पा एवं ब्राह्मण, देवता तथा अतिथियों की पूजा त्रिदिवप्राप्ति के मार्ग है।' अन्त में राम ने कहा—'मैं पिताजी के उस कर्म की निन्दा करता हूँ जिसमें उन्होंने धर्मविमुख विषम- बुद्धिवाले आप जैसे नास्तिक को अपना 'याजक' ऋत्विक् बनाया था। जैसे चोर दण्ड्य होता है वैसे ही बुद्ध आदि नास्तिक भी दण्ड्य हैं। आस्तिक ब्राह्मण को चाहिए कि ऐसे नास्तिकों के सम्मुख न हो, उनसे भाषणादि न करे। तथागत को नास्तिक ही समझना चाहिये। दण्ड देना शक्य हो तो नास्तिक को चोर के तुल्य दण्डित किया जाय, यदि ऐसा सम्भव न हो तो उससे भाषण आदि न किये जायें— “निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद् यस्त्वामगृह्लाद् विषमस्थबुद्धिम। बुद्धथानयेवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम् ॥

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०७ । यथाहि चोरः स तथाहि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि । तस्माद्धियः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात् ॥” (वा० रा० २।१०९।३३,३४) श्रीराम की इन बातों को सुनकर जाबालि ने कहा—"मैं नास्तिक नहीं हूँ। आप को वन से लौटाने के लिये इस प्रकार की बातें मैंने की हैं।" वसिष्ठ ने भी श्रीराम से कहा—'जाबालि लोक की गति, अगति को जानते हैं। नास्तिक नहीं हैं। आप को वन से निवृत्त करने के लिये ही इन्होंने वैसा कहा है।' बुद्धादि नास्तिक भी प्राचीन हैं। कई लोग बुद्ध और तथागत का नाम देखकर वाल्मीकिरामायण का निर्माण गौतम बुद्ध के पश्चात्कालीन मानते हैं, पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि अवतार बुद्ध गौतम बुद्ध से भिन्न ही हैं। जैसे मुख्यलक्ष्मी गृहलक्ष्मी से भिन्न होती हैं वैसे ही बुद्ध भी गौतम बुद्ध से भिन्न हैं। बौद्धों के जातकों का भी यही मत है। लङ्कावतारसूत्र में लङ्कापति रावण को उपदेश करनेवाले भी एक बुद्ध थे। उसी ग्रन्थ में बुद्ध ने अपने पूर्व के अनेक बुद्धों की चर्चा की है। अतएव “द्वे सत्त्वे समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।” के अनुसार परमार्थ एवं संवृत सत्त्व स्वीकार करके ही बुद्धों की धर्मदेशना सिद्ध होती है। यहाँ ‘बुद्धानाम्’ यह बहुवचन निर्देश भी सिद्ध करता है कि बुद्ध अनेक हुए हैं। उन्हीं बौद्ध सिद्धान्तों का पुराणों में भी खण्डन है। भगवान् व्यास के सूत्रों में भी बौद्धमत और जैनमत का खण्डन है। एतावता भी व्यास और गौतम बुद्ध तथा महावीर से प्राचीन हैं। पाणिनि के सूत्र ‘पाराशर्यशिलालिभ्याम्’ (पा० सू० ४।३।११०) में व्यास की चर्चा है। महाभारत, गीता, ब्रह्मसूत्र आदि के रचयिता व्यास पाँच हजार वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, यह कहा गया है। इसी तरह कौसल्यायन ने गङ्गा के गर्भ से धातुओं की उत्पत्ति पर भी अपना कुतर्क श्रीराम के ब्याज से उपस्थित किया है। वे कहते हैं—"यह धातुओं का वर्णन यों ही लालबुझक्कड़ों का वर्णन होगा। क्या कभी किसी के गर्भमल से धातुओं की उत्पत्ति हो सकती है ?” “उत्ससर्ज महातेजाः स्रोतोभ्यो हि तदानघ । यदस्या निर्गतं तस्मात्तप्तजाम्बूनदप्रभम् ।। काञ्चनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम् । ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत ।। मलं तस्याभवत्तत्र त्रपु सीसकमेव च। तदेतद् धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत ।। निक्षिप्तमात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरञ्जितम् । सर्वपर्वतसन्नद्धं सौवर्णमभवद् वनम् ।। जातरूपमिति ख्यातं तदाप्रभृति राघव ॥” (वा० रा० १।३७।१८-२२) प्रसङ्गानुसार शैव तेज को अग्नि ने धारण किया था। अग्नि से गंगा ने उसी तेज को धारण किया था। असह्य होने के कारण गङ्गा के द्वारा त्यक्त वही तेज पारद आदि धातुओं के रूप में परिणत हुआ था। नागेशभट्ट के अनुसार 'ईश्वर का तेज ही पारद है। उत्तम स्त्री के दर्शन से रसेश्वर पारद दो योजन पर्यन्त उच्छलित होकर

१०८ रामायणमीमांसा पञ्चम उसका अनुसरण करता है। आनन्दकन्दतन्त्र में भी ऐसा उल्लेख है। वही पारद विभिन्न योगों से त्रपु, सीसक, सुवर्ण आदि रूप में परिणत होता है।' यद्यपि सामान्य स्त्री-पुरुषों के शुक्र, शोणित से धातुओं का निर्माण सम्भव नहीं है; तथापि शिव-पार्वती का चमत्कार पृथक् ही है। शिव-शक्ति या प्रकृति-पुरुष सम्पूर्ण विश्व के हेतु हैं, चेतन और अचेतन सम्पूर्ण विश्व के कारण वे ही हैं। विद्युत्-प्रकाश की भी ठण्डे और गरम तार के योग से ही अभिव्यक्ति होती है। प्रकाशस्वरूप शिव हैं और विमर्शस्वरूप शक्ति हैं। सम्पूर्ण विश्व अग्नीषोमात्मक है। पारद, सुवर्ण आदि भी सब उसी के परिणाम हैं। इसी वैज्ञानिक दृष्टि- कोण की अभिव्यक्ति के लिये परम कारण शिव और शक्ति के संयोग के अनन्तर ही अग्नि और सोम का संसर्ग हुआ है। गङ्गा सोम का ही प्रतीक हैं। देवताओं की प्रार्थना से भगवान् शिव ने अपना तेज पृथिवी में निक्षिप्त किया । उससे गिरि-काननपूर्ण सम्पूर्ण पृथिवी तप्त हो उठी । तदनन्तर देवताओं ने अग्नि से प्रार्थना की कि तुम वायुसमन्वित होकर रौद्र तेज में प्रवेश करो । वही अग्नि से व्याप्त होकर श्वेत पर्वत हो गया। अग्नि पृथिवी का अभिमानी देवता है, अतः तेज के धारणार्थ पृथिवी में अग्नि का प्रवेश उचित ही था । वायुयुक्त अग्नि के द्वारा चालनपूर्वक प्रवेश से बद्ध होकर शिवधातु का श्वेत पर्वत रूप होना सङ्गत ही है। तेजःप्रवेश से उसी की महिमा से पावक एवं आदित्य के समान बनकर वह सुवर्णमय हो गया। ‘मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।' (गी० १४।