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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 405

३२८ रामायणमीमांसा एकादश कान्हदासकृत रामरसामृतसिन्धु, रामकृष्णकेलिकल्लोल आदि अनेक काव्य-ग्रन्थ हैं। १९वीं शती के कृष्ण- चरणपट्टनायककृत रामायण तथा भुवनेश्वर कविचन्द्र का सीतेशविलास, नृत्यरामायण, पूर्णरामायण आदि उल्लेख्य ग्रन्थ हैं। सारलदास के महाभारत में वर्णित रामकथा की कुछ विशेषताएँ निम्नोक्त हैं। उसमें रामकथा तथा कृष्णकथा के पात्रों की अभिन्नता कही गयी है। उसमें अवतारवाद के नये रूप का प्रतिपादन है। जिसके अनुसार विष्णु राम के रूप में, इन्द्र भरत के रूप में, ब्रह्मा शत्रुघ्न के रूप में और ईश्वर लक्ष्मण के रूप में अवतरित माने जाते हैं। वस्तुतः यह नया रूप तो नहीं है। पुराणों में इसका उल्लेख है। यह आवेशावतार कहा जाता है। इसके अनुसार ही परशुराम में विष्णु का आवेश था। राम के समागम से वैष्णव अंश के पूर्ण विष्णु राम में प्रविष्ट हो जाने से परशुराम जामदग्न्य एक महान् योद्धा और महर्षि रह गये थे। इसमें दशशिर, शतशिर, सहस्रशिर, लक्षशिर रावण का उल्लेख है, जो विभिन्न कल्पों में राम द्वारा मारे जाते हैं। हनुमान् के वज्र, कौपीन का उल्लेख है तथा ब्रह्मा के वीर्य से वाल्मीकि की उत्पत्ति आदि वर्णित है । बलरामदास रामायण गौडीय पाठ पर निर्भर है। हिन्दीसाहित्य में रामकथा गोस्वामी तुलसीदास की रामकथा २९४ अनु० : गोस्वामी तुलसीदास की रामकथा एवं समस्त रचनाएँ उनके इष्टदेव राम से सम्बन्ध रखती हैं, लेकिन इनमें से रामचरितमानस सबसे अधिक लोकप्रिय है। बुल्के कहते हैं प्रारम्भ में तुलसीदास वाल्मीकिरामायण से अधिक प्रभावित थे और अपनी बाद की रचनाओं में अन्य रामकथा-साहित्य से भी। मिथिला की वाटिका में राम और सीता के परस्पर दर्शन का उल्लेख रामाज्ञाप्रश्न तथा जानकीमङ्गल में नहीं है, लेकिन वह रामचरितमानस तथा गीतावली में मिलता है। मिथिला में रावणदूत के आगमन का उल्लेख रामाज्ञा में नहीं मिलता, लेकिन रामचरितमानस और गीतावली में मिलता है। रामाज्ञाप्रश्न, जानकीमङ्गल तथा गीतावली के अनुसार परशुराम तथा राम की भेंट बरात की वापसी में होती है, किन्तु रामचरितमानस तथा कवितावली में परशुराम के मिथिला में आगमन का वर्णन है। चित्रकूट में जनक का आगमन तथा सेतुबन्ध के समय शिवप्रतिष्ठा का उल्लेख रामचरितमानस में है, किन्तु रामाज्ञाप्रश्न तथा गीतावली में नहीं है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही सीता-त्याग, लव और कुश के जन्म की कथा रामाज्ञाप्रश्न तथा गीतावली में दी गयी है। परन्तु रामचरितमानस में इन प्रसङ्गों का उल्लेख नहीं है। गीतावली की समस्त रचना पर कृष्णकाव्य का प्रभाव अत्यन्त स्पष्ट है। इस कारण उत्तरकाण्ड में राम और सीता के दोलोत्सव तथा वसन्तविहार का भी वर्णन है। इस रचना में वाल्मीकिरामायण के गौडीयपाठ के अनुसार रामशरण लेने के पूर्व विभीषण का अपने भाई कुबेर के पास जाने का वर्णन भी किया गया है। वस्तुतः तुलसीदास एक वैदिक सनातनधर्म के प्रतिष्ठित विद्वान् तथा भगवद्भक्त थे। उनकी दृष्टि में साङ्गोपाङ्ग मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद, उपनिषद्, तन्त्र, आगम, पुराण, रामायण, महाभारतादि इतिहास सभी प्रमाण हैं। उन्होंने नानापुराणनिगमागमसम्मत सिद्धान्त का उल्लेख किया है। रामचरित के सम्बन्ध में वे वाल्मीकिरामायण को मुख्य सेतु कहते हैं और अपने को उसपर चलनेवाली लघु पिपीलिका कहते हैं। उन्होंने सीता-राम गुण-ग्राम पुण्यारण्य में विहरण करनेवाले कवीश्वर (वाल्मीकि) और कपीश्वर (हनुमान्) दोनों विशुद्ध-विज्ञानवानों की वन्दना की है— "सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ । वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥" आधुनिक लोगों के समान वे अनिश्चितमति नहीं थे। उन्होंने रामचरितमानस के आरम्भ में ही जैसे वाल्मीकिरामायण के प्रति अपनी आस्था प्रकट की वैसे ही यह भी बतला दिया कि मैंने अपने गुरु से सूकरक्षेत्र में जो