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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 404

अध्याय आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा ३२७ महन्तकृत कथारामायण तथा अद्भुतरामायण, इसमें हनुमान् के पराक्रम के साथ राम-कथा के निर्वहण का एक नया रूप प्रस्तुत है । बङ्गाली साहित्य में रामकथा २८५ अनु० : कृत्तिवासरामायण, कृत्तिवास ओझा की सर्वाधिक लोकप्रिय रामायण अथवा श्रीरामपञ्चाली है। वह १५वीं शती की रचना है। इसमें बहुत प्रक्षेप हैं। यह वाल्मीकिरामायण के गौड़ीय पाठ पर निर्भर है। कृत्तिवास का प्रारम्भिक कथानक पद्मपुराण पातालखण्ड के गौड़ीय पाठ से प्रभावित है। बुल्के कहते हैं राम-भक्ति के प्रभाव से परम्परागत कथाओं में बहुत से परिवर्तन एवं परिवर्धन किये गये हैं। कृत्तिवासीय कथानक पर शैव और शाक्त सम्प्रदायों की गहरी छाप है। हनुमान् शिव के अवतार हैं, शिव-राम का अभेद है आदि आदि । १७ वीं शती रामलीलापदावलियाँ तथा अद्भुतरामायण के अनुसार आश्चर्यरामायण अथवा अद्भुताश्चर्य- रामायण प्रसिद्ध हैं। सीता देवी का रूपधारण कर लङ्कापति रावण के बड़े भाई सहस्रस्कन्ध रावण का संहार करती हैं। सम्भवतः इसी कारण बङ्गाल में अद्भुतरामायण अधिक लोकप्रिय हुआ। चन्द्रावती की रामायणगाथा आदि प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं । अर्वाचीन बङ्गाली राम-साहित्य में रामानन्द कृत रामलीला अद्भुतरामायण पर आधारित है। रामभक्ति- रसामृत भी अद्भुतरामायण के अनुसार है। १८वीं शती के शङ्कर चक्रवर्ती की अध्यात्मरामायणपाञ्चाली विष्णुपुरीरामायण के नाम से प्रख्यात है। अङ्गदेर रायवार ( दौत्य कार्य ), रामकवि भूषण का अङ्गदरायवार, रामचन्द्र का विभीषणेर रायवार, काशीराम का कालनेमिर रायवार, द्विज तुलसी का अङ्गदरायवार, हाराधनदास का अङ्गदरायवार तथा रामनारायण का विभीषणेर खोट्टा रायवार प्रसिद्ध हैं। साहित्यिक दृष्टिकोण से रघुनन्दन गोस्वामी का रामरसायन ( १८३१ ई० ) सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसका प्रधान आधार वाल्मीकिरामायण है। इसपर कृष्णलीला का प्रभाव है। १९वीं तथा २०वीं शताब्दी में वाल्मीकिरामायण का बङ्गला में अनुवाद तथा रामकथा पर मौलिक रचनाएँ हुई हैं तथा माइकेल मधुसूदनकृत 'मेघनादवध' भी प्रशंसनीय है। उड़िया २९१ अनु० : उड़ियासाहित्य के प्राचीनतम राम-कथाकार १५वीं शती के सिद्धेश्वर परिडा हैं। उन्हीं का नाम सारलदास है। उनकी रामायण अप्राप्य है। उनके महाभारत के आधार पर ही राम-कथा की रूपरेखा प्रस्तुत की गयी है। विलङ्कारामायण उनकी कृति न होकर अन्य सिद्धेश्वरदास द्वारा हुई है। उड़ियासाहित्य के सब से प्रसिद्ध रामायण की रचना उत्कलवाल्मीकि बलरामदास द्वारा १५ वीं शती में हुई। इसका प्रधान आधार वाल्मीकिरामायण है। फिर भी विकास की दृष्टि से बहुत कुछ परिवर्तन उसमें मिलते हैं। उन्होंने एक ब्रह्माण्ड भूगोल की भी रचना की है। जिसमें सम्पूर्ण राम-कथा शरीर में अवतारित की गयी है। कान्त- कोइलि बलरामदास कृत एक छोटी सी रचना है। जिसमें हरण के समय में सीता के करुण क्रन्दन की अभिव्यक्ति है। १५वीं शती रामविभा, रघुनाथविलास, बारमासी कोइलि तथा हलधरदास का अध्यात्मरामायण का उड़िया अनुवाद है। १८वीं शती की विलङ्कारामायण, विलङ्काखण्ड, विचित्ररामायण आदि अनेक रचनाएँ हैं। उसी शती में उपेन्द्र भञ्ज ने रामलीलामृत तथा वैदेहीशविलास लिखा है। यह वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, भोजकृत चम्पूरामायण तथा महानाटक पर आधारित पाण्डित्यपूर्ण रचना है। रामरसामृत, रामचन्द्रविहार,