३ ) इस गीता वचन में भगवान् ने कहा है कि महत् ब्रह्म मेरी प्रकृति ( योनि ) है। उसमें मैं गर्भाधान करता हूँ और उसी से सम्पूर्ण प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है । ईश्वर का प्रकृति में गर्भाधान सामान्य स्त्री-पुरुषों जैसा नहीं होता; किन्तु प्रकृति में पुरुष का प्रतिबिम्बित होना ही गर्भाधान है। उसी के प्रभाव से जड़ प्रकृति भी चेतनान्वित होकर महदादि प्रपञ्च के निर्माण में सक्षम होती हैं। इस तरह जब प्रकृति पुरुष या शिव शक्ति से ही सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि होती है तब पारद, स्वर्ण, रजत आदि की उत्पत्ति भी उन्हीं से होती है, इसमें सन्देह का अवसर ही नहीं है । "ततो देवाः पुनरिदमूचुश्चापि हुताशनम् । आविश त्वं महातेजो रौद्रं वायुसमन्वितः ।।" ( वा० रा० १।३६।१७ ) राजा सगर की पत्नी सुमति के उदर से एक तुम्बा निकला। उससे साठ हजार पुत्र निकले । धात्रियों ने पुत्रों को घृतकुम्भ में रखकर सबका पोषण किया था। फिर जब आजकल टेस्ट ट्यूब से बच्चे होने लगे हैं तब इन बातों पर क्यों अविश्वास करें । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं- "हम सोचने लगे कि क्या स्वयं विश्वामित्र भी ऐसी बातों में विश्वास कर सकते हैं। अथवा हमारा ही मनोरञ्जन करने के लिए, रास्ता कटने के लिए ऐसी चण्डूखाने की गप्पें हाँक रहे हैं।" परन्तु यह भी उनका प्रमाद ही है, क्योंकि वहाँ कहा गया है कि महाराज सगर ने अपनी दो पत्नियों के साथ भृगुप्रस्रवण गिरि पर सौ वर्ष तक तपस्या की । तप से आराधित होकर महर्षि भृगु ने वर प्रदान किया । पहली पत्नी ने एक वंशकर पुत्र माँगा। दूसरी ने ६० हजार पुत्र माँगे । इस तरह महर्षि के वर के प्रभाव के कारण होनेवाली उक्त घटना सत्य ही है । असम्भव जैसी कोई वस्तु नहीं है । योगसिद्ध महर्षियों के सङ्कल्प के अनुसार प्रकृति नियन्त्रित होती है । जैसे शुक्र के सूक्ष्मकण गर्भस्थ होकर मनुष्यादि रूप में व्यक्त होते हैं । अनेक बार एक साथ ही चार चार, पाँच पाँच सन्तानें भी पैदा हो जाती हैं । शूकरादि प्राणियों की दर्जनों सन्तानें एक समय में ही

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०९ उत्पन्न होती हैं । पक्षियों से अण्डों के रूप में बच्चे उत्पन्न होकर गर्भ से बाहर ही पालित पोषित होते हैं । फिर अगर ६० हजार सन्तानें भृगु जैसे महर्षि के सङ्कल्प से सुरक्षित हो जायें तो आश्चर्य की बात ही क्या है ? पुनश्च जब वैदिक सिद्धान्त में प्रत्यक्ष और अनुमान के समान ही शब्द भी स्वतन्त्ररूप से प्रमाण है तब शब्द प्रमाण से सिद्ध पदार्थ में किसी आस्तिक की विप्रतिपत्ति ही क्यों होगी ? आज के वैज्ञानिक युग में तो ऐसी शङ्का ही उपहासास्पद है । कृत्रिम गर्भाधान और पोषण भी असम्भव नहीं है । आगे कौसल्यायन के काल्पनिक मिथ्या वासुदेव राम कहते हैं—"हमें यह भी बताया गया कि पृथ्वी को खोदने पर सगर-पुत्रों की चार ऐसे गजराजों से भेंट हुई जो पृथ्वी को अपने सिर पर उठाये हुए थे । हमें समझाया गया कि जब गजराज सिर हिलाते हैं तभी भूकम्प होता है । हम सोचने लगे कि पृथिवी तो हाथियों के सिर पर स्थित है, किन्तु स्वयं हाथी किस पर स्थित हैं ? हमें अपनी किसी शङ्का का सन्तोषजनक समाधान मुनि विश्वामित्र से सुनने को नहीं मिला ।” "यदा पर्वणि काकुत्स्थ विश्रमार्थं महागजाः । खेदाच्चालयते शीर्षं भूमिकम्पस्तदा भवेत् ॥” ( वा० रा० १।४०।१५ ) परन्तु यह शङ्का अविवेकमूलक ही है; क्योंकि वहाँ पर आकर्षिणी, विकर्षिणी, धारिणी, पोषणी शक्ति- विशिष्ट चेतन ही गजेन्द्र के रूप में पृथिवी को धारण करते हैं और वे स्वयं स्वप्रकाश स्वप्रतिष्ठ भगवान् में ही प्रतिष्ठित होते हैं । परस्पर आकर्षण से स्थिति आधुनिक लोगों को भी मान्य है । गणपति भगवान् का भी गजानन प्रतीक गणपति अथर्वशीर्ष आदि में वर्णित है । भूमि के भी भीतर होनेवाली रासायनिक प्रक्रिया एवं तन्मूलक विस्फोट आदि भी उन्हीं शक्तियों के परिणाम हैं । प्रतिक्रिया के अनन्तर होनेवाली शान्ति ही उनका उद्देश्य है । इसी तरह कौसल्यायन के राम ने इन्द्र और अहल्या की चर्चा की है । उन्होंने कहा—"गौतम के शाप से अहल्या पत्थर की हो गयी थी । मेरे चरणस्पर्श से वह पूर्ववत् पुनः जीवित हो गयी । ऐसा कहनेवाले के मन में स्त्रीजाति के लिए तनिक भी आदर भाव नहीं रहा होगा । ऐसा कहनेवाले ने स्त्रीजाति के साथ मेरा भी निरादर किया है ।” परन्तु यह मिथ्या ही है । वाल्मीकिरामायण में राम ने वैसा कुछ भी नहीं कहा है । हाँ, वाल्मीकि के राम ने लक्ष्मण के साथ मुनि-पत्नी का चरणस्पर्श किया, यह ठीक है— "राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदा ।” ( वा० रा० १।४९।१७ ) पर साथ ही राम के स्पर्श से वह शापमुक्त हुई और अनेक सहस्रवर्ष तक वायुभक्षण करती हुई निराहार और भस्मशायिनी होकर तप करती रही । यह सब साधारण लोक से विलक्षण बातें तो थीं ही— "इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि । वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी ॥” ( वा० रा० १।४८।२९,३० ) अहल्या ने समाहित होकर अर्घ्य, पाद्य आदि से श्रीराम का पूजन किया । महातेजा गौतम ने भी आकर राम की विधिवत् पूजा की— "गौतमोऽपि महातेजा अहल्यासहितः सुखी । रामं सम्पूज्य विधिवत्तपस्तेपे महातपाः ॥” ( वा० रा० १।४९।२१,२२ )

