रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 176, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित दशरथ जातक दशरथ जातक के अनुसार बुद्धदेव राजा दशरथ श्रीवाराणसी में धर्मपूर्वक राज्य करते थे । उनकी ज्येष्ठा महिषी की तीन सन्तानें थीं । दो पुत्र रामपण्डित और लक्ष्मण एवं एक पुत्री सीता ( सीतादेवी ) । इस महिषी के पश्चात् राजा ने एक दूसरी को ज्येष्ठा के पद पर नियुक्त किया । उसके भी एक पुत्र ( भरत कुमार ) उत्पन्न हुआ । राजा ने उसी अवसर पर उसको वर दिया । तब भरत की अवस्था सात वर्ष की थी । रानी ने वरस्वरूप अपने पुत्र के लिए राज्य माँगा; पर राजा ने स्पष्ट इनकार कर दिया । लेकिन जब रानी पुनः पुनः इसके लिए अनुरोध करने लगी तब राजा ने उसके षड्यन्त्रों के भय से अपने दोनों पुत्रों को बुलाकर कहा—'यहाँ तुम्हारे रहने से अनर्थ होने की सम्भावना है, किसी अन्य राज्य या वन में जाकर रहो । मेरे मरने के बाद लौटकर राज्य पर अधिकार प्राप्त करो ।' राजा ने ज्योतिषियों से अपने मरने की अवधि जानकर कहा—पुत्रो, बारह वर्ष बाद आकर छत्र को उठाना । पिता की वन्दना कर दोनों भाई जानेवाले ही थे कि सीतादेवी भी पिता से बिदा लेकर उनके साथ हो ली, तीनों चले । तीनों के साथ और भी बहुत से लोग चल पड़े थे; उन सबको लौटाकर तीनों हिमालय पहुँच गये और वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगे । नौ वर्षों के बाद दशरथ पुत्र-शोक से मर गये । रानी भरत को राजा बनाने में असफल रही, क्योंकि अमात्य और भरत भी इसका विरोध करते रहे । तब भरत चतुरङ्गिणी सेना लेकर राम को लाने के उद्देश्य से वन गये । उस समय राम अकेले ही थे । भरत उनसे पिता के देहान्त का सारा समाचार कहकर रोने लगे । रामपण्डित न तो शोक करते हैं, न रोते हैं— “रामपण्डितो नैव शोचति न रोदिति” सन्ध्यासमय लक्ष्मण और सीता लौटते हैं । पिता का मरण सुनकर दोनों रोने लगे । इसपर रामपण्डित ने उनको धैर्य देने के लिए अनित्यता का धर्मोपदेश किया । उसे सुनकर सबों का शोक मिट जाता है । बाद में भरत के बहुत अनुरोध करने पर भी रामपण्डित ने यह कहकर वन में रहने का निश्चय प्रकट किया कि मेरे पिता ने मुझे बारह वर्ष पर्यन्त वन में रहने का आदेश दिया था । अभी मैं लौटकर उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकूँगा, अतः तीन वर्ष के बाद लौट आऊँगा । जब भरत भी शासनाधिकार अस्वीकार कर देते हैं, तब रामपण्डित ने अपनी पादुकाएँ देकर कहा कि मेरे आने तक ये शासन करेंगी । पादुकाओं को लेकर भरत, लक्ष्मण और सीता अन्य लोगों के साथ वाराणसी लौट आये । अमात्य इन पादुकाओं के आदेश से राज्यकार्य करते थे । अन्याय होते ही 'पादुकाएँ एक दूसरे पर आघात करती थीं 'परिहणन्ति' और ठीक निर्णय होने पर शान्त रहती थीं । तीन वर्ष व्यतीत होने पर रामपण्डित लौटकर अपनी बहन सीता से विवाह करते हैं एवं १६ हजार वर्ष तक राज्य करने के बाद स्वर्ग चले जाते हैं ।