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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३२६ रामायणमीमांसा एकादश रावण-चित्र के कारण सीता के त्याग का उल्लेख है। उसके अनुसार सीता के एक पुत्र का जन्म और वाल्मीकि द्वारा दो पुत्रों की सृष्टि तथा तीनों का राम-सेना से युद्ध का वर्णन है। अनेक स्रोतों से दूर देशों में पहुँचने से राम- कथा में अनेक परिवर्तन होने असम्भव नहीं हैं। काश्मीरीरामायण २८१ अनु० : काश्मीरीरामायण या रामावतारचरित का १८वीं शती में निर्माण हुआ। उसमें शिव- पार्वती-संवादरूप से राम-कथा प्रस्तुत है। उसमें अवतारवाद की व्यापकता तथा राम को पूर्णावतार माना गया है। बुल्के के अनुसार इसी हेतु से इसका लिपिबद्ध काल १८ वीं शती है। परन्तु उनकी यह कल्पना सर्वथा निस्सार है। अवतारवाद और राम के पूर्णावतार का सिद्धान्त वेदों एवं उपनिषदों में वर्णित हैं, अतः इन सिद्धान्तों को आधुनिक विकास कहना निष्प्रमाण अथवा निराधार ही है। इसमें दशरथयज्ञ से लेकर सीता के भूमि-प्रवेश तथा राम के साकेतगमन तक की सारी कथाएँ प्रचलित वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही हैं। इसी लिए मानना चाहिए कि बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड सहित रामायण ही प्राचीन रामायण है और राम पूर्ण परब्रह्मावतार थे। मन्दोदरी के गर्भ से सीता का जन्म (न० २४) आदि कई कथाएँ वाल्मीकिरामायण से विलक्षण भी हैं। नारद द्वारा लङ्का में सीता की खोज करते हुए हनुमान् को रावण-चरित सुनाना (नं० २९)। नल की कथा सुनाना, जिसमें उसके द्वारा फेंके हुए पत्थरों का पानी पर तैरने का कारण बताया है (नं० ३९)। असमिया-साहित्य में रामकथा २८२ अनु० : असमियारामायण में दशरथ के प्रति शनि के वरदान की कथा का वर्णन है। यह बंगाली तथा उड़िया रामायणों में भी है। इन ग्रन्थों के अनुसार दशरथ की ७०० से अधिक रानियाँ थीं। सुपार्श्व द्वारा सीता का हरण करते हुए रावण को चुनौती देने का वृत्तान्त माधवकन्दली तथा कृत्तिवास दोनों में पाया जाता है। असमियाराम-साहित्य की मुख्य रचना माधवकन्दलीरामायण है। इसमें अयोध्याकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक पाँच ही काण्ड हैं। यह बुल्के के लिए डूबते को तिनके का सहारा है, इसी लिए उन्होंने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा है कि वह तीन लब्धप्रतिष्ठ कवियों द्वारा लिखा गया है। शङ्करदेव ने उत्तरकाण्ड तथा उनके शिष्य माधवदेव ने आदिकाण्ड लिखा है। यह रामायण के गौड़ीय पाठ के अनुसार है। इसमें राम की कुशनिर्मित पादुकाओं का उल्लेख है। सीता की जन्म-कथा में मेनका-वृत्तान्त, राम के प्रति तारा का शाप, विभीषण पर रावण का पाद-प्रहार, शरणागति के पहले विभीषण का अपनी माता और कुबेर से भेंट, कालनेमि-वृत्तान्त, समुद्रोल्लङ्घन-प्रसङ्ग में सुरसा का प्रथम स्थान में उल्लेख, सम्पाति के पास सुपार्श्व का आगमन आदि अंश विशेष हैं। उत्तरकाण्ड में सीता-वनवास से राम के साकेत- गमन तक का वर्णन है। इसमें भक्तिमार्ग का प्रचार उद्देश्य कहा गया है। असमियाबालकाण्ड में कैकेयी का स्वयंवर तथा सुमित्रा का सिंहल-नरेश की पुत्री होना, पायस-विभाजन के समय सुमित्रा की प्रतीक्षा, गुह और बालक राम की मैत्री आदि का उल्लेख है। हरिवरविप्रकृत लव-कुश-युद्ध तथा माधवकन्दलीकृत रामायण १४वीं शती के हैं। (१५वीं शती) (१) दुर्गावरकृत 'गीतिरामायण' । इसमें कथा की दृष्टि से सीता द्वारा पिण्ड-दान तथा चित्रकूट में मायामय अयोध्या की सृष्टि वर्णित है। (२) अनन्तकन्दलीकृत जीवस्तुतिरामायण, महीरावणवध, पातालखण्डरामायण, सीतार पाताल प्रवेश नाटक, शङ्करदेवकृत उत्तरकाण्ड तथा राम-विजय नाटक—इसमें अयोध्या के मार्ग में राम-परशुराम का द्वन्द्वयुद्ध भी वर्णित है। अनन्तठाकुर आता का श्रीराम-कीर्तन। १७वीं शती में धनञ्जयकृत गणकचरित में हनुमान् का लङ्काप्रवेशविषयक खण्डकाव्य वर्णित है। सीतावनवास, श्रीरामचन्द्र अश्वमेध, चन्द्रभारतीकृत महीरावणवध, रघुनाथ