११० रामायणमीमांसा पञ्चम इससे राम की पूज्यता आदि विशेषताएँ स्पष्टतया विदित होती हैं। अतः किसी कल्प की कथा में अहल्या पाषाण भी हो गयी होगी। जब कि राम ईश्वरावतार हैं ही तब उनके चरणस्पर्श से पापयुक्त गौतमपत्नी का शाप- मुक्त होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अतएव श्रीव्यासदेव के रामाश्रमेध आदि ग्रन्थों में अनेक ऋषियों ने राम को प्रणाम आदि किया ही है। आगे कौसल्यायन के राम वसिष्ठ और विश्वामित्र के सङ्घर्ष की चर्चा करते हुए कहते हैं—"जब विश्वामित्र द्वारा बलात् कामधेनु ले जाने के लिए सेना का प्रयोग किया गया तब वसिष्ठ ने कामधेनु से कहा कि ऐसी सेना उत्पन्न करो जो विश्वामित्र को परास्त कर सके । कामधेनु ने दिव्य शक्ति से पहले शक, काम्बोज तथा यवन आदि जातियों के सैनिकों को उत्पन्न किया। उनकी सहायता से पराजित होकर विश्वामित्र ने कहा कि ब्रह्मबल ही श्रेष्ठ बल है। उसके मुकाबले में क्षत्रियबल तुच्छ है। यदि आपस के कलह में विदेशियों की सहायता लेकर विजय प्राप्त करना ही ब्रह्मबल है, तो क्या ऐसे ब्रह्मबल को भी धिक्कार नहीं है ?" परन्तु यह भी कुचोद्य ही है, क्योंकि प्रकृत में विदेशी सहायता का कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। वहाँ तो स्पष्ट है कि कामधेनु ने ही कहा था—"मुझे राजकर्मचारी दण्डित कर रहे हैं, मैंने क्या अपराध किया जो आपने मुझे त्याग दिया ।” ब्रह्मर्षि ने कहा—"मैं नही त्याग रहा हूँ। वह राजा है, उसके समान मेरे पास बल नहीं है।" कामधेनु ने कहा—"आपके बल के सामने उस राजा का कुछ भी बल नहीं है। ब्रह्मतेजसम्पन्न आप मुझे आज्ञा दें तो मैं विश्वामित्र के बल और दर्प को नष्ट कर सकती हूँ।" इस प्रकार कामधेनु की प्रार्थना पर ही वसिष्ठ ने उसे सेनानिर्माण का आदेश दिया था। सुरभि ने वसिष्ठ के ब्रह्मबल के सहारे अपनी शक्ति से पल्लव, शक आदि का निर्माण किया था। किसी विदेशी से सहायता प्राप्त नहीं की थी। विश्वामित्र के बल से उस बल के नष्ट हो जाने पर पुनः वसिष्ठ ने आज्ञा दी। तब पुनः सुरभि ने हुङ्कार से सूर्यतुल्य काम्बोजों का निर्माण किया, अपने ऊधस् से शस्त्रपाणि बर्बरों का निर्माण किया, योनिदेश से यवनों का निर्माण किया, गोमय के स्थान से शकों की उत्पत्ति की एवं रोमकूपों से म्लेच्छ आदि की उत्पत्ति कर विश्वामित्र के बल को नष्ट कर दिया— “तस्या हुङ्कारतो जाताः काम्बोजाः रविसन्निभाः । ऊधसश्चाथ सम्भूता बर्बराः शस्त्रपाणयः ॥ योनिदेशाच्च यवनाः शकृद्देशाच्छकाः स्मृताः । रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीताः सकिरातकाः ॥” (वा० रा० १।५५।२,३.) वस्तुतः कौसल्यायन वेदों, शास्त्रों तथा महर्षियों के यौगिक चमत्कारों में विश्वास नहीं रखते । अतएव- उन्हें विदेशी सहायता की बात ही सूझी। फिर, जब स्वयं विश्वामित्र ने ही अपने महान् बल को वसिष्ठ के ब्रह्मबल से तुच्छ समझा है, तब दूसरे की विपरीत कल्पना का मूल्य ही क्या है ? जनकसुता जानकी के सम्बन्ध में वे अपनी अटकल लगाते हैं—"वह राजा जनक को हल चलाते समय खेत में मिल गयी थी। पृथ्वीपुत्र तो हम सभी हैं, किन्तु क्या बिना माता-पिता के संयोग से मात्र पृथिवी से किसी की उत्पत्ति हुई है ? अतः उसके यथार्थ माता-पिता अज्ञात रहे होंगे।" यह भी कथन मिथ्या ही है; क्योंकि वाल्मीकिरामायण में राम ने ऐसा कोई विचार प्रकट नहीं किया है। श्रीराम परम आस्तिक थे। उन्हें शास्त्रों में विश्वास था। देवताधिकरण के अनुसार स्थूल पृथ्वी से अतिरिक्त उसकी एक दिव्य अधिष्ठात्री शक्ति देवता भी शास्त्रप्रमाण बल से सिद्ध है। सीता उसी की पुत्री थी।

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १११ सामान्य लोगों की उत्पत्ति में द्यौ, पर्जन्य, भूमि, पुरुष और स्त्री इन पाँच अग्नियों की अपेक्षा होती है। द्रोण स्त्रीनिरपेक्ष चार अग्नियों से ही उत्पन्न हुए थे। सीता, द्रौपदी, धृष्टद्युम्न आदि की उत्पत्ति माता-पिता की अपेक्षा न रखकर तीन ही अग्नियों से हुई थी। दृष्ट ही माननेवाला प्रत्यक्षप्रामाण्यवादी चार्वाक होता है। उसकी दृष्टि में प्रत्यक्ष से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है। परन्तु बुद्ध ने अनुमान प्रमाण को भी स्वीकार किया है। बौद्ध तो बुद्ध को सर्वज्ञ मानकर उनके वचनों को भी प्रमाण मानते हैं। पर जब हम सब में कोई सर्वज्ञ नहीं होता तो बुद्ध को ही सर्वज्ञ क्यों माना जाय ? यदि बुद्ध में अन्य लोगों की अपेक्षा विलक्षणता मान्य है तो सीता और राम के सम्बन्ध में भी शास्त्रोक्त विलक्षणता क्यों न मान्य हो । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं—"मेरे सामर्थ्य को बढ़ा चढ़ा कर दिखाने के लिए उस धनुष का भी ऐसा वर्णन किया गया है कि पाँच हज़ार मनुष्यों द्वारा लायी गयी पेटिका में वह धनुष रखा था, यह वर्णन अयथार्थ है ।" पर वस्तुतः मिथ्या वासुदेव का यह कथन ही अयथार्थ है, क्योंकि लाखों वर्ष पुरानी घटना जानने में भी तो प्रमाण की अपेक्षा होती है। वाल्मीकि के राम ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है। उनके नाम पर मिथ्या कल्पना करनेवाले बौद्ध भिक्षु कौसल्यायन ने साधारण नैतिकता को भी तिलाञ्जलि दे दी है। शिव एवं विष्णु के धनुष को सर्वसाधारण धनुष जैसा नहीं कहा जा सकता । कौसल्यायन के अनुसार—"मेरा इरादा उसे तोड़ने का नहीं था, वह यूँ ही टूट ही गया ।” यह कथन भी निष्प्रमाण होने से मिथ्या है । अयोध्याकाण्ड में भी इसी तरह वाल्मीकिरामायण के नाम पर मिथ्या कल्पित कौसल्यायन के राम ने अनर्गल प्रलाप किया है। वे कहते हैं—"मेरे बारे में कहा गया है कि मैं साक्षात् विष्णु था और परम प्रचण्ड रावण के वध की अभिलाषा रखनेवाले देवताओं की प्रार्थना पर मनुष्यलोक में अवतीर्ण हुआ था। पर इस कथन से मेरा वास्तविक रूप प्रच्छन्न हो गया है। एक तरफ मुझे विष्णु कहा गया, दूसरी तरफ मैं स्वर्ग की आशा से धर्म का पालन करता हूँ ।" यह भी काल्पनिक ही राम का कहना है, वास्तविक राम का नहीं । अतएव ऐसी वस्तुओं को राम- कहानी का रूप देना पाखण्ड से सत्य को ढँकनामात्र है और पूर्वप्रतिज्ञा के विरुद्ध ही है । पीछे कहा गया है कि वाल्मीकि ने सत्य सत्य बातें कही हैं; पर अब वाल्मीकि की बातों को झुठलाने का निरर्थक यत्न किया जा रहा है— "स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥" ( वा० रा० २।१।७ ) इस वाल्मीकिवचन से स्पष्ट ही राम का विष्णु होना सिद्ध है और यह श्लोक क्षेप भी नहीं है। तभी मिथ्या वासुदेव को इसका विरोध करना पड़ा । इसी प्रकार अनेक मिथ्या कल्पनाएँ जो वाल्मीकि के राम ने कभी भी नहीं सोची थीं उन्हीं के नाम से निर्लज्ज कौसल्यायन ने उठायी हैं । राजा दशरथ वेदादि शास्त्रों के अनुयायी एवं वेदोक्त धर्म के पालक थे । सत्यप्रतिज्ञ थे । कैकेयी को प्रदत्त दो वरदानों का पालन करना अपना कर्तव्य समझते थे । अतएव कौसल्यायन का यह प्रलाप निरर्थक ही है कि “यह कैसा धर्मबन्धन था। क्या यह सरासर मूर्खता का बन्धन नहीं था। कैकेयी के मोहपाश में बँधे हुए मेरे पिता धर्मबुद्धि से सर्वथा हाथ धो बैठे थे, क्योंकि बिना यह जाने कि वह क्या वर माँगेगी, दुष्टा कैकेयी को उन्होंने वरदान दे दिया था। उनकी दृष्टि में उस वरदान का तो मूल्य था, किन्तु अपनी सारी प्रजा को उन्होंने जो सूचना दी थी कि ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण मैं राजगद्दी पर बैठाया जाऊँगा, उस बचन का कुछ भी मूल्य न था ।”

११२ रामायणमीमांसा पञ्चम वेदादिशास्त्रविमुख बौद्ध भिक्षु को यह नहीं विदित हो सका कि ज्ञानपूर्वक की गयी प्रथम प्रतिज्ञा के विरुद्ध होने से तदुत्तरकालीन विचारों का कोई मूल्य नहीं होता । इसके अतिरिक्त प्रजा के सामने कोई प्रतिज्ञा की बात भी नहीं थी । राम को राजगद्दी देने का विचार महाराज का ही था । उन्होंने उसी सम्बन्ध में प्रजा की सम्मति प्राप्त की थी । किं बहुना इस बौद्ध की रामकहानी में भूल से ही कोई एकाध बात सत्य होगी । प्रायः सबकी सब बातें मनगढन्त मिथ्या दुष्कल्पनाएँ ही प्रभूत हैं। जो वाल्मीकिरामायण में नहीं है, उसकी कल्पना की गयी है और रामायण में उक्त बातों को झुठलाया गया है। फिर भी झूठ के आधार पर कहा गया है कि यह वाल्मीकि के अनुसार है। मिथ्या वासुदेव के मुख से कहलाया गया है कि "मुझसे भी गलती हो गयी जो मेरे पिता ने की थी, बिना यह जाने कि पिता मुझे क्या कहना चाहते हैं और सचमुच कहना चाहते हैं या नहीं मैंने कैकेयी को कह दिया कि मैं प्रतिज्ञा करता हूँ राजा को जो अभीष्ट है उसे मैं पूर्ण करूँगा। राम एक ही बात कहनेवाला है इत्यादि ।" वस्तुतः इससे बढ़कर क्या दुष्टता होगी कि परम पितृभक्त एवं सत्यनिष्ठ राम के द्वारा अनार्य शब्द कहलवाया जाय क्या इसी तरह बुद्ध की कथाओं में भी मनमानी कल्पना करना इस नास्तिक को अभीष्ट होगा ? बुद्ध स्वयं अहिंसा एवं सत्य के पुजारी नहीं थे । वे एवं उनके प्रमुख शिष्य वाममार्गी थे, क्या इस कल्पना का प्रतिरोधक कोई प्रमाण उस नास्तिक के पास है ? वाल्मीकिरामायण के अनुसार जाबालि ने नास्तिकमत का आश्रयण कर राम को वनसे लौटाने का प्रयत्न किया था, किन्तु राम ने उसे धर्मविरुद्ध कहकर तथागत बुद्ध आदि नास्तिकों को चोर के समान दण्डनीय कहा, किन्तु वाल्मीकिरामायण में भी स्पष्ट उल्लेख रहने पर भी निन्दा करते हुए कौसल्यायन के कल्पित मिथ्या वासुदेव कहते हैं- "मैं उसके प्रस्ताव से क्यों सहमत न हो सका । इसका कारण मैंने न उसपर प्रकट किया, न किसी अन्य पर, किन्तु मैंने देखा जाबालि के तर्क बड़े जोरदार थे" पर यह निराधार ही है। जो बात राम ने जाबालि को नहीं बतायी, उसका ज्ञान कौसल्यायन को कैसे हो गया ? जाबालि ने बौद्ध मत का समर्थन किया था। इसी लिए बड़ी तत्परता से कौस- ल्पायन ने जाबालिप्रोक्त बौद्धमत का विवरण बड़े चाव से दिया है--"ऋतुमती माता के द्वारा गर्भ में धारण किया हुआ वीर्य और रज का परस्पर संयोग ही पुरुष के जन्म का वास्तविक कारण होता है। पिता तो एक निमित्त मात्र है। यदि यहाँ दूसरे का खाया हुआ अन्न दूसरे के शरीर में चला जाता हैं तो परदेश में जानेवालों के लिए श्राद्ध ही कर देना चाहिए। उन्हें मार्ग का भोजन (पाथेय) देना उचित नहीं। जाबालि की बातें काफी बुद्धिसङ्गत थीं, किन्तु मैं भरत या जाबालि के कहने से अयोध्या वापिस चलने की तैयारी कर लेता तो अभी तक मैंने जो सुयश कमाया था, वह सारा धूल में मिल जाता ।" पर यदि जाबालि की बातें काफी तर्कपूर्ण थीं तो बौद्ध मत भी टिक नहीं सकता; क्योंकि बौद्ध मत में भी इस लोक में किये गये शुभाशुभ कर्मों का फल जन्मान्तर में मान्य है। दूसरों की सेवा करने के लिए, दुःख दूर करने के लिए धन, सम्पत्ति तथा प्राण देनेवाले प्रशंसनीय होते हैं। अतः लङ्कावतारसूत्र आदि बौद्ध ग्रन्थकारों को परलोक मानना ही पड़ा था। यदि यह ठीक है, तब तो पित्रादि के उद्देश्य से ब्राह्मणादि को भोजन कराने का भी उत्तम परिणाम पित्रादि को प्राप्त हो ही सकता है। कौसल्यायन के मिथ्या वासुदेव कहते हैं- "किसी वाल्मीकि ने मेरे मुख में यह बात डाल दी है।" वस्तुतः डाल नहीं दी, राम के समकालीन वाल्मीकि ने आर्ष दृष्टि से सत्य घटना को जानकर ही लिखा है। श्रीराम ने कहा-"आपकी बुद्धि विषम मार्ग में स्थित है। आप वेदविरुद्ध मार्ग पर आरूढ़ हैं। आप घोर नास्तिक और धर्म के मार्ग से दूर हैं। ऐसी पाखण्डी बुद्धि के द्वारा अनुचित विचार का प्रचार करनेवाले आपको पिताजी ने अपना याजक बनाया। उनके उस कार्य की मैं निन्दा करता हूँ।" श्रीराम ने जाबालि से यह भी कहा कि आपमें और

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित ११३ चोर में कोई अन्तर नहीं है और तथागत को नास्तिक जानो । इसलिए जनता हित की दृष्टि से नास्तिक को मुख न लगाये, उसका मुख न देखे । पर इस वाल्मीकिप्रोक्त सत्य बात को झुठलाने का प्रयत्न करते हुए मिथ्या वासुदेव कहते हैं—"मैंने कभी किसी के बारे के ऐसे हल्के शब्दों का प्रयोग नहीं किया । गौतम बुद्ध का धर्म बुद्धिप्रधान था । वे वेद को ही सत्यविद्याओं का भण्डार नहीं मानते थे । किसी वर्णविशेष को अन्य वर्णों की अपेक्षा श्रेष्ठ नहीं मानते थे और वे किसी तथाकथित ईश्वर को सृष्टि का रचयिता नहीं मानते थे; लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह शुभाशुभ कर्म और उनसे मिलनेवाले फल को न माननेवाले नास्तिक थे । यह जो मेरे मुँह में डाला गया है कि जो दण्ड चोर को दिया जाता है, वही नास्तिक को दिया जाय और उसकी शक्ल न देखी जाय । यह मेरे प्रति सरासर अन्याय है ।” वस्तुतः अन्याय तो यह है जो परम्परा से प्रचलित रामायण के राम द्वारा कही हुई बातों को झुठलाने का प्रयास किया जा रहा है । जब मनु वेदनिन्दक को स्पष्ट ही नास्तिक कहते हैं— “नास्तिको वेदनिन्दकः ।” ( म० २।११ ) तब वेदनिन्दक बुद्ध को राम नास्तिक क्यों न कहते ? जब कोई सृष्टिरचयिता ईश्वर बुद्ध को मान्य नहीं, तो कर्मफलदाता भी कौन हो सकता है ? जीव अल्पज्ञ है, कर्म स्वयं जड़ है । फिर फलदाता कौन होगा ? वस्तुतः परमेश्वर ही अनन्त ब्रह्माण्ड के अनन्त प्राणियों के शुभाशुभ कर्मों का वेदादि शास्त्रों के अनुसार निर्णयकर फल देते हैं—इस तथ्य को झुठलानेवाले बुद्ध नास्तिक ही हैं। कौसल्यायन के मिथ्या राम ने ठीक वाल्मीकि के वास्तविक राम से विपरीत मत व्यक्त किया और उन्होंने कहा— "निःसंदेह मुझे इस बात पर विचार करना चाहिए था कि राजा ने मुझसे स्वेच्छा से वनगमन के लिए आज्ञा नहीं दी थी । वे तो मात्र माता कैकेयी द्वारा ठगे गये थे । ऐसी आज्ञा का पालन न बुद्धिगम्य था, न आत्महितसाधक था तथा न परहितसाधक ही था । तब भी उस समय मेरी यही धारणा थी कि पिता के वचनों को, चाहे जैसी भी परिस्थिति में मुँह से निकले हों, शिरोधार्य करना चाहिये ।” इसका अर्थ यह है कि उस समय राम का निर्णय भ्रान्तिपूर्ण था, परन्तु ऐसी कल्पना भी निष्प्रमाण ही है । कौसल्यायन के मिथ्या राम की धारणाओं तथा अनर्गल प्रलापों से परिपूर्ण 'राम की कहानी राम की जबानी' से कौसल्यायन ने बौद्धमत में रहे सहे विश्वास को भी नष्ट कर दिया है । यद्यपि विभिन्न कथनों के अन्त में वाल्मीकिरामायण के कुछ श्लोक दिये गये हैं; परन्तु वह केवल धोखा है । शास्त्र एवं धर्म के विपरीत जो कुछ श्रीराम के नाम पर कौसल्यायन ने कहा है, वह सब अत्यन्त निर्मूल है । “अनसूया स्वयं शिथिल अङ्गवाली वृद्धा थी । बुढ़ापे के कारण उसके बाल सफेद हो गये थे । वह प्रवात में कदली के तुल्य कांपती थी । उसने सीता को दिव्य माल्य, आभरण एवं अङ्गराग कहाँ से दिये ?” यह कौसल्यायन के कल्पित राम की समझ में नहीं आता । परन्तु वाल्मीकि के राम का तो ऋषियों के तपोबल पर विश्वास है । उस तपस्विनी ने अपने तपोबल से ही वैसी वस्तुएँ सीता को प्रदान की थीं । यही क्यों, भरद्वाज भी तो अकिञ्चन मुनि ही थे; परन्तु उन्होंने भरत का जो स्वागत किया था, क्या वह किसी सम्राट् के यहाँ भी सम्भव है ? अरण्यकाण्ड में कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं— "वह राक्षस मेरे हाथ से मारा गया, इसलिए स्वर्ग गया; पर ऐसे लोगों का मैं क्या करूँ, जो किसी की पत्नी को उठा ले जानेवाले राक्षस के भी स्वर्ग जाने में विश्वास करते हैं ।” परन्तु यह भी सोचना चाहिये कि अन्त में किसी भी पाप का प्रायश्चित्त तो होता ही है । विशेषतः राजदण्ड के द्वारा किसी भी पाप की निवृत्ति धर्मशास्त्रों को मान्य ही है । जैसे पापों के निवृत्यर्थ अन्यान्य प्रायश्चित्त मान्य हैं वैसे ही राजदण्ड भी एक महान् प्रायश्चित्त मान्य है ही । श्रीराम तो साक्षात् परब्रह्म हैं। उनके नामोच्चारणमात्र से प्राणियों के सब पाप निवृत्त होते हैं । फिर जिसको साक्षात् श्रीराम का दर्शन हो जाय और उनके द्वारा स्पृष्ट बाणों से जिसका वध हो उसके कल्याण में संशय की कोई बात ही नहीं उठ सकती है । १५

११४ रामायणमीमांसा पञ्चम कौसल्यायन के राम कहते हैं- "उस समय तो मैंने सीता के गले यह बात उतार दी थी कि महर्षि लोग यद्यपि शाप से राक्षसों को भस्म कर सकते हैं; किन्तु वे ऐसा इसलिये नहीं करते कि ऐसा करने से उनका तप क्षीण हो जा सकता है । किन्तु अब मैं सोचता हूँ कि यदि शाप देने से ऋषियों और मुनियों का तप क्षीण हो सकता था तो क्या हम दोनों भाइयों के हाथ से राक्षसों का वध कराने में उनका तप क्षीण नहीं हुआ होगा ?” यद्यपि यह शङ्का राम को नहीं हो सकती थी, क्योंकि वे सर्वज्ञ तथा शास्त्रज्ञ भी थे । तथापि कौसल्यायन के कल्पित राम तो शास्त्रसम्बन्धशून्य होने से वैसी अनर्गल शङ्का कर सकते हैं। न्यायाधीश के द्वारा दिया गया मृत्युदण्ड अपराधी और संसार के कल्याण का हेतु होता है; परन्तु वही मृत्युदण्ड यदि कोई अन्य देता है तो उसे पाप का भागी होना पड़ता है । इस तरह एक क्षत्रिय राजा, जिसका अपराधियों, अन्यायियों को दण्ड देना धर्म है, यदि राक्षसों का वध करता है तो उसमें तपःक्षय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं- “अगस्त्य मुनि की स्त्रियों के बारे में बहुत ही बुरी राय थी । .........परन्तु मेरा तो अनुभव मुनि के अनुभव से सर्वथा भिन्न था ।” यह भी निष्प्रमाण है। अपने दुविचारों को राम पर आरोपित करना पाप है। वस्तुतस्तु उक्त प्रसङ्ग में अगस्त्य मुनि ने सीता की प्रशंसा करते हुए साधारण स्त्रियों का स्वभाव बतलाया था । यह सुकुमारी भर्तृस्नेह से प्रेरित होकर राज्य-सुख त्यागकर दोषों से पूर्ण वन में आयी है । तुम्हारा अनुसरण करके इसने दुष्कर कर्म किया है। आम तौर पर स्त्रियाँ अच्छी अवस्था में पति का अनुसरण करती हैं और आपत्तिदशा में उसे त्याग देती हैं। स्त्रियाँ विद्युत् के चाञ्चल्य और शस्त्रों की तीक्ष्णता एवं गरुड़ तथा अनिल की शीघ्रता का अनुसरण करती हैं। परन्तु यह तुम्हारी भार्या सीता इन दोषों से विवर्जित, श्लाघ्या तथा देवियों में अरुन्धती के समान प्रशंसनीय है। श्रीराम यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए थे— “एषा च सुकुमारी च खेदेश्च न विमानिता । प्राज्यदोषं वनं प्राप्ता भर्तृस्नेहप्रचोदिता ॥ यथैषा रमते राम इह सीता तथा कुरु । दुष्करं कृतवत्येषा वने त्वामभिगच्छती । एषा हि प्रकृतिः स्त्रीणामासृष्टे रघुनन्दन । समस्थमनुरज्यन्ते विषमस्थं त्यजन्ति च ॥ शतह्रदानां लोलत्वं शस्त्राणां तीक्ष्णतां यथा । गरुडानिलयोः शैघ्यमनुगच्छन्ति योषितः ॥ इयं तु भवतो भार्या दोषैरेतैर्विवर्जिता । श्लाघ्या च व्यपदेश्या च यथा देवेष्वरुन्धती ॥” (वा० रा० ३।१३।३-७) “रावण ने सीता को दोनों भुजाओं में आबद्ध कर लिया (पृ० १०५)” यह अशुद्ध अनुवाद है। श्लोक निम्नोक्त है— “वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः। ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना ॥” (वा० रा० ३।४९।१७ ) रथ पर बैठाने के लिए रावण ने वाये हाथ से सीता के बालों का और दक्षिण हाथ से सीता के दोनों ऊरुओं के पश्चिम भाग को ग्रहण किया था। श्रीराम परब्रह्म परमेश्वर होने पर भी रावण के वधार्थ मनुष्यरूप में प्रकट हुए थे । और उसी प्रसङ्ग में मानवरूप मानवलीलाओं का अनुसरण उन्होंने किया था। तथा च पत्नी के वियोग में सामान्य मनुष्यों के जैसे शोक एवं सन्ताप उन्हें हुए थे ।

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित ११५ “राम देखि नर चरित तुम्हारे । बुध हरषहिं जड़ होहिं दुखारे ।” ( रा० मा० २।१२५।८ ) अकम्पन, मारीच आदि राक्षसों ने भी श्रीराम की ब्रह्मरूपता का अनुभव किया था। फिर भी बौद्ध एवं जैन प्रायः बहिर्मुखों को राम में लौकिकता ही परिलक्षित होती है । किष्किन्धाकाण्ड में लौकिक नरलीला का ही अनुसरण करते हुए श्रीराम ने सीता के विरह में व्याकुल होकर मानव-लीला व्यक्त की है । वालिवध पर वाली ने जो श्रीराम पर आक्षेप किया, श्रीराम ने उसका समाधान कर दिया और स्वयं वाली ने अपना अपराध एवं श्रीराम की निर्दोषता मान ली । फिर भी कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं—"उस समय जो मैंने वाली को उत्तर दिया, उससे आज मेरा ही समाधान नहीं होता है। यदि किसी अपराध का दण्ड दिया जाता है तो उसपर पहले आरोप लगाया जाता है । उसे अपने आपको निर्दोष करने का अवसर दिया जाता है । यदि वह अपने को निर्दोष न सिद्ध कर सके तभी उसे राजदण्ड दिया जाता है। यह कैसा राजदण्ड था कि मैंने वाली को छिपकर मार डाला था ।” परन्तु यह कुतर्क निर्मूल है, कारण कि जहाँ न्यायाधीश दण्डदाता को अपराध का निश्चय न हो, वहीं यह नियम होता है। मरकर प्राणी यमराज के वश में जाकर दण्डस्थान में भेज दिया जाता है। वहाँ उसके पाप का लेखा-जोखा तथा सूर्य, चन्द्र, दिन, रात आदि कर्म के साक्षी भी विद्यमान रहते हैं। यहाँ भी राम ने उसके अपराध का निश्चय करके ही दण्ड दिया। वाली के पूछने पर राम ने बता भी दिया था और वाली इसपर निरुत्तर भी हो गया था। फिर दूसरे को शङ्का उठाने का अवकाश ही कहाँ ? श्रीराम ने कहा था—सुग्रीव के साथ मेरी मित्रता है । मैंने उसका राज्य और स्त्री दिलवाने की प्रतिज्ञा की है। शङ्कापक्षी के राम कहते हैं—"यह समाधान लाचारी का था, क्योंकि ऐसी प्रतिज्ञा ही क्यों की। यह प्रतिज्ञा स्वार्थमूलक थी । सीता की तलाश में मदद करने के कारण वह प्रतिज्ञा थी ।” परन्तु यह भी कुचोद्य कुकल्पना व्यर्थ ही है, क्योंकि एक मित्र दूसरे मित्र का हित करता है। परस्पर उपकार करना ही मित्रता का स्वरूप है। इसमें अनौचित्य का प्रश्न ही नहीं उठता । विचार केवल यह होना चाहिये कि वाली ने सुग्रीव के साथ अन्याय किया था या नहीं। उसकी स्त्री तथा सम्पत्ति का हरण किया था कि नहीं । यदि किया था तो उसको दण्ड देना किसी प्रकार भी अनुचित नहीं कहा जा सकता । मित्र का शत्रु शत्रु होता है, यह नीति भी ठीक ही है। इसके बिना कोई भी शासन सुस्थिर रह ही नहीं सकता । कौसल्यायन कहते हैं— "मृगया करनेवाले लोग सावधान, असावधान, विमुख तथा भागनेवाले मृगों को भी मारते हैं। ऐसा करने पर भी उनको दोष नहीं लगता । तुम शाखामृग होने से वध्य हो । यदि कोई आज मुझसे प्रश्न करे कि क्या यह हो सकता है कि आप एक व्यक्ति को मानव भी मानें और शाखामृग भी मानें, तो मुझे निरु- त्तर हो जाना पड़ेगा । यदि वाली मानव नहीं था, शाखामृगमात्र था और हमें मानवदण्डों से या क्षत्रिय-धर्म के अनुसार उसे कैसे भी मार डालने का अधिकार प्राप्त था, तो फिर एक शाखामृग से यह आशा कैसे कर सकते थे कि वह भाई की पत्नी का परहेज करे । और उसपर यह प्रतिबन्ध कैसे लगा सकते हैं कि वह अपने छोटे भाई की स्त्री के साथ समागम न करे । क्या चतुष्पादों में ऐसे प्रतिबन्ध सुने या माने गये हैं ? मुझे स्वीकार करना चाहिए कि वाली की हत्या करना मेरी गलती थी और गलती के लिए इतिहास मुझे कभी भी क्षमा नहीं करेगा और न उसे क्षमा करना चाहिए । राजा का पुत्र होने से उसका पुत्र ही राजगद्दी का अधिकारी हो सकता था । प्रश्न था बड़े भाई के मरने पर उसका छोटा भाई गद्दी सम्भाले अथवा पुत्र ? मुझे सुग्रीव के पक्ष में ही निर्णय देना पड़ा। मैं ऐसा न करता

११६ रामायणमीमांसा पञ्चम तो सुग्रीव से मैं सीता को खोज निकालने के कार्य में किसी प्रकार की सहायता की आशा कैसे कर सकता था ?" इस प्रकार की उक्तियाँ मिथ्या वासुदेवरूप कल्पित राम की ही हो सकती हैं । वाल्मीकिवर्णित मर्यादापुरुषोत्तम राम तो ज्ञान, विज्ञान, नीति, प्रीति और परमार्थ के महान् वेत्ता थे । वे ऐसी ऊल-जलूल बातें सोच भी नहीं सकते थे । वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम ने वाली द्वारा किये गये विविध आक्षेपों का उत्तर देते हुए कहा था कि धर्म, अर्थ और काम के सम्बन्ध में और लौकिक व्यवहार के ज्ञान के बिना बालकपन के कारण तुम मेरी विगर्हणा कर रहे हो, बुद्धिसम्पन्न, आचार्य वृद्धों से बिना प्रश्न किये, वानर-स्वभावसुलभ चपलता के कारण मुझसे कहना चाहते हो । यह शैल, वन, कानन समेत सम्पूर्ण भूमि इक्ष्वाकुवंशीय राजाओं के शासन में है । मृग, पक्षी तथा मनुष्यों के निग्रह-अनुग्रह का उन्हें अधिकार है । इस समय धर्मात्मा भरत समस्त भूमि के शासक हैं। वे स्वयं धर्म, काम तथा अर्थ के तत्त्वज्ञ हैं । वे सत्यवान् तथा ऋजु हैं । उनमें नय और विनय तथा सत्य और विक्रम सु- व्यवस्थित हैं । वह देश और काल के भी ज्ञाता हैं । उन्हीं के धर्मकृत आदेश से पृथ्वी में धर्मविस्तार की दृष्टि से हम भ्रमण करते हैं । धर्मात्मा भरत के शासन में धर्म का विप्रिय करना किसी के लिए भी क्षम्य नहीं है । तुम काम- प्रधान होने के कारण राजमार्ग पर प्रतिष्ठित नहीं हो । ज्येष्ठ भ्राता तथा पिता और जो विद्या प्रदान करता है—ये तीनों ही धर्मपंथ पर वर्तमान होकर पिता के तुल्य ही माने जाते हैं। छोटा भाई, पुत्र तथा शिष्य—ये तीनों ही पुत्र- वत् चिन्त्य होते हैं । सत्पुरुषों का सूक्ष्म धर्म परम अविज्ञेयरूप से सब प्राणियों के हृदय में रहता है । वह शुभ- अशुभ सब जानता है । तुम स्वयं चपल वानर अकृतात्मा चपल वानरों के साथ वैसे ही विफल मन्त्रणा करते हो जैसे जात्यन्ध जन्मान्ध लोगों के निर्देशन में चलते हैं । तुम भ्राता की भार्या के साथ सनातन मर्यादा को छोड़कर बर्ताव करते हो । विशेषतः सुग्रीव जीवित है, उसकी भार्या रूमा, जो तुम्हारी स्नुषा के तुल्य है, उसमें तुम रमण करते हो, इसी लिये तुम्हें दण्ड दिया गया है। लोकवृत्त पराङ्मुख तुम्हारा दण्ड के द्वारा निग्रह युक्त ही है। कहा जा सकता है कि मनुष्यों के सम्बन्ध में ही विधि-निषेधरूप शास्त्र प्रवृत्त होते हैं और वाली मनुष्य नहीं, किन्तु शाखामृग है । आगे स्वयं श्रीराम ने भी कहा है कि मृग होने के कारण उनके द्वारा उसको मारना दोष नहीं । पर यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि मृग होने पर भी मनुष्यों के तुल्य उनमें राज्य, राजा आदि का व्यवहार होता था । मनुष्यों जैसा ही उनमें ज्ञान भी था; अतः उनमें भी विधि-निषेधशास्त्र की प्रवृत्ति हो सकती है । इसके अतिरिक्त इन्द्र आदि देवता अग्निहोत्र आदि धर्म के अधिकारी न होने पर भी निषेध का अतिक्रमण करने से प्रायश्चित्त के अधिकारी अक्सर हो जाते हैं । अतएव वृत्रवध के कारण ब्रह्महत्या आदि दोष इन्द्र को लगे ही थे । उसी प्रकार की स्थिति वाली, सुग्रीव आदि की भी है । वे लोग ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न थे, अतः निषेध के अतिक्रमण में उनको भी दोष होना उचित ही था । अग्निहोत्र आदि में देवताओं का तो अनधिकार इसलिये था कि कर्मों में इन्द्र आदि देवताओं के ही उद्देश्य से हविष् आदि प्रदान किया जाता है । ऐसी स्थिति में इन्द्रादि द्वारा अर्चनीय अन्य इन्द्र आदि न होने से वे कर्म में अनधिकृत होते हैं । फिर भी जिन दान आदि कर्मों में इन्द्रादि यजनीय देवताओं की अपेक्षा नहीं है, उनमें इन्द्र आदि का भी अधिकार मान्य ही है । ब्रह्मविद्या में उनका अधिकार मान्य है । ये सब बातें पूर्वमीमांसा तथा उत्तर- मीमांसा में निर्णीत हैं ! इसी प्रकार का अधिकार वाली आदि वानरों का भी है । सज्ञान अन्य पशु-पक्षियों का भी ऐसा ही अधिकार होता है । अन्य दृष्टि से यजनीय देवता का वाचक शब्द अन्तर्यामी परमेश्वर का वाचक होता है । इस दृष्टि से यज्ञ आदि में भी देवताओं का अधिकार मान्य है । तभी इन्द्र आदि का भी यजन कहीं कहीं श्रुत है । उनमें भी बृहस्पति, चन्द्र, बुध आदि में ब्राह्मणत्व एवं इन्द्र आदि मे, वैवस्वत मनु आदि के समान, क्षत्रियत्व आदि मान्य हैं । चन्द्रादि का यज्ञ भी प्रसिद्ध है । वेदों में त्रैवर्णिकों का अधिकार है । यहाँ त्रैवर्णिक पद वेद-वेदार्थज्ञानवान् का उपलक्षण ही होता है—यही व्यास, वाल्मीकि प्रभृति ऋषियों का आशय है ।

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित ११७ मार्कण्डेयपुराण के अनुसार जैमिनि ने विन्ध्यारण्यनिवासी तत्त्वज्ञ पक्षियों से ज्ञान प्राप्त किया था । इससे पक्षियों का भी तत्त्वज्ञान में अधिकार सिद्ध है । गृध्रराज जटायु का भगवान् राम ने ही दाह आदि संस्कार किया था । सम्पाति ने भी अपने भ्राता का मरण सुनकर तर्पण किया था । यह सब वाल्मीकिरामायण से सिद्ध ही है । ये सब सामान्य वानर या पक्षी नहीं थे । कोई सूर्य के अंश से, कोई इन्द्र के अंश से, कोई ब्रह्मा के अंश से और कोई अग्नि के अंश से श्रीराम की सहायता के लिए वानररूप में अवतीर्ण हुए थे। वाली चारों समुद्रों में सन्ध्या के लिए जाता था । अतः वे निषेध के उल्लङ्घन से अवश्य दण्डनीय हैं । अपराध निश्चय न होने से ही प्रमाणरूप में साक्षी आदि की अपेक्षा होती है । यहाँ तो दण्ड देनेवाला और दण्ड पानेवाला—दोनों ही जिसे स्वीकार करते हैं उसके लिए सफाई पेश करने का प्रश्न ही नहीं उठता है । इसी तरह सुग्रीव की मैत्री का भी प्रश्न था । मित्र के शत्रु को शत्रु मान कर उसका वध भी नीतिशास्त्र सम्मत है ही—“वयस्यस्योपकर्तव्यं धर्ममेवानुपश्यता ।” (वा० रा० ४।१८।२९) धर्मदृष्टि से तुम्हें भी धर्म का अनु- वर्तन करते हुए मेरे द्वारा प्राप्त दण्ड को प्रायश्चित्तरूप में स्वीकार करना चाहिये । पाप की जानकारी होने से शिष्ट लोग स्वेच्छापूर्वक राजदण्ड की माँग करते हैं; जैसे लिखित महर्षि ने स्वयं जाकर राजदण्ड ग्रहण किया था । मनु ने दो श्लोक कहे हैं । धर्मकुशल लोगों ने उन्हें स्वीकार किया था । १—राजाओं से दण्ड पाकर पाप करनेवाले मनुष्य निर्मल होकर सुकृतियों के समान ही स्वर्ग को जाते हैं । २—दण्डरूप शासन या मोक्ष अर्थात् छुटकारा होने पर स्तेन पाप से मुक्त हो जाता है । पर स्तेन (चोर) का शासन न करने से राजा उस किल्बिष का भागी होता है— “शक्यं त्वयापि यत्कार्यं धर्ममेवानुवर्तता । श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलो ॥ राजभिर्घृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ शासनाद्वापि मोक्षाद्वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते । राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ४।१८।३०-३२) मेरे कुल के ही आर्य मान्धाता ने किसी के ऐसा ही पाप करने पर उसे दण्ड दिया था । अन्य राजाओं ने भी प्रमत्त पुरुषों द्वारा किये गये पापों की शुद्धि के लिए दण्डविधान किया है । उसी से पाप नष्ट होता है, इसलिए तुम्हें परिताप न करना चाहिये, यह शास्त्रानुसार ही है । हम लोग भी शास्त्रपरतन्त्र ही हैं, स्वतन्त्र नहीं । (वा० रा० ४।१८।३३-३५) धर्मकोविंद मृगयार्थी भी शिकार में विविध जालों एवं कूट उपायों से मृगों को मारते हैं । दृश्य या प्रति- च्छन्न, भागते हुए, भयभीत हुए या विश्वस्त हुए मृगों को वे मारते हैं । प्रमत्त, अप्रमत्त और विमुख मृगों को मारना मृगया में धर्म ही है । इसलिए युद्ध बिना भी तुम्हारा वध अनुचित नहीं है । तुम स्वयं धर्म न जान कर परम्पराप्राप्त धर्म में स्थित होने पर भी मुझ पर आक्षेप कर रहे हो । वाली सन्ध्यावन्दन आदि करता था, शास्त्रज्ञ था । उस दृष्टि से भी पूर्वोक्त धर्मोल्लङ्घन के कारण उसका वध शास्त्रीय था । यदि केवल वह मृगमात्र था तो उस दृष्टि से मृगया के दृष्टान्त से उसके वध का समर्थन किया गया है । श्रीराम की उक्त बातों को सुनकर वाली दुःखी हुआ और उसे धर्म का निश्चय हो गया, इसलिए श्रीराम को कोई दोष न देकर उसने उन्हें निर्दोष ही माना और हाथ जोड़कर श्रीराम से कहा—"नरश्रेष्ठ ! आपने जो कहा है वह ठीक है । अपकृष्ट लोग प्रकृष्ट लोगों के सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकते । मैंने प्रमाद से जो अप्रिय वचन कहे हैं, उनसे आप मेरे दोषों का विचार न करें; क्योंकि आप दृष्टार्थ, तत्त्वज्ञ हैं । प्रजा के हित में निरत हैं । कार्य-कारण निश्चय में आपकी अनन्यसदृश बुद्धि स्पष्ट है । धर्म से व्यतिक्रान्त मेरा धर्मयुक्त वाणी से रक्षण करें—